अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
by महर्षि अष्टावक्र
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context१५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
वासना, दूसरी मलिन वासना । किसी प्रकार से मेरी मुक्ति
हो और मैं अपनी आत्मा का साक्षात्कार करूँ, उसके लिये
जो वृत्ति आदिकों का निरोध करना है, वह शुभ वासना
है। विषय भोगों की प्राप्ति की जो वासना है, वह मलिन
वासना है। दोनों में से मलिन वासना जन्म का हेतु है और
शुद्ध वासना जन्म का नाशक है। जो चतुर्थ भूमिकावाला
ज्ञानी है और जो मुमुक्षु है, उनके लिये शुभ वासना का
त्याग नहीं है, किन्तु अशुभ वासना का ही त्याग है। क्योंकि
विदेहमुक्ति में आत्म-ज्ञान की ही प्रधानता है। शुभ वासना
का नाश उपयोगी नहीं है, परन्तु जीवन्मुक्ति के लिये समग्र
वासनाओं का त्याग और मन का भी नाश और आत्म-ज्ञान,
ये तीनों उपयोगी हैं।
यहाँ पर अष्टावक्रजी जीवन्मुक्ति के सुख के लिये
जनकजी से कहते हैं कि तू समग्र वासनाओं का त्याग
कर ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां नवमं प्रकरणं समाप्तम् ।
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