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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

by महर्षि अष्टावक्र

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished405 pages
Page 156Permalink

नवाँ प्रकरण । १४९

३—तीसरी शरीर की वासना अर्थात् मेरा शरीर सबसे सुन्दर और पुष्ट सदैव बना रहे ।

इन तीनों प्रकार की वासनाओं के त्याग करने से पुरुष बन्ध से छूट जाता है और उसका चित्त आत्मा में भी स्थिर हो जाता है ।

प्रश्न—समस्त वासनाओं के त्याग कर देने से शरीर की स्थिति कैसी होगी ?

उत्तर—जैसे दुग्ध पीनेवाले बालक के, और उन्मत्त अर्थात् पागल के शरीर की स्थिति प्रारब्ध-कर्म से होती है, वैसे विद्वान् निर्वासनिक के शरीर की स्थिति भी प्रारब्ध-कर्म के वश से रहती है, परन्तु यह वासना कि शरीर की स्थिति कैसे होगी, इसका त्याग ही करना उचित है ।

प्रश्न—यदि पुरुष समग्र वासनाओं का त्याग कर देगा, तब आत्म-ज्ञान को भी वह नहीं प्राप्त होगी, क्योंकि मुमुक्षु को आत्म-ज्ञान की प्राप्ति की वासना सर्वदा बनी रहती है और ज्ञानवान् को भी चित्त के निरोध करने की वासना बनी रहती है, फिर जीवन्मुक्त होने की उसको वासना बनी रहती है । सर्व वासनाओं का त्याग तो किसी से भी नहीं हो सकता है ।

उत्तर—'वाल्मीकीय रामायण' में ऐसा लिखा है—

वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा ।
मलिना जन्महेतुः स्याच्छुद्धा जन्मविनाशिनी ॥ १ ॥

दो प्रकार की वासनाएँ कही गई हैं—पहली शुद्ध

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१५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

वासना, दूसरी मलिन वासना । किसी प्रकार से मेरी मुक्ति
हो और मैं अपनी आत्मा का साक्षात्कार करूँ, उसके लिये
जो वृत्ति आदिकों का निरोध करना है, वह शुभ वासना
है। विषय भोगों की प्राप्ति की जो वासना है, वह मलिन
वासना है। दोनों में से मलिन वासना जन्म का हेतु है और
शुद्ध वासना जन्म का नाशक है। जो चतुर्थ भूमिकावाला
ज्ञानी है और जो मुमुक्षु है, उनके लिये शुभ वासना का
त्याग नहीं है, किन्तु अशुभ वासना का ही त्याग है। क्योंकि
विदेहमुक्ति में आत्म-ज्ञान की ही प्रधानता है। शुभ वासना
का नाश उपयोगी नहीं है, परन्तु जीवन्मुक्ति के लिये समग्र
वासनाओं का त्याग और मन का भी नाश और आत्म-ज्ञान,
ये तीनों उपयोगी हैं।

यहाँ पर अष्टावक्रजी जीवन्मुक्ति के सुख के लिये
जनकजी से कहते हैं कि तू समग्र वासनाओं का त्याग
कर ॥ ८ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां नवमं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

दसवाँ प्रकरण (शान्ति-वर्णन)

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दशवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलम् ।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

विहाय, वैरिणम्, कामम्, अर्थम्, च, अनर्थसंकुलम्, धर्मम्, अपि, एतयोः, हेतुम्, सर्वत्र, अनादरम्, कुरु ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
वैरिणम्=वैरी-रूपहेतुम्=कारण-रूप
कामम्=कामना कोधर्मम्=धर्म को
च=औरअपि=भी
अनर्थसंकुलम्=अनर्थ से भरे हुएविहाय=छोड़कर
अर्थम्=अर्थ कोसर्वत्र=धर्म, अर्थ और काम के हेतु कर्मों को
विहाय=त्याग करके
च=और
एतयोः=उन दोनों कोअनादरम् कुरु=अनादर कर ॥

