योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४० ]
त्रिविध प्रमाता (सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकल) १६२-१६६
गुरु पारम्पर्य क्रम १७२-१७३
निगर्भार्थ का निरूपण १७४-१७७
कौलिकार्थ का निरूपण (चक्र, देवता, विद्या, गुरु और शिष्य की एकता) १७८-१९८
वाक्चतुष्टय १९१-१९४
सर्वरहस्यार्थ का निरूपण (स्वात्मबुद्धि) १९८-२०९
महातत्त्वार्थ का निरूपण (विश्वोत्तीर्ण-विश्वमय तत्त्व में स्वात्मनियोजन) २०२-२१२
महातत्त्वार्थ के अधिकारी और अनधिकारी २१३-२१६
मन्त्रसंकेत की फलश्रुति २१७-२१८
३. पूजासंकेत
त्रिविध पूजा—नाम और लक्षण २१९-२२३
परा पूजा की श्रेष्ठता और उसका स्वरूप २२३-२३०
षोढा न्यास (गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि, पीठ) २३०-२४२
श्रीचक्र न्यास (संहार क्रम) २४३-२५९
श्रीचक्र न्यास (सृष्टि क्रम) २५९-२६८
करशुद्ध्यादि न्यास २६८-२६९
विद्या न्यास २६९-२७१
तत्त्व न्यास २७१-२७३
परा न्यास २७१-२७४
चतुर्विध न्यास का कालविभाग २७४-२७५
आसन परिकल्पन और बलिदान २७५-२७७
विघ्नाप्रसारण और प्राकार-चिन्तन २७७-२८०
सामान्यार्घ्य से सूर्य आदि नवग्रहों का पूजन २८०-२८२
बाह्य श्रीचक्र का उद्धार व पुष्पांजलि निवेदन २८२-२८५
सामान्यार्घ्य की विधि (वह्नि, सूर्य और इन्दु कलाओं का अर्चन) २८५-२९२
विशेषार्घ्य की विधि २९२
गुरुपादुका का पूजन २९३
प्रसादग्रहण, आन्तर होम और पूर्णाहुति २९४-२९९
श्रीचक्र की पूजा का क्रम ३००-३०१
गणेश, बटुकभैरव और गुरुपंक्ति का पूजन ३०१-३०२
बैन्दव चक्र में कामेश्वर-कामेश्वरी का अर्चन ३०२-३०७
नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं का पूजन ३०७-३०८, ३५७