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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

[ ३० ]

में सृष्टिक्रम (श्लो० ६९-८१) से यह किया जाता है। इसके बाद करशुद्ध्यादि न्यास,
विद्या न्यास, श्रीकण्ठादि न्यास, तत्त्व न्यास और व्यापक न्यास का विधान है (श्लो०
८१-८६)। अन्त में (श्लो० ८६) परा न्यास का विधान कर तीन श्लोकों (८७-८९)
में न्यास प्रकरण का उपसंहार करते हुए चतुर्विध न्यास का कालभेद से विनियोग बताया
गया है। परा न्यास में देवी को सौम्य, आग्नेय और अमृतमय द्रव्यों से तृप्त किया जाता
है। यह परापरा पूजा का अंग है।
इन चतुर्विध न्यासों से देवमय बना साधक देवी के आसन के रूप में श्रीचक्र की
रचना करता है और फिर इसी में देवी की आन्तर और बाह्य वरिवस्या करता है।
बाह्य पूजा से पहले आन्तर वरिवस्या करनी चाहिये, इस सिद्धान्त को स्वीकार कर ज्ञान-
दीपविमर्शिनी आदि प्राचीन पद्धति ग्रन्थों में सूर्योपस्थान, सन्ध्या, तर्पण आदि प्रकरणों
की दो प्रकार की व्याख्या की गई है। यहाँ भी सर्वप्रथम बाह्य और आन्तर विघ्नों के
अपसारण की विधि बताई गई है। तब सामान्य अर्घ्य से ग्रह आदि परिवार के साथ
आन्तर और बाह्य सूर्यपूजा का विधान है। श्रीचक्र का निर्माण कपूर, केसर, रोचना,
अगुरु, कुंकुम आदि के घोल से किया जाता है। श्रीचक्र और साधक के बीच के स्थान
में सामान्य और विशेष अर्घ्य के पात्रों की प्रतिष्ठा की जाती है और इनमें सूर्य, चन्द्र
और वह्नि की ३८ कलाओं की पूजा की जाती है। अर्घ्यशुद्धि के बाद उसको पहले गुरु-
पंक्ति को निवेदित कर मूलविद्या का जप करते हुए साधक स्वात्मयजन के लिये स्वयं
भी ग्रहण करता है।
इसके बाद श्रीचक्र का पूजन आरम्भ होता है। सबसे पहले गणेश और दूतरी,
क्षेत्रेश और दूतिका का पूजन किया जाता है। बाह्य द्वार पर स्वस्तिका आदि देवियों की
पूजा की जाती है। त्रिकोण चक्र में दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ क्रम से विभक्त त्रिविध
गुरुपंक्ति का पूजन और मध्य बिन्दु में कामेश्वर-कामेश्वरी के युगल स्वरूप की आराधना
की जाती है। त्रिकोण में ही काम्य कर्म के अनुसार तिथि-नित्याओं का पूजन किया
जाता है। आगे (३।१६७) बताया गया है कि इनकी पूजा चतुरस्र में भी की जा
सकती है। इसके बाद संहार क्रम से नौ चक्रों में प्रकटा आदि नौ योगिनियों की आरा-
धना की जाती है। इन्हीं के साथ नि० षो० में प्रदर्शित नौ चक्रों के आवरण देव-
ताओं का भी पूजन किया जाता है। इसका प्रकार यहाँ ११३-१६७ श्लोकों में बताया
गया है।
इस प्रकरण में प्रकटा आदि, त्रिपुरा आदि और करशुद्धिकरी आदि का निर्वचन भी
बताया गया है। षोडशदल चक्र की वासना के प्रसंग में यहाँ (३।१२७) षोडश प्राणों
का उल्लेख किया गया है। दीपिकाकार का कहना है कि दस प्राण तो प्रसिद्ध हैं। बाकी

[ ३१ ]