भावार्थ ।

पहले प्रकरण में विषयों के विना भी संतोष-रूप वैराग्य

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१५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

का निरूपण किया है । अब इस प्रकरण में विषयों की तृष्णा के त्याग का निरूपण करते हैं ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! काम शत्रु है । यह काम ही सम्पूर्ण अनर्थों का मूल है और बड़ा दुर्जय है ।

आत्मपुराण में कहा है—

कामेन विजितो ब्रह्मा कामेन विजितो हरः ।
कामेन विजितो विष्णुः शक्रः कामेन निर्जितः ॥ १ ॥

कामदेव ही ने ब्रह्मा को जीता, विष्णु को जीता, इन्द्र को जीता, महादेव को जीता, अतएव सब अनर्थों का मूल कारण कामदेव ही है । धन के संग्रह और रक्षा करने में जो दुःख होता है, और उसके नाश होने में जो शोक होता है, उसका मुख्य कारण काम ही है । हे जनक ! काम का कारण जो धर्म है, उसको और सकाम कर्मों को तुम त्याग करो, क्योंकि ये सब जीवन्मुक्ति में प्रतिबन्धक हैं ॥ १ ॥

मूलम् ।

स्वप्नेन्द्र जालवत्पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा ।
मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

स्वप्न, इन्द्रजालवत्, पश्य, दिनानि, त्रीणि, पञ्च, वा, मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥

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दसवाँ प्रकरण । १५३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मित्रक्षेत्रधना-$\Bigg{$ मित्र, क्षेत्र, धन,त्रीणि=तीन
गारदारदाया-$\Bigg{$ मकान, स्त्री, भाईवा=या
दिसम्पदः$\Bigg{$ आदि सम्पत्तियों कोपञ्च=पाँच
स्वप्नेन्द्रजाल-$\Bigg{$ स्वप्न और इन्द्र-दिनानि=दिनों तक
वत्$\Bigg{$ जाल के समानपश्य=(तू) देख

भावार्थ ।

**प्रश्न—**अनेक प्रकार के सुखों को देनेवाले जो स्त्री पुत्रादिक विषय हैं, उनका निरादर करके त्याग कैसे हो सकता है ?
**उत्तर—**हे शिष्य ! स्त्री, पुत्र, धन, मित्र क्षेत्रादिक जितने कि भोग के साधन हैं, इन सबको तुम स्वप्न और इन्द्रजाल की तरह देखो, क्योंकि ये सब पाँच या तीन दिन के रहनेवाले हैं, और सब दृष्टनष्ट हैं याने देखते ही नष्ट हो जाते हैं । इस वास्ते इनमें ममता का त्याग करना उत्तम है ॥ २ ॥

मूलम् ।

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै ।
प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

यत्र, यत्र, भवेत्, तृष्णा, संसारम्, विद्धि, तत्र, वै, प्रौढवैराग्यम्, आश्रित्य, वीततृष्णः, सुखी, भव ॥

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१५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्र यत्र =जिस जिस वस्तु मेंप्रौढवैराग्यम् =असाधारण वैराग्य को
तृष्णा =इच्छाआश्रित्य =आश्रय करके
भवेत् =होवेवीततृष्णः =तृष्णा-रहित होता हुआ
तत्र =उस उस विषेसुखी भव =सुखी हो ॥
संसारम् =संसार को
विद्धि =( तू ) जान
वै =निश्चयपूर्वक

भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिस-जिस प्रसिद्ध विषय में मन की तृष्णा उत्पन्न होती है, उसी उसी विषय को तुम संसार का हेतु जानो । क्योंकि विषयों की तृष्णा ही कर्म द्वारा संसार का हेतु है । यही वार्ता ‘योगवाशिष्ठ’ में भी लिखी है—

मनोरथरथारूढं युक्तमिन्द्रियवाजिभिः ।
भ्राम्यत्येव जगत्कृत्स्नं तृष्णासारथिचोदितम् ॥ १ ॥

