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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

[ ३६ ]
देने से 'छः चक्र रह जाते हैं। आजकल योगशास्त्र के ग्रन्थों में इन छः चक्रों को ही
प्रधानता मिली हुई है। इन छः चक्रों का उल्लेख योगिनीहृदय² में भी डाकिनी आदि
छः धातुदेवताओं के प्रसंग में मिलता है। सौन्दर्यलहरी³ में भी छः चक्रों को मान्यता
मिली है। स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन में छः चक्रों और नौ आधारों की एकजातीयता
बताई गई है, किन्तु नेत्रतन्त्र⁴ में षट्चक्र और षोडश आधार की अलग-अलग गणना
की गई है और क्षेमराज⁵ ने कुलप्रक्रिया के अनुसार सोलह आधारों का वर्णन भी किया
है। तन्त्रालोकविवेक⁶ धृत नन्दिशिखातन्त्र में भी षट्चक्र और षोडश आधार का उल्लेख
है। नेत्रतन्त्र के समान ⁷हठयोग के ग्रन्थों में भी षट्चक्र, षोडश आधार, लक्ष्यत्रय और
व्योमपंचक का वर्णन मिलता है। इन सबका तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त रुचिकर हो
सकता है। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के छठे षट्चक्रनिरूपण प्रकरण में वर्णित षट् चक्रों की
प्रक्रिया स्वच्छन्दसंग्रह (दीपिका १।२५-२६ में उद्धृत) के वर्णन से कुछ भिन्न है।
ऐसे स्थलों पर अपने-अपने सम्प्रदाय के अनुसार ही भावना की पद्धति शास्त्रकारों ने
मान्य की है।
वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति
वर्णों की, विशेष कर १६ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया दीपिकाकार ने भूतलिपि
की वासना के प्रसंग में (पृ० ३२५-३३०) परापंचाशिका (श्लो० ३२-४४) के आधार
पर बताई है। स्वनिर्मित ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय (१।१६-२६) में भी ग्रन्थकार ने इस
विषय का वर्णन किया है, किन्तु दीपिका में वह केवल परापंचाशिका का उल्लेख
करते हैं, अपने ग्रन्थ का नहीं। इससे परापंचाशिका के प्रति अमृतानन्द का आदरभाव
प्रकट होता है। परापंचाशिका का यह वर्णन परात्रिंशिका (श्लो० ५-९) पर आधृत
लगता है। यहाँ संक्षेप में उसको प्रस्तुत किया जा रहा है।
१. "षट्चक्राणि त्रिहीनकम्” (पृ० ३३४)।
२. विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके ।
आज्ञायां धातुनाथांश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥ (१।३०)
३. महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९ ॥
४. ऋतुचक्रं स्वराधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् (७।१)
५. नेत्रतन्त्र के उक्त श्लोक की व्याख्या देखिये।
६. षट्चक्रं षोडशाधारं कुलं जानाति सुव्रते (१३।१८०)।
७. नित्यनाथ की सिद्धसिद्धान्तपद्धति (पृ० ७-८) में नौ चक्र माने गये हैं।

[ ३७ ]
सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का
प्रतीक माना है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियां सत्ता के अंश हैं। इनसे क्रमशः
अकार, इकार और उकार की अभिव्यक्ति होती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियां
उद्रेक के अंश हैं। इनसे क्रमशः आकार, ईकार और ऊकार का आविर्भाव होता है।
परापंचाशिका में भी यही क्रम वर्णित है। वहाँ इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उप-
लक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री का भी ग्रहण कर लेना चाहिये। चार षण्ढ
स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए वहाँ ( १।२०-२१ ) बताया गया है
कि प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदिशिव अपनी
विमर्श शक्ति को जगाकर जब इच्छा शक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि करना
चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है। इच्छा शक्ति के
उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल अवस्था में
मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है। इनमें ह्रस्व स्वरों की अभिव्यक्ति
में इच्छा ( इकार ) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन ( ईकार ) का योगदान
रहता है। शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का क्रमिक
वर्णन मिलता है। १वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थानों के बीच में ऋकार
और ऌकार का उच्चारण-स्थान माना गया है। सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति को बताते हुए
कहा गया है कि इच्छा ( इकार ) और अनुत्तर ( अकार ) के संयोग से एकार की,
एकार और अनुत्तर के योग से ऐकार की, उन्मेष ( उकार ) और अनुत्तर के संयोग से
ओकार की और ओकार तथा अनुत्तर के योग से औकार की निष्पत्ति होती है। बिन्दु
के विषय में बताया गया है कि बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार करता है। वेद्य जगत् के
संस्कार का अभिप्राय यह है कि यहाँ परम शिव वेदक और वेद्य के रूप में विभक्त होकर
अपने स्वरूप का संकोच कर लेता है। ये पन्द्रह स्वर प्रतिपदा आदि पन्द्रह तिथियों के
प्रतिनिधि हैं। सूर्य और चन्द्र के संचरण से जैसे तिथियां बनती हैं, उसी तरह रवि और
शशि के प्रतिबिम्ब स्वरूप बिन्दुद्वयात्मक आकृति वाले शिवशक्तिमय विसर्ग के संचरण से
इन पन्द्रह स्वरों का प्रादुर्भाव होता है।
तन्त्रसार ( पृ० १२-१५ ) में अभिनवगुप्त ने इस विषय को संक्षेप में इस तरह
से प्रस्तुत किया है—परमेश्वर की तीन मुख्य शक्तियां हैं। ये हैं—अनुत्तर ( अकार ),
इच्छा ( इकार ) और उन्मेष ( उकार )। अनुत्तर की आनन्द ( आकार ) में, इच्छा
की ईशन ( ईकार ) में और उन्मेष की विश्रान्ति ऊर्मि ( ऊकार ) में होती है। यहाँ
प्रथम त्रिक प्रकाशस्वभाव होने से सूर्यात्मक तथा द्वितीय त्रिक विश्रान्तिस्वभाव आह्लाद-
१. "इचुयशानां तालु। ऋटुरषाणां मूर्धा। लृतुलसानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ"
(सिद्धान्तकौमुदी, संज्ञाप्रकरण)।

[ ३८ ]
प्रधान होने से सोमात्मक है। यहाँ तक क्रिया शक्ति का प्रवेश नहीं होता। ऊर्मि (ऊकार)
से ही क्रियाशक्ति की प्रवृत्ति होती है। जब इच्छा या ईशान में क्रिया शक्ति प्रविष्ट
होती है, तो इसके दो भेद हो जाते हैं। प्रकाश के अंश से रश्रुति और विश्रान्ति के अंश
से लश्रुति प्रस्फुरित होती है। इनका उच्चारण अभी अस्फुट रहता है, अतः व्यंजन के
समान इनकी स्थिति नहीं रहती। इनमें स्वर और व्यंजन दोनों के धर्मों के रहने से
इनको नपुंसक (षण्ढ) कहा जाता है। अनुत्तर और आनन्द का जब इच्छा और उन्मेष
में प्रसार होता है, तो ए और ओ इन दो स्वरों की तथा ए और ओ से अनुत्तर और
आनन्द का संघट्ट होने पर ऐ और औ की निष्पत्ति होती है। यहाँ तक क्रिया शक्ति
का व्यापार चलता है। इसके बाद सारा कार्य-जगत् पुनः अनुत्तर में प्रविष्ट होना
चाहेगा, किन्तु ज्ञान शक्ति की सहायता से पहले वह वेदनरूप बिन्दु में तथा उसके बाद
विसर्ग के रूप में परिणत हो जाता है। ये सोलह परामर्श 'बीजस्वरूप हैं और व्यंजनों
को योनि कहा जाता है।
व्यंजनों की उत्पत्ति की प्रक्रिया तन्त्रसार (पृ० १५-१६) में ही इस तरह से
बताई गई है—अनुत्तर से कवर्ग की, श्रद्धात्मक इच्छा से चवर्ग की, सकर्मक इच्छा से
टवर्ग और तवर्ग की तथा उन्मेष से पवर्ग की निष्पत्ति होती है। त्रिविध इच्छा से
य र ल की तथा उन्मेष से वकार की, पुनः त्रिविध इच्छा से श ष स की तथा विसर्ग
से हकार की निष्पत्ति मानी गई है। क्षकार योनि (व्यंजन) के संघट्ट से बनता है।
भगवान् अनुत्तर (अकार) ही इस स्वरव्यंजनात्मक कुल का स्वामी (कुलेश्वर) है और
विसर्ग उसकी शक्ति है। इसका नाम कौलिकी है। इसकी सहायता से आनन्द से लेकर
हकार पर्यन्त यह वर्णात्मक सृष्टि होती है। वर्गों में विभक्त ये वर्ण ही तत्त्वों का रूप
धारण कर लेते हैं। विसर्ग शक्ति आणव, शाक्त और शांभव के भेद से तीन प्रकार की
है। आणव शक्ति चित्तविश्रान्ति रूप, शाक्त चित्तसंबोध रूप और शांभव शक्ति चित्त-
प्रलय रूप मानी जाती है। इस त्रिविध विसर्ग शक्ति की सहायता से भगवान् कुलेश्वर
विश्वव्यापार में प्रवृत्त होते हैं। निर्विभाग रूप में परामर्श करने पर ये अकेले हैं।
²बीज और योनि के रूप में विभक्त होने पर ये शक्ति और शक्तिमान् के रूप में
१. "द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ।
बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा, बीजं स्वरा मताः ॥
कादिभिश्च स्मृता योनिः, नवधा वर्गभेदतः ।
प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला ॥
बीजमत्र शिवः, शक्तियोंनिः" (मालिनीविजय, ३।१०-१२) ।
२. उत्तर की टिप्पणी देखिये।