के छः प्राणों की आगमान्तर में खोज करनी चाहिये । संभव है ये नाम 'बौद्ध तन्त्रों में
उपलब्ध हों । तृतीय चक्र की वासना में पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत की चर्चा है ।
इन शब्दों के विषय में हम अन्यत्र² लिख चुके हैं । चतुर्थ चक्र की वासना में बारह
ग्रन्थियों का उल्लेख है । यहाँ छः चक्रों में प्रत्येक के ऊपर और नीचे दो-दो ग्रन्थियाँ
मानी गई हैं । इनके नाम नेत्रतन्त्र ( ७।२२-२५ ) में मिलते हैं । यहीं आगे (३।१८४)
बताया गया है कि इन बारह ग्रन्थियों के भेदन से साधक को सुषुम्ना नाडी में प्रवेश
मिलता है । चतुर्दशार, बहिर्दशार, अन्तर्दशार और वसुकोण चक्र में यहाँ ९ वर्ग और
४२ वर्ण वाली भूतलिपि का विन्यास बताया गया है । हम अभी बता चुके हैं कि भूत-
लिपि मध्यमा वाणी का स्थूल रूप है । पंचम चक्र की वासना में नौ नाद और नौ रन्ध्रों
की चर्चा है । नौ नादों की चर्चा हम ³अन्यत्र कर चुके हैं । दीपिकाकार ( ३।१४२ )
ने नवरन्ध्र पद की व्याख्या नवाधारपरक करके उनके नाम गिनाये हैं और इसके लिये
स्वच्छन्दसंग्रह को प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है । यहाँ दीपिकाकार द्वारा दिये
गये नामों और स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में परिगणित नामों में समानता नहीं है । इस
तरह के नामों का उल्लेख हमें अभी तक कहीं नहीं मिला । अतः इस विषय की हम
अभी विशेष चर्चा करने में असमर्थ हैं । नवम चक्र की वासना में महात्रिपुरसुन्दरी को
पुनः महाकामकला स्वरूप बताया गया है । इस विषय की चर्चा हम यहीं कर चुके हैं ।
दीपिकाकार ने बताया है कि कामबीज का उद्धार नि० षो० ( १।१८४ ) में बताई गई
विधि से किया जाता है ।
नौ चक्रों और नौ नित्याओं के पूजन के बाद देवी को कुलदीप निवेदित किया जाता
है । यहाँ ( ३।१६९-१८९ ) जप का एक विशिष्ट प्रकार बताया गया है, जो कि
हमारी जानकारी में अन्य किसी ⁴ग्रन्थ में नहीं मिलता ।

जप
श्रीविद्या में वाग्भव, कामराज और शक्ति बीज नाम के तीन कूट हैं । ⁵आधार


१. "स्थितः पादतले वायुर्वैरम्भो धनुराकृतिः" वसन्ततिलक ( ८।५ ) का यह श्लोक
इस ओर इंगित करता हुआ लगता है । झ. मातृका में 'प्राणादिषोडश' के स्थान
पर 'प्राणादिदश' ( पृ० ३१८ ) पाठ है । पृ० ३१७ की टिप्पणी भी देखिये ।
२. देखिये-नि० षो० उपोद्घात, पृ० १०८ की तीसरी टिप्पणी ।
३. द्रष्टव्य-नि० षो० उपोद्घात, पृ० ६३-६५ तथा टिप्पणियां ।
४. इस विषय का विशेष परिचय "तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि" नामक ग्रन्थ के
'जपविज्ञान' और 'नादतत्व' शीर्षक निबन्धों से प्राप्त किया जा सकता है ।
स्वच्छन्दतन्त्र ( ४।२५४-३३४ ) में प्रकारान्तर से यह विषय वर्णित है ।
५. आधार शब्द यहाँ मूलाधारपरक है । सौन्दर्यलहरी की लक्ष्मीधरा ( पृ० ६९ )