मनोरथ-रूपी रथ है, इन्द्रिय-रूपी घोड़े उसके आगे बँधे हैं, उसी रथ पर सारा जगत् आरूढ़ हो रहा है और तृष्णा-रूपी सारथि उसको भ्रमा रहा है ॥ १ ॥

यथा हि शृंगगोकाले वर्धमानेन वर्धते ।
एवं तृष्णापि चित्तेन वर्धमानेन वर्धते ॥ २ ॥

जैसे गौ के दोनों शृंग गौ के शरीर के साथ ही बराबर बढ़ते हैं, वैसे ही तृष्णा भी चित्त के साथ ही बराबर बढ़ती है ॥ २ ॥

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दसवां प्रकरण । १५५

प्राप्त पदार्थ के अधिक प्राप्त होने की इच्छा से और अप्राप्त पदार्थ के प्राप्त की इच्छा से रहित होकर आत्मा में निष्ठा करने से जीव सुखी होता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तिपुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

तृष्णामात्रात्मकः, बन्धः, तन्नाशः, मोक्षः, उच्यते, भवासंसक्तिमात्रेण, प्राप्तितुष्टिः, मुहुः, मुहुः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तृष्णामात्रात्मकः ={ तृष्णा-मात्र-स्वरूपभवासंसक्तिमात्रेण ={ संसार में असङ्ग होने से
बन्धः =बन्ध हैमुहुःमुहुः =वारंवार
तन्नाशः =उसका नाशप्राप्तितुष्टिः ={ आत्मा की प्राप्ति और तृप्ति होती है ॥
मोक्षः =मोक्ष
उच्यते =कहा जाता है

भावार्थ ।

तृष्णा-मात्र का नाम ही बन्ध है और उसके नाश का नाम मोक्ष है, 'योगवाशिष्ठ' में कहा है—

च्युता दन्ताः सिताः केशा दृङ् निरधोः पदे पदे ।
यातसज्जमिमं देहं तृष्णा साध्वी न मुञ्चति ॥ १ ॥

अर्थात् पुरुष के दांत टूट भी जाते हैं, केश श्वेत हो जाते हैं, नेत्र की दृष्टि कम भी हो जाती है और कदम-कदम पर पांव

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१५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

फिसलते भी हैं, पर तब भी यह तृष्णा उस पुरुष से नहीं त्यागी जाती है ॥ १ ॥

तृष्णे देविनमस्तुभ्यं धैर्यविप्लवकारिणी ।
विष्णुस्त्रैलोक्यपूज्योऽपि यत्त्वया वामनीकृतम् ॥ २ ॥

हे तृष्णे ! हे देवि ! तेरे प्रति मेरा नमस्कार है, क्योंकि तू पुरुष की धैर्यता नाश करनेवाली है । जो विष्णु तीनों लोकों में पूज्य था, उसको भी तूने वामन याने छोटा बना दिया ॥ २ ॥

हे जनक ! तृष्णा का त्याग ही मुक्ति का हेतु है ॥४॥

मूलम् ।
त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा ।
अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।
त्वम्, एकः, चेतनः, शुद्धः, जडम्, विश्वम्, असत्, तथा, अविद्या, अपि, न, किञ्चित्, सा, का, बुभुत्सा, यथा, अपि, ते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
त्वम् =तूतथा =वैसे ही
एकः =एकसा अविद्या अपि=$वह अविद्या भी
शुद्धः =शुद्ध
चेतनः =चैतन्य-रूप हैन किञ्चित् =असत् है
विश्वम् =संसारतथा अपि =ऐसा होने पर भी
जडम् =जड़ते =तुझको
च =औरका =क्या
असत् =असत् हैबुभुत्सा =जानने की इच्छा है ॥
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दशवाँ प्रकरण । १५७

भावार्थ ।

प्रश्न–यदि तृष्णा-मात्र बन्धन का हेतु माना जावे, तो आत्मज्ञान की प्राप्ति का हेतु भी तृष्णा-बन्धन का हेतु होना चाहिए ?