[ ३९ ]
द्विविध भासित होते हैं। क्षकार और अन्य आठ वर्गों के साथ मिलकर ये नववर्गात्मक
हो जाते हैं। मातृका का रूप धारण करने पर ये पचास प्रकार के हो जाते हैं। इस
प्रकार तन्त्रसार में अतिसंक्षेप में बताई गई इस वर्णसृष्टिप्रक्रिया का अभिनवगुप्त ने
तन्त्रालोक (३।१६७-२१९) में विस्तार से वर्णन किया है।
परात्रिंशिका के ६-९ श्लोकों की व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त ने वर्गों से तत्त्वों
की उत्पत्ति का संक्षेप में उल्लेख किया है। १वे कहते हैं कि अकार से विसर्ग पर्यन्त
शिव तत्त्व की व्याप्ति है। कवर्ग से पांच महाभूत, चवर्ग से पांच तन्मात्रा, टवर्ग से पांच
कर्मेन्द्रिय, तवर्ग से पांच ज्ञानेन्द्रिय, पवर्ग से मन, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति और पुरुष नामक
पांच तत्त्व, यकार से वकार पर्यन्त चार वर्णों से मशः राग-नियति, विद्या, कला-काल
और माया तत्त्व की सृष्टि होती है। शकार से क्षकार पर्यन्त पांच वर्णों से ब्रह्मपंचक,
अर्थात् महामाया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव और शक्ति नामक तत्त्वों की सृष्टि
होती है। यह आदि-क्षान्ता वर्णमाला ही सभी मन्त्रों और २विद्याओं की भी जननी
है। परापंचाशिका १४-१८ श्लोकों में भी तत्त्वों की वर्णात्मकता का यही क्रम
वर्णित है।
योगिनीहृदय के चक्रसंकेत में वर्गों अथवा तत्त्वों की चक्रात्मकता और मन्त्रसंकेत में
विद्यागत वर्णों की तत्त्वात्मकता प्रतिपादित है। इसी तरह से पूजासंकेत ( ३।११४-
१५४) में नौ चक्रों की वैखरीमयता और मध्यमा वाणी रूप भूतलिपिमयता वर्णित
है। दीपिकाकार (३।१०८) ने स्पष्ट कहा है कि स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्।
उसका जब इन्द्रिय मार्ग से बाहरों अथवा में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो वह
संवित् विश्वाकार बन जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं
है, किन्तु अपनी संविद्देवी ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण चतुष्टय, अव्यक्त, महत्,
अहंकार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तियां, इनके विषय, पुर्यष्टक और सोलह
विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर लेती है। इसी का नाम
श्रीचक्र है।
शिव के अघोर, वामदेव आदि पांच मुखों से पृथिवी आदि पांच तत्त्वों की उत्पत्ति
मानी जाती है और इन पांच तत्त्वों को ही प्रधान मान कर अन्य सभी तत्त्वों का इन्हीं में
अन्तर्भाव किया जाता है। दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इस विषय का भी
१. इस प्रसंग को आचार्य नीलकण्ठ गुरुटू ने परात्रिंशिका के अपने भाषानुवाद की
टिप्पणियों (पृ० १५१-१५४) में स्पष्ट किया है।
२. परात्रिंशिका के इस वचन से भी स्पष्ट है कि पुरुष और स्त्री देवताओं के मनुओं के
लिये मन्त्र और विद्या शब्द का पृथक्-पृथक् प्रयोग होता रहा है।

[ ४० ]
यथावसर वर्णन किया है (पृ० १६९) । इस प्रसंग में पृ० १३८-१३९ की तथा पृ० १६५
की टिप्पणियां देखनी चाहिये ।
पृ० १५५-१५७, १६३-१६९, १८६-१८८ में सांख्यदर्शन और शैवागमों में प्रति-
पादित अनेक सिद्धान्तों की दीपिकाकार ने चर्चा की है। इन विषयों के स्पष्टीकरण के
लिये यहाँ अनेक टिप्पणियाँ दी गई हैं तथा कुछ विशिष्ट ग्रन्थों का स्थाननिर्देश भी किया
गया है, जहाँ कि इन विषयों की विशेष चर्चा हुई है। उनमें से एक विशेष विषय की चर्चा
करना हम आवश्यक समझते हैं। सांख्यकारिका (श्लो० २५) में सात्त्विक के लिये वैकृत
और राजस के लिये तैजस शब्द प्रयुक्त है। शैवागमों में मतंगपारमेश्वर (वि० १८।४३-
४४) सांख्यकारिका का अनुसरण करता है। इसके विपरीत मृगेन्द्रागम (वि० १२।२),
भोगकारिका (श्लो० ३५), १तत्त्वप्रकाश (श्लो० ५४) आदि में सात्त्विक के लिये
तैजस और राजस के लिये वैकृत शब्द प्रयुक्त हुआ है। दीपिका (पृ० १८८) में उद्धृत
स्वच्छन्दसंग्रह को भी यही क्रम मान्य है। सात्त्विक को वैकृत और राजस को तैजस कहना
कुछ अटपटा सा लगता है।
कामकला
कामकला अथवा कामबिन्दु की यहाँ अनेक स्थलों पर चर्चा आई है। हमने १६-
१७, १९, ५४ और ५६ पृष्ठों की टिप्पणियों में इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न
किया है। भावार्थ प्रकरण (२।२०-२५) में भी इसकी व्याख्या देखी जा सकती है।
त्रिपुरा सम्प्रदाय का यह अपना सिद्धान्त है। विभिन्न ग्रन्थों में इसकी अनेकविध व्याख्या
की गई है। महाकालसंहिता के एक खण्ड का नाम ही कामकला खण्ड है। हम जानते
हैं कि अपने पति महान् मीमांसक मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में हारता हुआ देख उनकी
विदुषी पत्नी भारती ने शंकराचार्य से कामकला विषयक प्रश्न किया था। इस कामकला
के स्वरूप की ही पुण्यानन्द ने अपने कामकलाविलास में व्याख्या की है। श्रद्धेय कविराज
जी ने भी अपने ग्रन्थ "तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि" में संगृहीत 'शक्तिसाधना'
और 'सृष्टि का उन्मेष' (शाक्तमत) शीर्षक निबन्धों में तथा "भारतीय संस्कृति और
साधना" के प्रथम भाग में संकलित 'शक्ति का जागरण' शीर्षक निबन्ध में इस विषय
को स्पष्ट किया है। अभी हाल में ( २३-२९ अगस्त, सन् १९८७ ) हालैण्ड के लाइडेन
नगर स्थित कर्न इंस्टीट्यूट में सम्पन्न हुए विश्व संस्कृत परिषद् के सातवें अधिवेशन की
आगम और तन्त्रशास्त्र विषयक गोष्ठी ( २८ अगस्त, प्रातःकाल) में कामकला पर
एक सचित्र लेख पढ़ा गया था। आशा की जा सकती है कि यह सचित्र निबन्ध वहाँ से
प्रकाशित होने वाले विवरण में प्रकाशित होगा और इससे पाठक लाभान्वित हो सकेंगे।
१. तत्त्वप्रकाश की तात्पर्यदीपिका टीका के लेखक कुमार (देव) ने यहाँ सांख्यकारिका
के अनुसार ही विवरण किया है।