[ ३२ ]
हृदय और बिन्दुस्थान (भ्रूमध्य) में तीन कुण्डलिनियां स्थित हैं। वह्नि, सूर्य और सोम
कुण्डलिनी के नाम से ये प्रसिद्ध हैं। तीन बीजों के अन्त में विद्यमान हृल्लेखाओं (ह्रींकार)
के कामकला नामक अवयव में वर्तमान हार्धकलाओं में ये कुण्डलिनियाँ स्थित हैं। अकुल
से ¹भ्रूमध्य पर्यन्त नौ स्थानों में भावित त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में से तीन तीन
चक्रों की एक एक बीज और कुण्डलिनी में नाद रूप से भावना ही जप कहलाती है।
इस जपविधि में त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों की तथा वाग्भव बीज की मूलाधार
स्थित वह्निमण्डल में स्थिति मानी जाती है। वाग्भव बीज के अन्त में स्थित हृल्लेखा के
कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी वह्निकुण्डलिनी जब हृदय स्थित कामराज बीज
तक उठती है, उस समय उसकी ऊपर उठते हुए नाद के रूप में भावना की जाती है।
इसी को वाग्भव बीज जप कहा जाता है। इसी तरह से सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन
चक्रों की तथा कामराज बीज की हृदय स्थित सूर्यमण्डल में स्थिति मानी जाती है।
कामराज बीज के शिखर पर स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर में वर्तमान हार्धकला रूपी
सूर्यकुण्डलिनी जब भ्रूमध्य स्थित शक्ति बीज तक उठती है, उस समय उसकी भी ऊपर
उठते हुए नाद के रूप में भावना की जाती है। इसको कामराज बीज जप कहा जाता
है। सर्वरोगहर आदि तीन चक्रों की तथा शक्ति बीज की स्थिति भ्रूमध्य स्थित सोम-
(इन्दु)मण्डल में मानी जाती है। शक्ति बीज के शिखर पर स्थित हृल्लेखा के कामकलाक्षर
में वर्तमान हार्धकला रूपी सोमकुण्डलिनी जब भ्रूमध्य से उठ कर ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त पहुँचती
है, उस समय समना की सीमा को लाँघ कर नाद उन्मना में प्रविष्ट हो रहा है, इस प्रकार
की भावना की जाती है। इसी को शक्ति बीज जप कहा जाता है।
और अरुणामोदिनी (पृ० ७२) टीका में रुद्ररहस्य के प्रमाण से मूलाधार को
पृथिवी-तत्त्वात्मक माना है और उसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है—"मूले गुदस्थाने
सर्वाधारभूतं चक्रं मूलाधारमिति" (पृ० ६९), "आ समन्ताद् ध्रियते शरीरमनेने-
त्याधारः। मूले गुदस्थाने स्थित आधारो मूलाधारः। अथवा मूलं सर्वेषां चक्राणा-
मादिकारणम्, स चासावाधारश्च मूलाधारः, तस्मिन् सर्वचक्राधारे चतुर्दलत्वेन
कुण्डलिनीशक्तेर्नित्यनिवासत्वेन प्रसिद्धे मूलाधाराख्ये चक्रे" (पृ० ७२)। यहाँ
बताया गया है कि पृथिवी-तत्त्वात्मक मूलाधार के अभाव में या तो देह गिर पड़ेगा
अथवा ऊपर उठ जायगा।
१. यहाँ (पृ० ३५९) दीपिकाकार ने अकुल से बिन्दु पर्यन्त स्थानों की चर्चा की है।
पहले (पृ० ११३) भी उन्होंने यही व्याख्या की है। इसका कारण भी उन्होंने
(पृ० ३६-३७) बताया है। इसके लिये पृ० ३६-३७ और पृ० ११३ की टिप्पणी
देखिये। श्रीविद्यार्णव में दीपिकाकार के मत का ही अनुकरण है।