उत्तर–अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इस जगत् में तीन ही पदार्थ हैं—एक आत्मा, दूसरा जगत्, तीसरी अविद्या ।

प्रथम आत्मा के लक्षण को दिखाते हैं—

स्थूल सूक्ष्मकारणशरीराद्व्यतिरिक्तोऽवस्थात्रयसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूपो यस्तिष्ठति स आत्मा ॥ १ ॥

अर्थ—जो स्थल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों से भिन्न है और जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी सच्चिदानन्द है, वही आत्मा है ॥ १ ॥

उसकी प्राप्ति के लिये तृष्णा करना उचित है ।

अनादिभावत्वे सति ज्ञाननिवर्तत्वमज्ञानत्वम् ॥ २ ॥

जो अनादिभाव-रूप है, और आत्म-ज्ञान करके निवृत्त है, वही अज्ञान अर्थात् अविद्या है ॥ २ ॥

गच्छतीति जगत् ॥ ३ ॥

जो सदैव गमन करता रहे अर्थात् नदी के प्रवाह की तरह चलता रहे, वही जगत् है ॥ ३ ॥

हे जनक ! तुम इन तीनों में से एक ही चेतन शुद्ध आत्मा हो, अपने आत्मा को ही पूर्ण-रूप करके निश्चय करो और जगत् को असत्-रूप करके जानो । अविद्या सदसत् से

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१५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

विलक्षण और अनिर्वचनीय है। उसका कार्य जगत् भी
अनिर्वचनीय है। इस वास्ते इन दोनों में तृष्णा करनी अनु-
चित है, क्योंकि दोनों मिथ्या हैं। मिथ्या वस्तु में मूर्ख
अज्ञानी तृष्णा को करता है, ज्ञानवान् कदापि नहीं करता
है॥५॥

मूलम्।
राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।
संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥६॥

पदच्छेदः।
राज्यम्, सुताः, कलत्राणि, शरीराणि, सुखानि, च,
संसक्तस्य, अपि, नष्टानि, तव, जन्मनि, जन्मनि।

अन्वयः। शब्दार्थ।अन्वयः। शब्दार्थ।
राज्यम्=राज्यनष्टानि=नष्ट हुए हैं
सुताः=लड़के+च=और
कलत्राणि=स्त्रियाँतव=तेरे
शरीराणि=शरीरअपि=भी
च=औरएते=ये सब
सुखानि=सुखजन्मनि जन्मनि=हर एक जन्म में
संसक्तस्य=आसक्त पुरुष केनष्टानि=नष्ट हुए हैं॥

भावार्थ।
अष्टावक्रजी जगत् को असत्य-रूप दिखलाते हैं—
हे जनक ! राजभोग और स्त्री, पुत्रादिक ये सब तो
तुमको अनेक जन्मों में मिलते ही रहे हैं और नष्ट भी होते
रहे हैं। क्योंकि पहले जन्मों में जो तुमको स्त्री-पुत्रादिक

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दसवाँ प्रकरण । १५९

प्राप्त हुए थे, उनका इस काल में कहीं भी पता नहीं है और
इस वर्तमान जन्म में जो मिले हैं, उनका आगे कहीं भी नाम
व निशान नहीं रहेगा, इससे यही साबित होता है कि ये
सब असत् अर्थात् मिथ्या हैं। जाग्रत् में पदार्थ जैसे स्वप्न
में असत् होते हैं और स्वप्न के पदार्थ जैसे जाग्रत् के असत्
होते हैं और जैसे सुषुप्ति में दोनों जाग्रत् और स्वप्न असत्
होते हैं और सुषुप्ति, जाग्रत् दोनों स्वप्न में असत् होते हैं,
क्योंकि एक दूसरे के विरोधी हैं वैसे ही जब मनुष्य अज्ञान-
रूपी स्वप्न अवस्था से जागकर ज्ञान-रूपी जाग्रत् अवस्था
को प्राप्त होता है, तब उसको सारा जगत् मिथ्या प्रतीत
होने लगता है।