[ ४१ ]
छः अथवा आठ धातु
अष्टांगहृदय¹ आदि आयुर्वेद के ग्रन्थों में रस, रक्त आदि सात धातुओं की चर्चा
है। योगिनीहृदय (२।६०) की दीपिका में अष्टांगहृदय के इसी श्लोक को उद्धृत कर
धातुओं और योगिनियों की संख्या सात बताई गई है, किन्तु आगे (३।३०) छः ही
धातुदेवताओं का उल्लेख और व्याख्यान है। सेतुबन्धकार भास्करराय की व्याख्या भी
दोनों स्थलों पर परस्पर विरुद्ध है। इसका समाधान हम पृ० १९० की टिप्पणी में कर
चुके हैं। तदनुसार इस प्रकरण में धातुओं और धातुदेवता डाकिनियों की संख्या छः ही
मानी जायगी। योगिनीहृदय में ही आगे (३।११४) योगिनी पद से ब्राह्मी आदि आठ
देवियों का ग्रहण कर धातुओं की संख्या भी आठ मानी गई है। उक्त सात धातुओं के
साथ क्रोध (ओज)² को जोड़ने पर धातुओं की संख्या आठ हो जाती है। इस संबन्ध में
पृ० ३१० की टिप्पणी देखी जा सकती है। योगिनीहृदय और दीपिका में सर्वत्र रस के
स्थान पर 'त्वक्' शब्द प्रयुक्त है। दीपिकाकार (३।११४) ने त्वक् का भ्रूमध्य से, रक्त
का नितम्ब, मांस का नाभि, मेदा का हृदय, अस्थि का कण्ठ, मज्जा का मुख, शुक्र का
नासापुट तथा क्रोध (ओज) का ललाट चक्र से संबन्ध बताया है। ऐसा करते समय
उन्होंने इसके लिये कोई प्रमाण नहीं दिया।
व्याकुलाक्षर
ख. मातृका को छोड़ कर योगिनीहृदय अथवा दीपिका की अन्य किसी मातृका में
व्याकुलाक्षर का प्रयोग नहीं मिलता, जब कि भास्करराय ने योगिनीहृदय के कुछ श्लोकों
को ³व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखा हुआ माना है। तन्त्रराजतन्त्र तथा परमानन्दतन्त्र
की टीका के पटल समाप्ति के सूचक पद्यों में व्याकुलाक्षर पद्धति का अनुसरण किया
गया है। भास्करराय ने सेतुबन्ध (७।८३) में इस पद्धति को समझाने के लिये इस पद्य
को उद्धृत किया है—
देवतारथगोमूक इति यो वेत्ति न क्रमम्।
स व्याकुलाक्षरे मूको देवतारथगोऽपि सन्॥
१. "रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः" (सूत्रस्थान, १।१८)।
२. "सर्वेषामन्तःबहिष्करणानां यद् यदनुप्रविशति तत्तन्मध्यनाडोभुवि सर्वाङ्गानुप्राणन-
सारायां प्राणात्मना चेतनरूपेणास्ते यदोज इति कथ्यते" (पृ० ४५-४६) परात्रिंशिका
की व्याख्या में अभिनवगुप्त ने यह ओज का लक्षण दिया है।
३. हमें सुहृद्वर प० जनार्दन शास्त्री पाण्डेय ने सूचना दी है कि सं. सं. वि. वि. से
प्रकाशित वेदविषयक ग्रन्थ 'बैठपरिभाषा' में भी व्याकुलाक्षर पद्धति का प्रयोग किया
गया है।

व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखे गये श्लोक के पादों में ऊपर बताये गये क्रम से अक्षरों
का क्रम बदल दिया जाता है। इस क्रम को समझने के लिये भी भास्करराय ने ही
१नाथनवरत्नमाला की अपनी स्वोपज्ञ टीका में दूसरा श्लोक दिया है—
कटपयवर्गभवैरिह पिण्डान्त्यैरक्षरैरङ्काः ।
नेत्रे शून्यं ज्ञेयं तथा स्वरे केवले कथिते ॥
इस वचन के अनुसार क से ञ तक, ट से न तक के अक्षरों से एक से दस तक, प
से म तक के अक्षरों से एक से पांच तक और य से क्ष तक के अक्षरों से एक से नौ संख्या
का ग्रहण होगा। इस पद्धति से ऊपर के पहले श्लोक के दे से ८, व से ४, ता से ६,
र से २, य से ७, गो से ३, मू से ५ और क सं १ संख्या गृहीत होगी। इस क्रम से
श्लोकों के पादों को व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखने पर पहले पाद का आठवां, फिर चौथा,
छठा, दूसरा, सातवां, तीसरा, पांचवां और अन्त में पहला अक्षर लिखा जायगा। जैसे
कि सेतुबन्ध में ही आठवें विश्राम के १९९ वें श्लोक के प्रथम पाद को त्स्यं सं था द्यं म
मां त म—इस तरह से व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखा गया है। आठवें अक्षर को पहले
(म), चौथे अक्षर को दूसरे (द्यं), छठे अक्षर को तीसरे (मां), दूसरे अक्षर को
चौथे (सं), सातवें अक्षर को पांचवें (त), तीसरे अक्षर को छठे (था), पाँचवें अक्षर
को सातवें (म) और अन्त में पहले अक्षर को आठवें (त्स्यं) क्रम से लिखने पर
व्याकुलाक्षर पाद का सही स्वरूप इस प्रकार बन जाता है—म द्यं मां सं त था म त्स्यं।
अन्यत्र भी इसी तरह से व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखे गये वाक्यों का उद्धार कर उनका
सही स्वरूप जाना जा सकता है।
क्रम-व्युत्क्रम
योगिनीहृदय और दीपिका में अनेक स्थानों पर किसी न किसी कारण से परम्परा
प्राप्त क्रम बदल दिया गया है। जैसे कि श्लोक १८-१९ में रौद्री, ज्येष्ठा और वामा
शक्ति के क्रम को बनाये रखने के लिये चतुष्कोण का पहले और अश्रिमिश्रय का पाठ बाद
में किया गया है। इसी प्रकार "शाक्ते वह्नौ"२ ( २।२५ ) यह क्रम न होकर "वह्नौ
शाक्ते" यह क्रम होना चाहिये। कामरूप आदि पीठों की योगिनीहृदय प्रतिपादित मन,
अहंकार, बुद्धि और चित्तरूपता के प्रमाण में अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय को उद्धृत करते
समय दीपिकाकार ने वहाँ का क्रम बदल दिया है (पृ० ६१)। इसी तरह से योगिनी-
हृदय की श्रीचक्र का सृष्टि प्रक्रिया को बनाये रखने के लिये दीपिकाकार ने सुभगोदय-
१. यह ग्रन्थ अब श्रीगुरुनवरत्नमाला के नाम से स्वोपज्ञ व्याख्या के साथ पीताम्बरा
पीठ, दतिया से प्रकाशित हो चुका है।
२. भास्करराय ने यहाँ सङ्केतित पाठ को ही मान्यता दी है।

