योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४६ ]
चक्र की कामकलारूपता ३३-३४
अकुल आदि स्थानों में चक्र की त्रिविध भावना ३४-४२
अकुल और कुल मध्यवर्ती नवाधार निरूपण ३४-४०
बिन्दु से उन्मनी पर्यन्त नाद-कलाओं का स्वरूप और उच्चारण काल ४२-५२
देश और काल से अनवच्छिन्न निसर्गसुन्दर परम तत्त्व ५२-५३
अम्बिका आदि, शान्ता आदि शक्तियाँ तथा वाक्चतुष्टय ५३-५७
अम्बिका आदि, शान्ता आदि शक्तियाँ तथा पीठचतुष्टय ५७-६०
लिङ्गचतुष्टय ६०-६३
विद्या तथा शक्तिचतुष्टय आदि की वाच्यवाचकता ६३
जाग्रदादि अवस्था चतुष्टय ६४
स्वसंविदात्मक त्रैपुर स्वरूप की सर्वोत्कृष्टता ६४-७४
संवित् की मुद्रारूपता और मुद्रा पद की निरुक्ति ७४-७६
दशविध मुद्राओं का आन्तर और बाह्य स्वरूप ७६-८८
परम तत्त्व की चक्रमयता ८९-९०
श्रीचक्र की त्रिधा तथा नवधा भावना ९०-९४
श्रीचक्र का सृष्टि-संहार क्रम और त्रिपुरा चक्र के ज्ञान का फल ९४-९७
नौ चक्रों का स्वरूप और उनके नामों की निरुक्ति ९७-१००
श्रीचक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा का विधान १००-१०१
चक्रसंकेत की फलश्रुति १०१-१०३
२. मन्त्रसंकेत
मन्त्रसंकेत का उपक्रम और उसके ज्ञान का फल १०४-१०५
करशुद्धिकरी आदि नौ विद्याएं १०५-१११
नौ विद्याओं का न्यास १११-११३
अकुल आदि नवाधारों में चक्रेश्वरियों के साथ नौ चक्रों का न्यास १०३-११४
त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरियों की नौ चक्रों में पूजा ११४-११५
नौ विद्याओं की एकाकारता ११६
मन्त्रसंकेत की षड्विधता ११६-११८
भावार्थ का निरूपण (श्रीविद्या का अक्षरार्थ) ११८-१३६
मातृकाचतुष्टय तथा कामकला १२८-१३४
सम्प्रदायार्थ का निरूपण १३६-१७४
विद्या की विश्वमयता तथा विश्वोत्तीर्णता १३८-१४५
षट्त्रिंशत्तत्त्व निरूपण १४६-१४९