[ ३३ ]
ऊपर बताये गये तीनों बीजों की हृल्लेखायों में हकार, रेफ, ईकार, बिन्दु, अर्धचन्द्र,
रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना और उन्मना-ये बारह कलाएं रहती
हैं। द्वादशान्त में जाकर इन सबका लय हो जाता है। वाग्भव बीज स्थित कलाओं का
कामराज बीज स्थित नाद में और कामराज बीज की कलाओं का शक्ति बीज स्थित नाद
में विलय हो जाता है। अतः इस नाद की बारह कलाओं की स्पष्ट भावना केवल अन्तिम
शक्ति बीज में ही की जा सकती है। इस जप में छः शून्यों की, पाँच अवस्थाओं की
और सात विषुवों की भी भावना की जाती है।
५० या ५१ पीठ
योगिनीहृदय के पूजासंकेत के षोढान्यास प्रकरण में पीठों के नाम ( ३।३४-४०)
गिनाये गये हैं। पीठ ५० हैं या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने
अन्तिम पक्ष का समर्थन किया है। हम नि० षो० के उपोद्घात (पृ० ७८-८३) में पीठ-
विषयक विचार प्रस्तुत कर चुके हैं। वहाँ पीठों की संख्या से संबद्ध विभिन्न पक्षों की भी
चर्चा की गई है। इनका उल्लेख शैव और बौद्ध तन्त्रों में भी मिलता है। उनमें चार
पीठ प्रायः सर्वत्र मान्य हैं। प्राचीन ग्रन्थों में पीठों के पीठ, उपपीठ, क्षेत्र, उपक्षेत्र, सन्दोह,
उपसन्दोह, श्मशान, उपश्मशान आदि विभाग मिलते हैं। तन्त्रालोक तथा कौलज्ञाननिर्णय
में भी इनका उल्लेख मिलता है। बौद्ध तन्त्रों में ऊपर के विभागों के अतिरिक्त मेलापक,
उपमेलापक को जोड़कर पीठों के, जिनको कि यहां ^१भूमि नाम भी दिया गया है, द स
प्रकार वर्णित हैं। हेवज्रतन्त्र में पीलव, उपपीलव विभाग को मिलाकर भूमियों की
संख्या ^२बारह मानी गई है। वसन्ततिलक आदि अनेक बौद्ध तन्त्रों में सब मिलाकर
पीठों की संख्या २४ तथा हेवज्रतन्त्र में ३२ है। तन्त्रालोक और उसकी टीका
में ३४ पीठ परिगणित हैं। ^३अर्बुद को अर्धपीठ माना गया है। तन्त्रालोक की
और बौद्ध तन्त्रों की सूचियों के अनेक नाम एक सरीखे हैं।
आजकल पीठों के ५१ विभाग वाला पक्ष ही बहुत प्रचलित है। भास्करराय के
अनुसार योगिनीहृदय को भी यही पक्ष मान्य है। डॉ० डी० सी० सरकार ने
"दी शाक्त पीठाज्" नामक ग्रन्थ में प्रधानतः 'पीठनिर्णय' अथवा 'महापीठनिरूपण'
नामक ग्रन्थ के आधार पर पीठविषयक विचार प्रस्तुत किये हैं। यहाँ इस ग्रन्थ का
उन्होंने सम्पादन भी किया है। उन्होंने इस ग्रन्थ का जो काल निर्धारित किया है
(पृ० २३-२४), उससे ज्ञात होता है कि यह ग्रन्थ योगिनीहृदय से अर्वाचीन
१. केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ की शोधपत्रिका 'धीः' का प्रथम
अंक, पृ० १४०-१४१ देखिये।
२. वहीं, पृ० १४२-१४३ देखिये।
३. "अर्बुदमर्धपीठं तु" (कौलज्ञाननिर्णय, ८।२२)।
३

१. प्रथम विश्राम: चक्र-संकेत (श्रीचक्र नव-आवरण रहस्य एवं बिन्दु-त्रिकोण विमर्श)

