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सर्वकोश
युक्तिकल्पतरु (महाराज भोज - नौका-निर्माण, जलयान-विज्ञान, शस्त्र, दुर्ग एवं राजधर्म सटीक)

युक्तिकल्पतरु (महाराज भोज - नौका-निर्माण, जलयान-विज्ञान, शस्त्र, दुर्ग एवं राजधर्म सटीक)

Yuktikalpataru of Maharaja Bhoja with Commentary

महाराज भोज (सम्पादक: पण्डित ईश्वरचन्द्र शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 278 में से

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पृष्ठ 197

लोक्य". It is definitely printed as "सर्व्वेषा मङ्गमलोक्य".

Wait, look at line 13:
"इति खड्गपरीक्षायामङ्गाध्यायो द्वितीयः ।"
(इति खड्गपरीक्षायामङ्गाध्यायो द्वितीयः ।)

Line 14:
"खड्गस्य रूपाणि यथा—"

Line 15:
"नीलीकलाय-कुसुमच्छविगु (१२) ञ्जनाभा,"
Wait! Look at "नीलीकलाय":
नी - ली - क - ला - य - कु - सु - म - च्छ - वि - गु (१२) ञ्ज - न - ा - भ - ा ,
Wait, footnote (१२) says: "( १२ ) गुञ्ज इति (ग) पुस्तक पाठः ।"
In text: "च्छविगु (१२) ञ्जनाभा" -> the footnote number (१२) is placed between 'गु' and 'ञ्जनाभा'!
Wait, is it "च्छविगु" or "च्छविर्गु"?
Look above 'वि': there is a repha?
No, above 'गु' or 'वि'?
Wait, let's look at "च्छवि":
च्छ - वि. Above 'वि', is there a repha?
Wait! In Sanskrit, "च्छविगुञ्जनाभा" or "च्छविर्गुञ्जनाभा"?
च्छविः + गुञ्जनाभा = च्