प्रश्न—सांख्यमतवाले जगत् के पदार्थों को नित्य मानते
हैं और कहते हैं कि कारण मृत्तिका भी सत्य है, और उसका
कार्य घट भी सत्य है। अर्थात् कारण और कार्य दोनों सत्य
हैं। यदि घट मृत्तिका में पूर्वसत्य और सूक्ष्मरूप से स्थित न
होवे, तो उसकी उत्पत्ति भी न होवे। क्योंकि असत्य की
उत्पत्ति सत् से नहीं होती है, इस वास्ते घट सत्य है। इसी
तरह और भी संसार के सारे पदार्थ सत्य ही हैं, असत्य
कोई पदार्थ नहीं है। कारण-सामग्री से घट का प्रादुर्भाव
होता है, सामग्री के न होने से घट-रूपी कार्य का मृत्तिका-
रूपी कारण में ही तिरोभाव रहता है, घट मिथ्या
नहीं है ?

उत्तर—त्रिकालाबाध्यत्वे सत्यत्वम् ।

तीनों कालों में जिसका बाध न हो, उसका नाम सत्य

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१६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है, पर संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है। तुमने कहा है कि कार्य अपने कारण में सत्य-रूप से रहता है, इसलिये कार्य सत्य है, सो ऐसा कथन ठीक नहीं है, क्योंकि पट के कारण तन्तु हैं, तन्तुओं के जल जाने से पट कहाँ रहता है। कारण तो उसका रहा नहीं, कारण के नाश होने से कार्य-रूप पट का भी नाश हो गया।

यदि उन्हीं जले हुए तन्तुओं से पट फिर उत्पन्न होवे, तब उस पट का प्रादुर्भाव और तिरोभाव कारण-रूपी तन्तुओं में समझा जावे, पर वह तन्तु तो रहते नहीं, तब प्रादुर्भाव तिरोभाव कहाँ रहा।

यदि कहो कि वह पट अपने कारण-रूपी तन्तुओं के कारण जो तन्तुओं के परमाणु हैं, उनमें चला गया, तो ऐसा कथन भी नहीं बनता है, क्योंकि जब तन्तु जल जाते हैं, तब उनके परमाणु वायु के चलने से स्थानान्तर में चले जाते हैं और उन्हीं पृथिवी के परमाणुओं से कार्यान्तर बन जाते हैं अर्थात् घटादिक बन जाते हैं; क्योंकि जैसे तन्तु पृथिवी के कार्य हैं, वैसे घटादिक भी पृथिवी के कार्य हैं। पटों के जल जाने के पीछे उनकी राख से और बहुत वस्तुएँ पैदा हो सकती हैं।

यदि पट ही उस राख में तिरोभाव-रूप करके रहता, तब और वस्तु न बन सकती, उस राख से पट का ही प्रादुर्भाव होता, किन्तु ऐसा तो नहीं देखते हैं। खेत में उसी राख के डालने से घास आदि पैदा हो जाते हैं, फिर और

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दशवाँ प्रकरण । १६१

भी अनेक पदार्थ इसी प्रकार नष्ट और उत्पन्न होते हैं । यदि सब सत्य ही होवें, तब उनका नाश कदापि न हो और नाश अवश्य होता है, इसी से सिद्ध होता है कि सब पदार्थ अनिर्वचनीय मिथ्या हैं और साखी का सत्यकार्यवाद भी असंगत है ॥ ६ ॥

