Skip to content
SarvaKosh
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages

Page 22 of 405

Read in context
Page 22

पहला प्रकरण । १५

के लिये कर्तव्यता का अभाव कथन करते हैं । गीता में
जिज्ञासु के प्रति कर्मों का निषेध कहा है—
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते ।
भगवान् कहते हैं कि आत्म-ज्ञान का जिज्ञासु भी शब्द-
ब्रह्म वेद की आज्ञा का उल्लंघन करके वर्त्तता है । अर्थात्
जिज्ञासु के ऊपर भी कर्मकांड वेद-भाग की आज्ञा अज्ञानी
और सकामी मूर्ख के ऊपर है । अतएव हे जनक ! यदि तू
जिज्ञासु है तब भी तेरे ऊपर वर्णाश्रमों के धर्मों के करने की
वेद की आज्ञा नहीं है । यदि तू लोकाचार के लिये करना
चाहता है, तब उनको आत्मा से पृथक्, अन्तःकरण का धर्म
मान करके तू कर ।

मूलम् ।
धर्माऽऽधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो ।
न कर्त्ताऽसि न भोक्ताऽसिमुक्त एवासि सर्वदा ॥६॥

पदच्छेदः ।
धर्माऽऽधर्मौ, सुखम्, दुःखम्, मानसानि, न, ते, विभो, न,
कर्त्ता, असि, न भोक्ता, असि; मुक्तः, एव, असि, सर्वदा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विभो=हे व्यापक !ते=तेरे लिये
मानसानि=मन सम्बन्धीन=नहीं हैं
धर्माऽऽधर्मौ=धर्म और अधर्म+च=और
सुखम्=सुखन=न
+च=और+त्वम्=तू
दुःखम्=दुःखकर्त्ता=कर्त्ता