वासना के श्लोकों का भी क्रम बदला है (पृ० ७१-७२)। त्रिविध पशुओं का क्रम सकल,
प्रलयाकल और विज्ञानाकल है, किन्तु "अशुद्धशुद्धमिश्राणाम्” (२।४३) पदों की व्याख्या
करते समय दीपिकाकार ने योगिनीहृदय के क्रम से ही इन पदों की व्याख्या की है।
"पिण्डरूपपदग्रन्थि” ( ३।९१ ) यहाँ पिण्ड, पद, रूप—यह क्रम होना चाहिये, किन्तु
छन्द के अनुरोध से यहाँ पद के पहले ही रूप पढ़ दिया गया है। ऐसे स्थलों की
व्याख्या करते समय दीपिकाकार ने यथोचित पूरी सावधानी बरती है।
दीपिका की कुछ विसंगतियां
ऊपर वर्णित सभी विशेषताओं के रहते हुए भी दीपिका में कुछ विसंगतियां दिखाई
पड़ती हैं। इनमें से कुछ का उल्लेख कर उनके समाधान का प्रयत्न हमने टिप्पणियों में
किया है। प्रारम्भ में ही नौ चक्रों की वासना के प्रसंग में स्वर और व्यंजनों का विन्यास
बताते हुए मकार का विनियोग कहीं भी नहीं किया गया। पृ० २६ की टिप्पणी में
हमने इसका समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, किन्तु २।७० तथा ३।१००-१०१
की व्याख्या में भी दीपिकाकार ने इसी बात को दुहराया है। दूसरी तरफ हम यह
देखते हैं कि योगिनीहृदय ( २।७० ) में पचास ही वर्ण माने गये हैं और दीपिकाकार
( १।४६, २।७०) ने भी इस बात को स्वीकार किया है।
"अकुले विषुसंज्ञे च" ( १।२५ ) इत्यादि श्लोक की व्याख्या में अमृतानन्द ने विषु
को अकुल का विशेषण माना है और नवें आधार के रूप में बिन्दु का ग्रहण किया है।
"अकुलादिषु” ( २।८ ) यहाँ पर भी दीपिकाकार ने नवम आधार के रूप में बिन्दु को
ही लिया है। इस विषय में हम पृ० ३६-३७ तथा पृ० ११३ की टिप्पणियों में
और यहां उपोद्घात ( पृ० ३२ टि० ) में भी आवश्यक विचार कर चुके हैं।
कुल और अकुल की द्विविध व्याख्या का समाधान भी हम ग्रन्थभाग के पृ० ३२९
की तथा उपोद्घात भाग पृ० ३४-३५ की टिप्पणी में कर चुके हैं। इसी तरह
अमृतानन्द योनि और बीज की भी परस्पर विरुद्ध दो तरह की व्याख्या करते हैं
(पृ० १५३-१५४, ३१६-३१८, ३४४)। पृ० १५४ तथा पृ० ३४४ की टिप्पणियों
में इस ओर इंगित कर हमने वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है।
१।१० तथा ३।१७५-१७६ की व्याख्या को अधिक स्पष्ट करने के लिये हमने वहाँ
( पृ० १६-१७ तथा ३६४-३६५ ) विशेष टिप्पणियाँ की हैं। इसी तरह से कामेश्वर के
बाण बीजों का उद्धार बताने वाले स्वच्छन्दसंग्रह के वचन की अस्पष्टता को देखते हुए वहाँ
भी टिप्पणी की है। नौ रन्ध्रों (नवाधार) की दीपिका (पृ० ३३४) में उपलब्ध द्विविध
नामावली की चर्चा अभी हम 'आधार' शीर्षक के अन्तर्गत कर चुके हैं। दीपिकाकार ने
"देहाक्षादिविशुद्धिदा·······योगादिक्लेशभेदेन” ( ३।१४०-१४१ ) यहाँ अक्ष (इन्द्रिय)
पद की व्याख्या करते समय नैयायिक मत के अनुसार इन्द्रियों की प्राप्यकारिता का उल्लेख
किया है, किन्तु हमें यह स्मरण रखना होगा कि नैयायिक इन्द्रियों को भौतिक मानते हैं

[ ४४ ]
अतः उनके मत में इन्द्रियों की प्राप्यकारिता उचित है । इसके विपरीत सांख्यदर्शन में
इन्द्रियों की आहंकारिकता मानी जाती है । यहां इन्द्रियों की प्राप्यकारिता का सिद्धान्त
मान्य नहीं है । दीपिकाकार सर्वत्र शैवागम संमत सांख्य दृष्टि का अनुवर्तन करते हैं ।
अतः यहाँ प्रदर्शित इन्द्रियों की प्राप्यकारिता परपक्ष प्रदर्शन मात्र माना जायगा । इसको
दीपिकाकार का सिद्धान्त नहीं माना जा सकता । इसीलिये उन्होंने 'योग' पद का अर्थ
संयोग न कर समवाय किया है ।
आभार प्रदर्शन
सितम्बर, ८२ से अगस्त, ८५ तक हमने भारत सरकार की शास्त्रचूडामणि
योजना में कार्य किया । इससे पहले ही योगिनीहृदय के द्वितीय संस्करण की निजी
प्रति को हमने योगिनीहृदय और दीपिका की सरस्वती भवन, वाराणसी स्थित
ख. और ग. मातृकाओं के आधार पर परिष्कृत कर लिया था । इस ग्रन्थ-युगल का
भाषानुवाद करने से पहले अन्य उपलब्ध मातृकाओं की सहायता से इनका पूर्णतया
संशोधन कर लेना हमें उचित प्रतीत हुआ और इस कार्य को हमने दो वर्षों ( सन्
८२-८३) में पूरा किया । दिनांक २८-१२-८३ से २४-१-८४ तक ग्रन्थ के परिष्कृत
स्वरूप का लेखन कार्य सम्पन्न हुआ तथा सन् ८४ के अन्त तक अनुवाद का कार्य चलता
रहा । दि० ५-१२-८४ से २७-१२-८४ की अवधि में पाठ निर्धारण का कार्य भी पूरा हो
गया । अब केवल प्रकाशन की प्रतीक्षा थी । एक अथवा दूसरे कारणों से इसमें विलम्ब
होता रहा और अन्ततः मोतीलाल बनारसी दास ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन का निर्णय
लिया । इस प्रसंग में हम शिक्षा मन्त्रालय, डॉ० आन्द्रे पादु और मोतीलाल बनारसीदास
प्रकाशन संस्था को विशेष रूप से स्मरण करना चाहते हैं। सुहृद्वर पण्डित श्री जनार्दन
शास्त्री पाण्डेय जी के प्रयत्न से ही विज्ञानभैरव भाषानुवाद का प्रकाशन हो सका था । इस
ग्रन्थ के प्रकाशन में भी उनकी प्रेरणा ही प्रधान रही है। इस ग्रन्थ को सुपरिष्कृत रूप देने
में उनके सुझाव बहुत उपयोगी रहे हैं । हम उनके प्रति भी आभार प्रदर्शित करते हैं ।
सरस्वती भवन पुस्तकालय, वाराणसी; गायकवाड़ शोधसंस्थान, बड़ोदरा; राजस्थान
पुरातत्त्व मन्दिर, जोधपुर तथा उसकी उदयपुर शाखा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों
को भी हम कृतज्ञता के साथ स्मरण करना चाहते हैं । परापंचाशिका की मातृकाएँ हमें
चार स्थानों से मिलीं, जिनकी चर्चा हम यथास्थान कर चुके हैं । इन संस्थाओं के प्रति
भी हम अपना आभार व्यक्त करते हैं । परिशिष्टों के निर्माण में चि० तरुणकुमार द्विवेदी,
बी० ए० ने सहायता की । हम उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं ।
मकर संक्रान्ति, संवत् २०४४ व्रजवल्लभ द्विवेदी
वाराणसी, १५-१-८८ शास्त्रचूडामणि विद्वान्