मूलम् ।
अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा ।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।
अलम्, अर्थेन, कामेन, सुकृतेन, अपि, कर्मणा, एभ्यः, संसारकान्तारे, न विश्रान्तम्, अभूत्, मनः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अर्थेन = अर्थ करकेएभ्यः = इन तीनों से
कामेन = कामना करकेसंसारकान्तारे = संसार-रूपी जंगल में
सुकृतेन कर्मणा अपि = सुकृत कर्म करके भीमनः = चित्त
अलम् = बहुत हो चुका हैन विश्रान्तम् = शान्त नहीं
तथा अपि = तो भीअभूत् = होता भया ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! धर्म, अर्थ और काम की इच्छा का त्याग करना ही जीवन्मुक्ति का कारण है और इनमें जो दोष हैं, उनको देखो—

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१६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पृथिवीं धनपूर्णां चेदिमां सागरमेखलाम् ।
प्राप्नोति पुनरप्येष स्वर्गमिच्छति नित्यशः ॥ १ ॥

यदि यह संपूर्ण पृथिवी समुद्र पर्यन्त धन करके युक्त भी किसी को मिल जावे, तो भी वह नित्य ही स्वर्ग की इच्छा करता है ॥ १ ॥

न पश्यति च जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति ।
मदोन्मत्ता न पश्यन्ति ह्यर्थी दोषं न पश्यति ॥ २ ॥

जन्म के अन्धों को, कामातुर को, मदिरा करके उन्मत्त को, और धन के अर्थी को कुछ भी नहीं दीखता है, इसलिये हे जनक ! धनादि की इच्छा का भी त्याग ही करना विवेकी के लिये उत्तम है । क्योंकि संसार-रूपी वन में भ्रमण करते हुए पुरुष का मन धर्म, अर्थ और काम करके व्याकुल होता हुआ कभी भी शान्त नहीं होता है ॥ ७ ॥

मूलम् ।

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा ।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम् ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

कृतम्, न, कति, जन्मानि, कायेन, मनसा, गिरा, दुःखम्, आयासदम्, कर्म, तत्, अद्य, अपि, उपरम्यताम् ॥

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दशवाँ प्रकरण । १६३

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
कति=कितनेकर्म्म=कर्म्म
जन्मानि=जन्मों तकन कृतम्=<br>$\Big{$<br>क्या नहीं किया गया
कायेन=शरीर करके+ इति=ऐसा
मनसा=मन करकेतत्=वह कर्म्म
गिरा=वाणी करकेअद्यापि=अब तो
दुःखम्=दुःख देनेवालाआयासदम्=<br>$\Big{$<br>उपराम किया जावे ॥
आयासदम्=<br>$\Big{$<br>परिश्रम करनेवाला

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी तृष्णा के उपशम को पूर्व कह करके अब क्रिया के उपशम को कहते हैं—

हे जनक ! शरीर, मन और इन्द्रियों को परिश्रम देनेवाले कर्मों को तुम अनेक जन्मों तक करते आए हो, और उन कर्मों के फल जन्म-मरण-रूपी चक्र में भ्रमण करते चले आए हो। अब दिन प्रति दिन अनेक दुःख उठाते आए, पर कुछ सुख न मिला, अतएव तुम कर्मों से उपरामता को प्राप्त हो। क्योंकि पुरुष उपरामता होने के, बिना जीवन्मुक्ति के सुख को नहीं प्राप्त होता ॥ ८ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥

—:०:—

ग्यारहवाँ प्रकरण (भाव-शान्ति)

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ग्यारहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।
भावाभावविकारश्च स्वभावदिति निश्चयी ।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।
भावाभावविकारः, च, स्वभावात्, इति, निश्चयी, निर्विकारः, गतक्लेशः, सुखेन, एव, उपशाम्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भावाभाव- विकारः=$भाव और अभाव का विकारनिर्विकारः=विकार-रहित
गतक्लेशः=क्लेश-रहित पुरुष
स्वभावात्=स्वभाव से होता हैसुखेन एव=सुख से ही
इति=ऐसा$उपशाम्यति=$शान्ति को प्राप्त होता है ॥
निश्चयी=निश्चय करनेवाला