[ १४ ]
है। पीठविषयक विचार प्रस्तुत करते हुए लेखक ने बौद्ध चतुष्पीठ तन्त्र का उल्लेख
किया है, किन्तु इस ग्रन्थ का प्रस्तुत पीठ विभाग से कोई संबन्ध नहीं है। उनके द्वारा
उद्धृत (पृ० ११) आत्मपीठ, परपीठ आदि नामों से ही यह स्पष्ट हो जाता है। डॉ०
सरकार द्वारा उद्धृत ज्ञानार्णव, कुब्जिकातन्त्र, तन्त्रसार आदि ग्रन्थ कालिक दृष्टि से
योगिनीहृदय से अर्वाचीन हैं। अतः प्रस्तुत पीठविषयक विचार हमारी दृष्टि में योगिनी-
हृदय को केन्द्रबिन्दु मानकर किया जाना चाहिये। डॉ० सरकार का प्रयास अपने आप
में महत्त्वपूर्ण होते हुए भी नूतन सामग्रियों की उपलब्धि के कारण अब कुछ पिछड़ गया
है। यहाँ तन्त्रालोक और उसकी टीका में संगृहीत सामग्री का उपयोग नहीं किया गया।
पीठों के सही नाम का निर्णय करना भी एक समस्या है। प्राचीन शैव, शाक्त तथा
बौद्ध तन्त्रों की नामावलियों के सहारे ही इनका सही स्वरूप निश्चित किया जा सकता
है। पीठविषयक सबसे बड़ी समस्या है, उनकी वर्तमान भौगोलिक स्थिति। कौन पीठ भारत
के किस प्रदेश में किस स्थान पर है, इसका निर्णय करने के लिये भी अनेक प्रयास किये
गये हैं, किन्तु यह कार्य इतना सरल नहीं है। मुख्य चार पीठों—कामरूप, पूर्णगिरि,
जालन्धर और ओडियान—की अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंगों की स्थिति के विषय में भी
हम कोई निर्विवाद समाधान नहीं प्रस्तुत कर पाये हैं। जालन्धर पीठ की भौगोलिक
स्थिति को सुनिश्चित करने के लिये हालैण्ड की उचट्रेष्ट युनिवर्सिटी योजना बनाने का
उपक्रम कर सकती है, किन्तु भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार अथवा विद्यासंस्थाएँ इस
तरफ से उदासीन हैं।
योगिनीहृदय के तीनों संकेतों का हमने यहाँ संक्षिप्त परिचय दिया है। दीपिका
टीका, भाषानुवाद और स्थान स्थान पर दी गई टिप्पणियों के सहारे इनका विस्तृत
विवरण जाना जा सकता है। दीपिका के सहारे हमें अनेक लुप्तप्राय विषयों का पता
चलता है। अतः उसका अपना महत्त्व है। ऐसे कुछ स्थलों की हम यहाँ चर्चा करना
चाहते हैं।
नौ आधार
वरिवस्यारहस्य की स्वोपज्ञ प्रकाश टीका (पृ० १६) में भास्करराय ने लिखा है
कि सुषुम्ना नाडी के मूल और अग्र भाग में दो सहस्रदल कमल हैं और इन दोनों के बीच
में अष्टदल, षड्दल आदि तीस पद्म हैं। इनका स्वच्छन्दसंग्रह आदि में विस्तार से वर्णन
किया गया है। स्वच्छन्दसंग्रह अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है। भास्करराय को
इस विषय की जानकारी दीपिका से ही मिली होगी। "अकुले' विषुसंज्ञे च" (१।२५)
१. दीपिकाकार ने दो स्थलों पर (१।२५; २।८) सुषुम्ना मूल स्थित अरुण सहस्रदल
कमल को अकुल तथा दो स्थलों पर (३।५, ३।१३७) ब्रह्मरन्ध्र में स्थित अधोमुख
श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा है। इस प्रसंग में पृ० ३२९ की पहली

[ ३५ ]

इत्यादि श्लोकों की व्याख्या के प्रसंग में अमृतानन्द ने स्वच्छन्दसंग्रह के अनेक वचन
उद्धृत किये हैं, जिनसे पता चलता है कि सुषुम्ना नाडी के नीचे और ऊपर रक्त और
श्वेत वर्ण के कुल और अकुल नामक दो सहस्रार कमल स्थित हैं तथा इन दोनों
के बीच में तीस आधार पंकज विद्यमान हैं। खेद का विषय है कि इन सबका वर्णन
करने वाले सभी वचन उद्धृत न होकर केवल योगिनीहृदय द्वारा परिगणित नौ
आधारों से संबद्ध वचन ही यहाँ संगृहीत हुए हैं। ये नौ आधार हैं—१. अकुल,
२. विषु^१ ( अष्टदल या षड्दल ), ३. वह्नि ( मूलाधार ), ४. शाक्त (स्वाधिष्ठान)।
५. नाभि ( मणिपूर ), ६. अनाहत ( हृदय ), ७. विशुद्ध ( द्वि ), ८. लम्बिकाग्र^३
( अष्टदल ) और ९. आज्ञा। चक्रसंकेत ( १।२८ ) में सूचित इन नौ आधारों को मन्त्र-
संकेत ( २।८ ) में भी स्मरण किया गया है। आगे पूजासंकेत ( ३।१४२ ) में नौ नादों
और नौ रन्ध्रों का उल्लेख है। दीपिकाकार ने रन्ध्र पद की आधारपरक व्याख्या कर
नौ आधारों के नाम बताये हैं और इसमें स्वच्छन्दसंग्रह के वचन को प्रमाण के रूप में
उद्धृत किया है। हम पहले ही (पृ० ३८) बता चुके हैं कि इन दोनों में समानता नहीं
है। यहाँ ( ३।१४२ ) प्रथम दो स्थलों (१।२८; २।८) में सूचित प्रथम दो आधारों—
अकुल और विषु—का उल्लेख नहीं है। बाक़ी के सारे नाम एक सरीखे हैं। तदूर्ध्ववज्र,
पद्मण्ठ अथवा मध्यम, वज्रकण्ठ—ये दो नाम नये हैं। यहाँ ( पृ० ३३४ ) उद्धृत
स्वच्छन्दसंग्रह की तीसरी पंक्ति में बताया गया है कि इन दो और लम्बिका को छोड़