विषय-सूची

उपोद्घात
योगिनीहृदय और दीपिका-१, मातृकाओं का परिचय-१, प्रस्तुत संस्करण-३,
परापंचाशिका की मातृकाएँ-४, परापंचाशिका का परिचय-५, श्रीकुल (त्रिपुरा) का
साहित्य-६, योगिनीहृदय और वामकेश्वर तन्त्र-९, योगिनीहृदय की टीकाएं-१०,
मूल और टीका में स्मृत ग्रन्थ-ग्रन्थकार-११, त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति-१३,
चक्रसंकेत-१६, मन्त्रसंकेत (भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, सर्व-
रहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ)-२१, पूजासंकेत (त्रिविध पूजा)-२९, जप-३१,
पचास या इक्यावन पीठ-३३, नौ आधार-३४, वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति-३६,
कामकला-४०, छः अथवा आठ धातु-४१, व्याकुलाक्षर-४१, क्रम-व्युत्क्रम-४२,
दीपिका की कुछ विसंगतियां-५३, आभार प्रदर्शन-४४

१. चक्रसंकेत
दीपिकाकार का मंगलाचरण १-३
शास्त्र की अवतारणा ४-६
शास्त्र की गोपनीयता और परम्परा ६-८
शास्त्र के अनधिकारी ८-१०
शास्त्र के अधिकारी एवं शास्त्रज्ञान का फल १०-११
संकेतत्रय का उद्देश १२
संकेतत्रय के ज्ञान का फल और अनुबन्ध-चतुष्टय १३
चक्रसंकेत का उपक्रम १४
चक्र का अवतार क्रम १४-१६
बैन्दव और त्रिकोण चक्र १६-२०
कामकला का स्वरूप १७-२१
नवयोनि अथवा अष्टार चक्र, उसकी अम्बिकारूपता २१-२५
अन्तर्दशार चक्र २५-२६
बहिर्दशार चक्र २७-२८
चतुर्दशार चक्र, चक्रत्रय की रौद्रीरूपता २८-२९
अवशिष्ट चक्रत्रय और उनकी वामा-ज्येष्ठतारूपता ३०
शान्त्यतीता आदि पांच शक्तियों (कलाओं) की श्रीचक्रमय वासना ३१
नौ चक्रों में स्थित शक्तियां और उनका स्वरूप (वासनान्तर) ३१-३३

[ ४६ ]
चक्र की कामकलारूपता ३३-३४
अकुल आदि स्थानों में चक्र की त्रिविध भावना ३४-४२
अकुल और कुल मध्यवर्ती नवाधार निरूपण ३४-४०
बिन्दु से उन्मनी पर्यन्त नाद-कलाओं का स्वरूप और उच्चारण काल ४२-५२
देश और काल से अनवच्छिन्न निसर्गसुन्दर परम तत्त्व ५२-५३
अम्बिका आदि, शान्ता आदि शक्तियाँ तथा वाक्चतुष्टय ५३-५७
अम्बिका आदि, शान्ता आदि शक्तियाँ तथा पीठचतुष्टय ५७-६०
लिङ्गचतुष्टय ६०-६३
विद्या तथा शक्तिचतुष्टय आदि की वाच्यवाचकता ६३
जाग्रदादि अवस्था चतुष्टय ६४
स्वसंविदात्मक त्रैपुर स्वरूप की सर्वोत्कृष्टता ६४-७४
संवित् की मुद्रारूपता और मुद्रा पद की निरुक्ति ७४-७६
दशविध मुद्राओं का आन्तर और बाह्य स्वरूप ७६-८८
परम तत्त्व की चक्रमयता ८९-९०
श्रीचक्र की त्रिधा तथा नवधा भावना ९०-९४
श्रीचक्र का सृष्टि-संहार क्रम और त्रिपुरा चक्र के ज्ञान का फल ९४-९७
नौ चक्रों का स्वरूप और उनके नामों की निरुक्ति ९७-१००
श्रीचक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा का विधान १००-१०१
चक्रसंकेत की फलश्रुति १०१-१०३
२. मन्त्रसंकेत
मन्त्रसंकेत का उपक्रम और उसके ज्ञान का फल १०४-१०५
करशुद्धिकरी आदि नौ विद्याएं १०५-१११
नौ विद्याओं का न्यास १११-११३
अकुल आदि नवाधारों में चक्रेश्वरियों के साथ नौ चक्रों का न्यास १०३-११४
त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरियों की नौ चक्रों में पूजा ११४-११५
नौ विद्याओं की एकाकारता ११६
मन्त्रसंकेत की षड्विधता ११६-११८
भावार्थ का निरूपण (श्रीविद्या का अक्षरार्थ) ११८-१३६
मातृकाचतुष्टय तथा कामकला १२८-१३४
सम्प्रदायार्थ का निरूपण १३६-१७४
विद्या की विश्वमयता तथा विश्वोत्तीर्णता १३८-१४५
षट्त्रिंशत्तत्त्व निरूपण १४६-१४९

[ ४० ]
त्रिविध प्रमाता (सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकल) १६२-१६६
गुरु पारम्पर्य क्रम १७२-१७३
निगर्भार्थ का निरूपण १७४-१७७
कौलिकार्थ का निरूपण (चक्र, देवता, विद्या, गुरु और शिष्य की एकता) १७८-१९८
वाक्चतुष्टय १९१-१९४
सर्वरहस्यार्थ का निरूपण (स्वात्मबुद्धि) १९८-२०९
महातत्त्वार्थ का निरूपण (विश्वोत्तीर्ण-विश्वमय तत्त्व में स्वात्मनियोजन) २०२-२१२
महातत्त्वार्थ के अधिकारी और अनधिकारी २१३-२१६
मन्त्रसंकेत की फलश्रुति २१७-२१८
३. पूजासंकेत
त्रिविध पूजा—नाम और लक्षण २१९-२२३
परा पूजा की श्रेष्ठता और उसका स्वरूप २२३-२३०
षोढा न्यास (गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि, पीठ) २३०-२४२
श्रीचक्र न्यास (संहार क्रम) २४३-२५९
श्रीचक्र न्यास (सृष्टि क्रम) २५९-२६८
करशुद्ध्यादि न्यास २६८-२६९
विद्या न्यास २६९-२७१
तत्त्व न्यास २७१-२७३
परा न्यास २७१-२७४
चतुर्विध न्यास का कालविभाग २७४-२७५
आसन परिकल्पन और बलिदान २७५-२७७
विघ्नाप्रसारण और प्राकार-चिन्तन २७७-२८०
सामान्यार्घ्य से सूर्य आदि नवग्रहों का पूजन २८०-२८२
बाह्य श्रीचक्र का उद्धार व पुष्पांजलि निवेदन २८२-२८५
सामान्यार्घ्य की विधि (वह्नि, सूर्य और इन्दु कलाओं का अर्चन) २८५-२९२
विशेषार्घ्य की विधि २९२
गुरुपादुका का पूजन २९३
प्रसादग्रहण, आन्तर होम और पूर्णाहुति २९४-२९९
श्रीचक्र की पूजा का क्रम ३००-३०१
गणेश, बटुकभैरव और गुरुपंक्ति का पूजन ३०१-३०२
बैन्दव चक्र में कामेश्वर-कामेश्वरी का अर्चन ३०२-३०७
नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं का पूजन ३०७-३०८, ३५७