भावार्थ ।
अब ज्ञानाष्टक नामक एकादश प्रकरण का आरम्भ करते हैं ।
चित्त की शान्ति आत्म-ज्ञान से ही होती है, विना आत्म-ज्ञान के किसी उपाय करके नहीं होती है । इस वास्ते प्रथम आत्म-ज्ञान के साधनों को कहते हैं ।
भावाभाव अर्थात् स्थूल-सूक्ष्मरूप करके जितने विकार अर्थात् कार्य हैं, वे सब माया और माया के संस्कारों से ही

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ग्यारहवाँ प्रकरण । १६५

उत्पन्न होते हैं और निर्विकार आत्मा से कोई भी विकार नहीं होता है ।

**प्रश्न—**माया जड़ है, आत्मा चेतन है। केवल जड़ माया से कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता है, और न केवल चेतन से उत्पन्न हो सकता है। क्योंकि निरवयव आत्मा से सावयव कार्य नहीं उत्पन्न हो सकता है, और न केवल जड़ माया में आप से आप विना चेतन के सम्बन्ध, कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है। यदि होवे, तब विना ही कुलाल के आपसे आप मृत्तिका से घट उत्पन्न हो जाना चाहिए पर ऐसा तो नहीं होता है। तब आपने कैसे कहा कि स्थूल-सूक्ष्मरूप कार्य सब माया से ही उत्पन्न होते हैं, चेतन से नहीं होते हैं ?

**उत्तर—**हे जनक ! जैसे चुम्बक पत्थर की शक्ति करके लोहे में चेष्टा होती है, चुम्बक पत्थर में नहीं होती, वैसे चेतन की सत्ता करके माया से कार्य उत्पन्न होते हैं, चेतन से नहीं होते हैं। जैसे शरीर में जीवात्मा की सत्ता से नख-रोमादिक उत्पन्न होते हैं। आत्मा में नहीं होते हैं। आत्मा असंग है, निर्विकार है; शरीर विकारी और नाशी है। आत्मा नित्य है, चेतन है; शरीर जड़ है, अनित्य है; ऐसा निश्चय करनेवाला पुरुष विना परिश्रम के शान्ति को प्राप्त होता है, दूसरा नहीं होता है ॥ १ ॥

मूलम् ।

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी ।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते ॥ २ ॥

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१६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

ईश्वरः, सर्वन्निर्माता, न, इह, अन्यः, इति, निश्चयी,
अन्तर्गलित सर्वाशः, शान्तः, क्व, अपि, न, सज्जते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सर्वन्निर्माता =सबका पैदा करनेवाला$\left.\begin{aligned} अन्तर्गलित \ सर्वाश \end{aligned}\right}=$अन्तःकरण में गलित हो गई हैं सब आशाएँ जिसकी
इह =इस संसार मेंच =और
ईश्वरः =ईश्वर हैयस्य आत्मा =जिसका मन
अन्य =दूसरा कोईशान्तः =शान्त हुआ है
न =नहीं हैक्व अपि =कहीं भी
इति =ऐसान =नहीं
निश्चयी =निश्चय करनेवाला पुरुषसज्जते =आसक्त होता है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**आपने कहा है कि आत्मा की सत्ता करके भावाभाव-विकार उत्पन्न होते हैं, सो आत्मा दो हैं । एक जीवात्मा है, दूसरा ईश्वरात्मा है । दोनों में से किसकी सत्ता करके भावाभाव विकार उत्पन्न होते हैं ।