टिप्पणी देखनी चाहिये। पृ० ३५ पर उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में स्पष्ट ही
सुषुम्ना के अधोभाग में स्थित ऊर्ध्वमुख अरुण सहस्रदल कमल को कुल तथा सुषुम्ना
के ऊर्ध्वभाग में स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा है। पृ० २२५
पर निर्दिष्ट स्वच्छन्दसंग्रह के वचन में भी ब्रह्मरन्ध्र स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रार
को ही अकुल कहा गया है। तृतीय पटल के उपर्युक्त दो स्थलों की दीपिकाकार ने
तदनुसार ही व्याख्या की है। प्रथम और द्वितीय पटल के दो स्थलों पर योगिनी-
हृदय के अकुल पद की व्याख्या करते समय वे सुषुम्ना के अधोभाग में स्थित ऊर्ध्व-
मुख अरुण सहस्रदल कमल को भी लाक्षणिक रूप से अकुल मान लेते हैं। लक्षणा
का प्रयोजन यह दिखाना है कि मूलाधारगत कुल पद्म से यह भिन्न है ( कुलादन्य-
दकुलम् — पृ० ३४)।
१. योगिनीहृदय में नवचक्रात्मक श्रीयन्त्र से भिन्नता दिखाने के लिये कायगत नौ
चक्रों को आधार या रन्ध्र कहा गया है।
२. मूल पृ० ३६ की दूसरी तथा पृ० ११३ की टिप्पणी देखिये।
३. सेतुबन्धकार भास्करराय ने लम्बिका के पर्याय के रूप में इन्द्रयोनि शब्द का
उल्लेख किया है ( १।२५-२७, २।८, पृ० ४३, ९६)।

[ ३६ ]
देने से 'छः चक्र रह जाते हैं। आजकल योगशास्त्र के ग्रन्थों में इन छः चक्रों को ही
प्रधानता मिली हुई है। इन छः चक्रों का उल्लेख योगिनीहृदय² में भी डाकिनी आदि
छः धातुदेवताओं के प्रसंग में मिलता है। सौन्दर्यलहरी³ में भी छः चक्रों को मान्यता
मिली है। स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन में छः चक्रों और नौ आधारों की एकजातीयता
बताई गई है, किन्तु नेत्रतन्त्र⁴ में षट्चक्र और षोडश आधार की अलग-अलग गणना
की गई है और क्षेमराज⁵ ने कुलप्रक्रिया के अनुसार सोलह आधारों का वर्णन भी किया
है। तन्त्रालोकविवेक⁶ धृत नन्दिशिखातन्त्र में भी षट्चक्र और षोडश आधार का उल्लेख
है। नेत्रतन्त्र के समान ⁷हठयोग के ग्रन्थों में भी षट्चक्र, षोडश आधार, लक्ष्यत्रय और
व्योमपंचक का वर्णन मिलता है। इन सबका तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त रुचिकर हो
सकता है। श्रीतत्त्वचिन्तामणि के छठे षट्चक्रनिरूपण प्रकरण में वर्णित षट् चक्रों की
प्रक्रिया स्वच्छन्दसंग्रह (दीपिका १।२५-२६ में उद्धृत) के वर्णन से कुछ भिन्न है।
ऐसे स्थलों पर अपने-अपने सम्प्रदाय के अनुसार ही भावना की पद्धति शास्त्रकारों ने
मान्य की है।
वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति
वर्णों की, विशेष कर १६ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया दीपिकाकार ने भूतलिपि
की वासना के प्रसंग में (पृ० ३२५-३३०) परापंचाशिका (श्लो० ३२-४४) के आधार
पर बताई है। स्वनिर्मित ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय (१।१६-२६) में भी ग्रन्थकार ने इस
विषय का वर्णन किया है, किन्तु दीपिका में वह केवल परापंचाशिका का उल्लेख
करते हैं, अपने ग्रन्थ का नहीं। इससे परापंचाशिका के प्रति अमृतानन्द का आदरभाव
प्रकट होता है। परापंचाशिका का यह वर्णन परात्रिंशिका (श्लो० ५-९) पर आधृत
लगता है। यहाँ संक्षेप में उसको प्रस्तुत किया जा रहा है।
१. "षट्चक्राणि त्रिहीनकम्” (पृ० ३३४)।
२. विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके ।
आज्ञायां धातुनाथांश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥ (१।३०)
३. महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसे ॥ ९ ॥
४. ऋतुचक्रं स्वराधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् (७।१)
५. नेत्रतन्त्र के उक्त श्लोक की व्याख्या देखिये।
६. षट्चक्रं षोडशाधारं कुलं जानाति सुव्रते (१३।१८०)।
७. नित्यनाथ की सिद्धसिद्धान्तपद्धति (पृ० ७-८) में नौ चक्र माने गये हैं।