[ ४८ ]
प्रकटा आदि नौ योगिनियों का आवरण देवताओं के
साथ त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में पूजन ३०८-३५६
भूतलिपि का विन्यास क्रम ३२५-३४५
चक्रपूजा के बाद कुलदीप निवेदन ३५७-३५८
पुष्पांजलि समर्पण के बाद जपविधान ३५८
कूटत्रय तथा कुण्डलीत्रय में नाद की भावना ३५८-३६२
जप के समय शून्यषट्क आदि की भावना ३६३
शून्यषट्क की भावना का प्रकार ३६३-३६४
अवस्थापंचक की भावना का प्रकार ३६५-३६८
विषुवसप्तक की भावना का प्रकार ३६९-३७६
चक्रदेवताओं का तर्पण ३७६-३७८
नैमित्तिक पूजन ३७८-३७९
श्रीचक्र में ६४ करोड़ योगिनियों का निवास ३७९-३८०
अष्टाष्टक पूजा ३८०-३८१
गुरुपरम्परा से प्राप्त ज्ञान की फलवत्ता ३८१-३८२
नैवेद्य समर्पण एवं बलि निवेदन ३८२-३८७
शास्त्र की गोपनीयता ३८८
चुम्बक, ज्ञानलुब्ध और नास्तिकों की अनर्हता ३८८-३९०
ग्रन्थ की फलश्रुति ३९०-३९४
परिशिष्ट
परापञ्चाशिका आद्यनाथविरचिता ३९५-४००
योगिनीहृदय-श्लोकार्द्धानुक्रमणी ४०१-४१२
परापञ्चाशिका-श्लोकार्द्धानुक्रमणी ४१३-४१४
मूले दीपिकायां च स्मृता ग्रन्थ-ग्रन्थकाराः ४१५-४१६
संकेतपरिचयः ४१७-४१८
दीपिकोद्धृतवचनानुक्रमणी ४१९-४३४

योगिनीहृदयम्
दी पि का भा षा नु वा द सं व लि त म्
चक्रसंकेतः प्रथमः
जगद्वन्द्यावेतौ गणपबटुकौ विश्वविनुतौ
जगद्रक्षाशीलौ जपनिरतसामीप्यफलदौ¹।
रथाङ्गे सन्नद्धौ रविशशिकृशानुज्ज्वलदृशो
मयि स्यातां रक्षापरवशधियौ सद्गुणमयौ ॥१॥
²तन्नित्यं ज्योतिषां ज्योतिर्जयत्येकमनुत्तरम्³।
न यद्⁴ भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः⁵॥२॥
सारा संसार जिनकी वन्दना और स्तुति करता है, जो सदा जगत् की रक्षा करने
में लगे रहते हैं, जप में लगे साधकों को जो ¹सामीप्य नामक मोक्ष प्रदान करते हैं,
श्रीचक्र के साथ जो सदा संयुक्त हैं, सूर्य-चन्द्र और अग्निरूपी तीन उज्ज्वल नेत्रों को जो
धारण करने वाले हैं, ऐसे सारे सद्गुणों के निधान गणेश और बटुक मेरी रक्षा करने में
लग जांय ॥१॥
सभी प्रकाशात्मक वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली वह एक और नित्य अनुत्तर
शिवात्मक ज्योति ही सर्वश्रेष्ठ है। इसको सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर
सकते। अभिप्राय यह है कि उस प्रकाशात्मक ज्योति से ही सब कुछ प्रकाशित होता
है ॥२॥
१. साहित्यवरदौ-ख. ग. ज. झ. ने. उ. । २. य-क. । ३. त्तमम्-क. ।
४. तद्-क. । ५. तारकाः-ग. झ. उ. ।
१. गणेश और बटुक भगवती महात्रिपुरसुन्दरी के निवासस्थान श्रीचक्र के द्वार-
रक्षक हैं। श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर इनकी पूजा का विधान है (यहीं पूजासंकेत का
१०९ वां श्लोक देखिये)। दीपिका की प्रायः सभी मातृकाओं में 'सामीप्यफलदौ' के
स्थान पर 'साहित्यवरदौ' पाठ मिलता है। मुद्रित पुस्तक के इस पाठ को केवल उ.
मातृका का समर्थन मिलता है। इन दोनों पाठों के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है,
तो भी हमने यहाँ 'सामीप्यफलदौ' पाठ को ही मूल में इस लिये रखा है कि इससे
सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य के नाम से पुराण, आगम आदि में चतुर्धा
विभक्त मुक्ति का बोध सरलता से हो जाता है। जैसे राजदरबार में पहुँचा देता द्वार-

२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
विमर्शरूपिणी शक्तिरस्य विश्वगुरोः परा ।
परिस्फुरति सैकापि नानानामा¹र्थरूपिणी ॥३॥
पश्यन्त्यादिक्रमादेतौ जातौ प्रश्नोत्तरात्मना² ।
तन्त्रावतारं तन्वाते सर्वत्रानुजिघृक्षया ॥४॥
तद्वामकेश्वरे तन्त्रे सूचितार्थान् परापरान् ।
व्यक्तीकर्तुं प्रयतते योगिनीहृदयेऽधुना ॥५॥
मानुषीहृदयं मर्त्यो वेत्ति नैकोऽपि तत्त्वतः ।
योगिनीहृदयं ज्ञातुं कः समर्थः शिवं विना ॥६॥
इस विश्वगुरु शिव की विमर्शस्वरूपिणी परा शक्ति एक ही है, किन्तु इस जगत्
में वह नाना प्रकार के नाम और रूपों में भासित होती रहती है ॥३॥
यह परम शिव और परा शक्ति परा अवस्था से उतर कर पश्यन्ती, मध्यमा और
वैखरी वाणी के क्रम से गुरु और शिष्य के रूप में प्रकट होते हैं और प्रश्न-प्रतिवचन
पद्धति से सब प्राणियों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से तन्त्रशास्त्र की अवतारणा¹
करते हैं ॥४॥
इसी पद्धति से वामकेश्वर तन्त्र उपदिष्ट हुआ है। उसमें अनेक मुख्य और गौण विषयों
की पूर्वापर क्रम से मात्र सूचना दी गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ² योगिनीहृदय में उनके स्पष्टी-
करण का प्रयत्न किया जा रहा है ॥५॥
कोई भी मनुष्य साधारण स्त्री के हृदय को भी ठीक तरह से नहीं जान पाता ।
ऐसी स्थिति में शिव के अनुग्रह के बिना योगिनी के हृदय को जानने में कौन व्यक्ति
समर्थ हो सकता है ? ॥६॥
१. नामानु-ज. झ. उ. । २. दिना-ख. ।
पाल का कार्य है, उसी तरह भगवती महात्रिपुरसुन्दरी का सान्निध्य (सामीप्य अथवा
साहित्य) गणेश और बटुक के प्रसाद से ही मिल सकता है । इसीलिये त्रिपुरा सम्प्रदाय
के प्रायः सभी ग्रन्थों के प्रारम्भ में इनकी स्तुति मिलती है ।
१. इस विषय का विस्तार हमने विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० ३-६) में
'प्रश्नोत्तरतत्त्वनिर्णय' शीर्षक से किया है ।
२. वामकेश्वरतन्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) और योगिनीहृदय, दीपिकाकार ने
दो अलग-अलग ग्रन्थ माने हैं। इस विषय पर हम तन्त्रयात्रा (पृ० ३५-३८) और
नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात (पृ० ११-१३) में विचार कर चुके हैं ।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३
अनन्योद्घाटितं दिव्यागमकोषगृहान्तरम् ।
उद्घाट्यते मयेदानीं महार्थो गृह्यतां बुधैः ॥७॥
तदनेकार्थसन्दर्भनानासंकेतसंकुलम् ।
विवृणोम्यमृतानन्दः शिवयोरेव शासनात् ॥८॥
१अन्यथाऽनादिसंसारे किं नेदं व्याकृतं पुरा ।
तदा न सन्ति सन्तः किं किं वा नात्र प्रयोजनम् ॥९॥
शिवादिकुरुपर्यन्तं पारम्पर्यक्रमागतम् ।
एतज्ज्ञानं मया लब्धमक्रमाणांमगोचरम् ॥१०॥
घर के भीतर छिपे हुए खजाने के समान इस दिव्य आगम का रहस्य अभी तक
किसी¹ ने उद्घाटित नहीं किया था। अब मैं उसको प्रकट कर रहा हूँ। विद्वानों को
चाहिये कि वे इस महार्थ² से लाभ उठावें ॥७॥
यह योगिनीहृदय नामक ग्रन्थ अनेक विषयों, सन्दर्भों और संकेतों से भरा हुआ है।
मैं अमृतानन्द भगवान् शिव और पराम्बा की आज्ञा से ही इन सब विषयों की व्याख्या
कर रहा हूँ ॥८॥
अन्यथा इस अनादि संसार में अब तक इस ग्रन्थ की व्याख्या क्यों नहीं हुई ? क्या
उस समय इस विषय को जानने वाले विद्वान् नहीं थे ? अथवा इसकी कोई आवश्यकता
नहीं थी ? ॥९॥
शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आ रही परम्परा से क्रमशः यह ज्ञान मुझे प्राप्त
हुआ है। इस ³क्रमपरम्परा से वंचित व्यक्तियों के लिये इस विषय को समझ पाना
कठिन है ॥१०॥
१. नवमदशमश्लोकयोर्विपर्ययः-क. ।