**उत्तर—**ईश्वरात्मा की सत्ता करके जगत् भर के पदार्थ उत्पन्न होते हैं । जीवात्मा की सत्ता करके शरीर के नख रोमादिक उत्पन्न होते हैं । क्योंकि वह आत्मा अपने शरीर-मात्र में ही है और इसी कारण परिच्छिन्न है । उसकी सत्ता करके जगत् के पदार्थ उत्पन्न नहीं हो सकते हैं, और ईश्वर सर्वत्र व्यापक है, और सारे जगत् से बड़ा है । उसकी उपाधि माया भी बड़ी है, इसी वास्ते सर्वत्र ईश्वर की सत्ता

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ग्यारहवाँ प्रकरण । १६७

करके पदार्थ उत्पन्न होते हैं, और जीव की उपाधि जो अंतःकरण है वह अल्प शरीर में स्थित है, इस वास्ते उसकी सत्ता करके शरीर के अवयव आदिक बढ़ते हैं। अल्प उपाधि-वाला होने से जीव अल्पज्ञ अल्प शक्तिवाला है, और बड़ी उपाधिवाला होने से ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है, इसी कारण ईश्वर को ही लोक जगत् का कर्त्ता मानते हैं। वास्तव में वह कर्त्ता नहीं है, केवल माया उपाधि करके कर्तृत्व व्यवहार भी ईश्वर में गौण है, मुख्य नहीं है। वह वास्तव में अकर्त्ता है और जीव भी वास्तव में अकर्त्ता है।

प्रश्न—आपने पूर्व कहा था कि चेतन एक है, अब आप जीव और ईश्वर-भेद करके दो चेतन कहते हैं ?

उत्तर—वास्तव में चेतन एक ही है, परन्तु कल्पित उपाधियों के भेद से चेतन का भेद हो जाता है, हे राजन् ! अविद्यातत्कार्य-रहितः शुद्धः। अविद्या और अविद्या के कार्य से रहित जो चेतना है, उसी का नाम शुद्ध चेतन है, उसी को निर्गुणब्रह्म भी कहते हैं।

सर्वनामरूपात्मकप्रपंचाध्यासाधिष्ठानत्वं ब्रह्मत्वम् ।

संपूर्ण नामरूपात्मक प्रपंच के अध्यास का जो अधिष्ठान होवे, उसी का नाम ब्रह्म है, उसी शुद्ध चेतन में सारा नाम-रूपात्मक जगत् अध्यस्त है।

माया में प्रतिबिंबित चेतन का नाम ईश्वर है, अंतःकरण में प्रतिबिंबित चेतन का नाम जीव है। माया एक है, इस वास्ते उसमें प्रतिबिंबित चेतन ईश्वर भी एक ही कहा जाता है।

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१६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अविद्या के अंश अन्तःकरण नाना हैं, उनमें प्रतिबिंबित चेतन भी नाना हैं। चेतन के तीन भेद हैं। १—विषयचेतन, २—प्रमाणचेतन, ३—प्रमातृचेतन॥

घटावच्छिन्नचैतन्यं विषयचैतन्यम्॥
घटावच्छिन्न चेतन का नाम विषयचेतन है॥ १॥

अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यं प्रमाणचैतन्यम्॥
अंतःकरण की वृत्त्यवच्छिन्न चेतन का नाम प्रमाणचेतन है॥ २॥

अन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं प्रमातृचैतन्यम्॥
अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन का नाम प्रमातृचेतन है॥ ३॥

घटादिक विषय अनन्त हैं, इसलिये उनसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्तःकरण की वृत्तियाँ भी अनन्त हैं और अन्तःकरण भी अनन्त हैं, इन उपाधियों के भेद करके चेतन के भी अनन्त भेद हो गये हैं। वास्तव में चेतन एक महाकाश की तरह है। जैसे महाकाश का घटमठादि उपाधियों के साथ वास्तव में कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वैसे कल्पित उपाधियों के साथ अन्तःकरणों का कोई भी सम्बन्ध नहीं है, ऐसे निश्चय करनेवाला पुरुष निश्चल चित्त होकर कहीं भी संसक्त नहीं होता है॥ २॥

मूलम्।
आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति॥ ३॥