  1. अमृतानन्द की इस उक्ति से भी दोनों ग्रन्थों की भिन्नता सिद्ध होती है, क्योंकि
    योगिनीहृदय की अब तक कोई प्राचीन व्याख्या उपलब्ध नहीं हुई है। इसके विपरीत
    नित्याषोडशिकार्णव की अनेक प्राचीन व्याख्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से कुछ
    उपलब्ध भी हैं।
  2. महार्थ का तात्पर्य यहाँ 'बहुमूल्य अर्थ' तो है ही, साथ ही टीकाकार इस शब्द
    से यह भी दिखाना चाहते हैं कि यह व्याख्या त्रिपुरा सम्प्रदाय की क्रम परम्परा का
    अनुसरण करतो है। क्रम सम्प्रदाय के 'क्रमश्चतुष्टयार्थः' और 'क्रमः पञ्चार्थः' नामक
    दो विभाग हैं। संकेतपद्धति जैसे ग्रन्थों के प्रमाण पर अमृतानन्द ने अपनी व्याख्या में प्रथम
    पक्ष को अंगीकार किया है। द्वितीय पक्ष का परिचय महेश्वरानन्द की महार्थमञ्जरी और
    उसकी स्वोपज्ञ व्याख्या में मिलता है।
  3. यहाँ क्रम शब्द क्रम सम्प्रदाय का बोधक न होकर गुरु परम्परा के क्रम को
    सूचित करता है। ज्ञान की परम्परा, जो कि तन्त्रशास्त्र में ओघ या ओघवल्ली शब्द से

४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य
पश्यन्त्यादिक्रमात् पृच्छति—
श्रीदेव्युवाच
इति। शिव एवाहं वैखरीपर्यन्तं व्यापृत्य विमर्शांशेन पृष्टवानिति यावत्।
उवाचेति लिडुत्तमपुरुषैकवचनम्। भूतत्वं च वक्तव्यस्य सदातनत्वात्। अनद्य-
तनत्वमकालकलितत्वात्। परोक्षत्वमनिन्द्रियगोचरत्वात्। अनेन “श्रीभैरव
उवाच” इत्येतदपि व्याख्यातम्। प्रकाशात्मकः परमशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः
परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शांशेन प्रष्टा भूत्वा प्रकाशांशेन
प्रतिवचनदाताऽपि सन् तन्त्रं समवतारयामीत्यर्थः। तदुक्तं श्रीमत्स्वच्छन्दे—
गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः।
प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत्॥ (स्व० त० ८।३१) इति।
‘श्रीदेव्युवाच’ इस वाक्य का अभिप्राय यह कि प्रकाशमूर्ति परमशिव अपने को
विमर्शरूप में विभक्त कर ^१पश्यन्ती, मध्यमा और अन्ततः वैखरी वाणी का सहारा लेकर
प्रश्न पूछते हैं। मैं स्वयं शिव ही वैखरी पर्यन्त अपना विस्तार कर विमर्शरूप में प्रश्न
करता हूँ। ‘उवाच’ यह लिट् लकार के उत्तम पुरुष का एक वचन है। वर्तमान काल
के स्थान पर भूतकाल का प्रयोग यहाँ इस लिये किया है कि इस वक्तव्य का सार्वकालिक
महत्त्व है। काल इसको निगल नहीं सकता, इसलिये अनद्यतन काल का और यह ज्ञान
इन्द्रियों का विषय नहीं है, अतः परोक्ष भूतकाल का प्रयोग यहाँ किया गया है।
‘श्रीदेव्युवाच’ की इस व्याख्या से ‘श्रीभैरव उवाच’ इस वाक्य की भी व्याख्या हो जाती
है। इससे तात्पर्य यह निकला कि गुरुस्थानीय मैं प्रकाशात्मक परमशिव ही विश्व
पर अनुग्रह करने की इच्छा से परा-पश्यन्ती-मध्यमा और वैखरी पर्यन्त अपना
विस्तार कर विमर्शमयी देवी का स्वरूप धारण कर लेता हूँ, शिष्य बन जाता हूँ।
इस तरह से शिष्य के रूप में मैं स्वयं ही प्रश्न करता हूँ और स्वयं ही प्रकाशात्मक गुरु
का स्वरूप धारण कर उन प्रश्नों का उत्तर देकर तन्त्रशास्त्र की अवतारणा करता
हूँ। महास्वच्छन्द शास्त्र में इस विषय को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि स्वयं सदाशिव
देव ही गुरु और शिष्य का स्वरूप धारण कर प्रश्न और प्रतिवचन की पद्धति से
तन्त्रशास्त्र की लोक में अवतारणा करते हैं।
जानी जाती है, त्रिपुरा सम्प्रदाय में हमें दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुओं की
परम्परा के क्रम से प्राप्त हुई है।
१. इस विषय की विस्तार से चर्चा हमने विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० ५-६)
में की है।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५
देवदेव महादेव परिपूर्णप्रथामय ।
वामकेश्वरतन्त्रेऽस्मिन्नज्ञातार्थास्त्वनेकशः ॥१॥
तांस्तानर्थानशेषेण वक्तुमर्हसि भैरव ।
विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टिस्थितिसंहारकारी भैरवः परम-
शिवः । देवदेव देवा द्योतनात्मानो रव्यादयस्तेषां देवः प्रकाशकः । महादेवो
महाप्रकाशात्मा । अयमर्थः—तव महाप्रकाशोत्मकत्वात् त्वमेव विश्वं भासयसि,
न त्वां कोऽपि भासयितुमलमिति । तत्र श्रुतिः—
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ इति ।
(क० उ० ५।१५)
परिपूर्णप्रथामय प्रथा ज्ञानम्, परिपूर्णप्रथा विश्वविषयिणी ज्ञप्तिः, तन्मय तद्रूप ।
तत्र सर्वज्ञत्वात् त्वमेव सर्वान् बोधयितुमर्हसि, न त्वां कोऽपि बोधयितुमलमिति ।
अतो वामकेश्वरतन्त्रे चतुश्शतीशास्त्रे, अज्ञातार्था अविदितार्थाः, अनेकशो बहवः
विमर्शस्वरूपा देवी प्रकाशस्वरूप भगवान् भैरव से पूछती है—
हे देवदेव महादेव परिपूर्णप्रथामय भैरव ! इस पूर्वोपदिष्ट वामकेश्वर तन्त्र में
अनेक विषय अज्ञात हैं। उन विषयों को आप पूरी तरह से मुझे समझाइये ॥१॥
विश्व का भरण, रमण और वमन करने से उसकी सृष्टि, स्थिति और संहार का
कारणभूत भैरव¹ परमशिव ही है । इसको देवदेव इसलिये कहते हैं कि यह जगत् के
प्रकाशक सूर्य प्रभृति देवों को भी प्रकाश देने वाला है। इस तरह से महाप्रकाश स्वरूप
होने से यह महादेव है। देवी के प्रश्न का तात्पर्य यह है कि आप महाप्रकाश स्वरूप हैं,
अतः आप ही सारे जगत् को भासित करते हैं, आपको प्रकाशित करने में कोई भी समर्थ
नहीं है । कठोपनिषद् में बताया गया है कि वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता और न चाँद-
तारे ही वहाँ प्रकाशित होते हैं। यह आकाशीय विद्युत् भी वहाँ नहीं चमकती, तब इस
भौतिक अग्नि की बात ही क्या है ? उस ब्रह्म के प्रकाश के बाद ही यह सब प्रकाशित
होते हैं, इस ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त कर लेने के उपरान्त ही इनमें प्रकाश दिखाई पड़ता है ।।
प्रथा ज्ञान को कहते हैं । परिपूर्णप्रथा का अर्थ हुआ सारे विश्व का ज्ञान । इस तरह से
हे भगवन् भैरव ! आप परिपूर्णप्रथामय हैं । आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप ही सबको ज्ञान
प्रदान कर सकते हैं, आपको समझाने वाला दूसरा कोई नहीं है । अतः इस (पूर्वोपदिष्ट)
१. शक्तत्वात्-ख. ।
१. भैरव शब्द के पारिभाषिक अर्थ को समझने के लिये विज्ञानभैरव का उपोद्घात
(का० सं०) द्रष्टव्य है । आनन्दलहरी ग्रन्थ का भाषानुवाद (पृ० १४-१५ द्वितीय संस्करण) देखिये ।

६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः
सन्ति । तांस्तानर्थानशेषेण साकल्येन, वक्तुं व्यक्तीकर्तुम्, अर्हसि मम विमर्शपदवीं
प्रापयितुमर्हसीत्यर्थः ॥१॥
प्रकाशांशेन प्रतिवदति—
श्रीभैरव उवाच
शृणु देवि महागुह्यं योगिनीहृदयं परम् ॥२॥
त्वत्प्रीतया कथयाम्यद्य गोपितव्यं विशेषतः ।
१हे देवि ! विश्वसर्जनादि२व्यवहारक्रीडापरे विमर्शविग्रहे। महागुह्यं लोके गोप-
नीयम्। यद्वस्तु ३यावत् तत्र न मनः प्रवर्तते तत् तावत्कालमतीन्द्रियगोचरं भवति,
अस्य तु सर्वदा मनोवागिन्द्रियातीतत्वान्महागुह्यत्वम् । योगिनीहृदयं योगिन्याः
वामकेश्वर तन्त्र में, १चतुःशती (चार सौ श्लोकों वाले) शास्त्र में जो अनेक अविदित
अर्थ हैं, उन सबको आप पूरी तरह से मुझे बताइये, जिससे कि वे सारी बातें मेरी समझ
में आ जाँय ॥१॥
२प्रकाशस्वरूप भगवान् भैरव इसका उत्तर देते हैं—
हे देवि ! इस महागुह्य उत्कृष्ट योगिनीहृदय शास्त्र को तुम सुनो । तुम्हारी
प्रसन्नता के लिये ही इसे मैं सुना रहा हूँ । इसे विशेष रूप से गुप्त ही रखना
चाहिये ॥२॥
जगत् के सृष्टि-संहार आदि का खेल करने वाले विमर्शस्वरूपिणी हे देवि ! लोक में
छिपाने लायक वस्तु को गुह्य कहा जाता है । कोई भी वस्तु जब तक उसको जानने के
लिये मन प्रवृत्त नहीं होता, तब तक अज्ञात ही रहती है । योगिनीहृदय में प्रतिपादित
किये जाने वाले विषय में तो मन और वाणी की प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती, अतः इसको
महागुह्य कहा गया है। योगिनीहृदय का अभिप्राय है कि इस ग्रन्थ में योगिनी (स्वसंवित्
स्वरूपा भगवती त्रिपुरा) का हृदय (स्वरूप) उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे कि
१. 'हे' नास्ति-ज. झ. । २. 'व्यवहार' नास्ति-क. ख. । ३. 'यावत्''''प्रवर्तते'
नास्ति-ने. ज. झ. उ. ।
१. अमृतानन्द ने दीपिका में चार सौ श्लोकों वाले नित्याषोडशिकार्णव को चतुःशती-
शास्त्र के नाम से अनेक स्थलों पर उद्धृत किया है। अमृतानन्द की इस उक्ति से
भी चतुःशती-शास्त्र से योगिनीहृदय की भिन्नता सिद्ध होती है।
२. प्रकाश और विमर्श शब्दों की विभिन्न आचार्यों द्वारा की गई व्याख्या के लिये
नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० ८३-८४ टि०) तथा लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग
का उपोद्घात (पृ० ४०) देखिये।

प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७
स्वसंविदो हृदयमिवाविर्भावभूमित्वाद् हृदयम्। अत्र तु योगो नाम 'समस्तवस्तु-
समवायसम्बन्धः, तेन भासत इति योगिनी। तदुक्तमभियुक्तैः—
देशकालपदार्थात्म यद्यद् वस्तु यथा तथा²।
तत्तद्रूपेण या भाति तां श्रये ³सांविदीं कलाम् ॥ इति।
(सौ० हृ० ४)
परम् उत्कृष्टम्, सर्वज्ञानोत्तरत्वात्। अत एव वक्ष्यति—"एतज्ज्ञात्वा
वरारोहे सद्यः खेचरतां व्रजेत्" (१।५) इति। एतत् शृणु विमर्शपदवीं प्रापय ॥२॥
त्वत्प्रीत्या ⁴त्वदेकसामरस्यहेतोः कथयामि। अद्य पुरा न कस्यचिदाख्यात-
मतिरहस्यत्वात्, अतो ⁵हेतोर्विशेषतो गोपितव्यम्। आत्माहंभावभावनया भाव-
यितव्यमित्यर्थः।
अत्यन्तगोपनीयतामेव द्रढयितुमाह—
कर्णात् कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ॥३॥
सामान्य जन के हृदय में अपना ज्ञान उन्मिषित होता है। यहाँ योग का अर्थ है जगत् की
सारी वस्तुओं के साथ ज्ञान का समवाय सम्बन्ध। इससे भासित होने वाली है योगिनी।
शिवानन्द महायोगी ¹सौभाग्यहृदयस्तोत्र में कहते हैं कि देश, काल अथवा पदार्थ
के रूप में जो भी वस्तु जिस-किसी भी रूप में भासित होती है, उन सभी रूपों में जो
भासित होती रहती है, उस सांविदी (ज्ञानमयी) कला की मैं शरण लेता हूँ ॥
यह अनुत्तर ज्ञान सभी लौकिक ज्ञानों से श्रेष्ठ है। इसी लिये आगे (१।५) कहा
जायगा कि इस ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति तत्काल परम पद में लीन हो जाता
है। इस ज्ञान को तुम अपने मन में बैठाने का प्रयत्न करो ॥२॥
तुम्हारी प्रसन्नता के लिये, शिव और शक्ति के सामरस्य-लाभ के लिये ही इसे मैं
सुना रहा हूँ। इससे पहले मैंने इसे किसी को भी नहीं सुनाया है, क्योंकि इसमें गहरा
रहस्य छिपा हुआ है। इसी लिये इस ज्ञान को बहुत छिपा कर रखना चाहिये, अपने
मन में ही इसकी भावना करनी चाहिये।
ज्ञान की अत्यन्त गोपनीयता को ही भगवान् पुनः पुष्ट करते हैं—
यह ज्ञान एक कान से दूसरे कान तक उपदेश के क्रम से ही पृथिवी तल पर
अवतरित हुआ है ॥३॥
१. सर्व-ने. ज. झ. उ. । २. यथा-घ. ज. झ. उ. । ३. संविदं-ख. ग. घ. ने. ज.
झ. उ. । ४. त्वदैकस्थ्य-उ., त्वदेकरहस्य-ने. ज. झ. । ५. 'हेतोः' नास्ति-ने. ज. झ. उ. ।

  1. यह स्तोत्र नित्याषोडशिकार्णव के वाराणसी संस्करण के परिशिष्ट (पृ० ३०४-
    ३०७) में प्रकाशित हो चुका है।