[ ३७ ]
सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का
प्रतीक माना है। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियां सत्ता के अंश हैं। इनसे क्रमशः
अकार, इकार और उकार की अभिव्यक्ति होती है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियां
उद्रेक के अंश हैं। इनसे क्रमशः आकार, ईकार और ऊकार का आविर्भाव होता है।
परापंचाशिका में भी यही क्रम वर्णित है। वहाँ इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उप-
लक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री का भी ग्रहण कर लेना चाहिये। चार षण्ढ
स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए वहाँ ( १।२०-२१ ) बताया गया है
कि प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदिशिव अपनी
विमर्श शक्ति को जगाकर जब इच्छा शक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि करना
चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है। इच्छा शक्ति के
उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल अवस्था में
मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है। इनमें ह्रस्व स्वरों की अभिव्यक्ति
में इच्छा ( इकार ) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन ( ईकार ) का योगदान
रहता है। शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का क्रमिक
वर्णन मिलता है। १वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थानों के बीच में ऋकार
और ऌकार का उच्चारण-स्थान माना गया है। सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति को बताते हुए
कहा गया है कि इच्छा ( इकार ) और अनुत्तर ( अकार ) के संयोग से एकार की,
एकार और अनुत्तर के योग से ऐकार की, उन्मेष ( उकार ) और अनुत्तर के संयोग से
ओकार की और ओकार तथा अनुत्तर के योग से औकार की निष्पत्ति होती है। बिन्दु
के विषय में बताया गया है कि बिन्दु वेद्य जगत् का संस्कार करता है। वेद्य जगत् के
संस्कार का अभिप्राय यह है कि यहाँ परम शिव वेदक और वेद्य के रूप में विभक्त होकर
अपने स्वरूप का संकोच कर लेता है। ये पन्द्रह स्वर प्रतिपदा आदि पन्द्रह तिथियों के
प्रतिनिधि हैं। सूर्य और चन्द्र के संचरण से जैसे तिथियां बनती हैं, उसी तरह रवि और
शशि के प्रतिबिम्ब स्वरूप बिन्दुद्वयात्मक आकृति वाले शिवशक्तिमय विसर्ग के संचरण से
इन पन्द्रह स्वरों का प्रादुर्भाव होता है।
तन्त्रसार ( पृ० १२-१५ ) में अभिनवगुप्त ने इस विषय को संक्षेप में इस तरह
से प्रस्तुत किया है—परमेश्वर की तीन मुख्य शक्तियां हैं। ये हैं—अनुत्तर ( अकार ),
इच्छा ( इकार ) और उन्मेष ( उकार )। अनुत्तर की आनन्द ( आकार ) में, इच्छा
की ईशन ( ईकार ) में और उन्मेष की विश्रान्ति ऊर्मि ( ऊकार ) में होती है। यहाँ
प्रथम त्रिक प्रकाशस्वभाव होने से सूर्यात्मक तथा द्वितीय त्रिक विश्रान्तिस्वभाव आह्लाद-
१. "इचुयशानां तालु। ऋटुरषाणां मूर्धा। लृतुलसानां दन्ताः। उपूपध्मानीयानामोष्ठौ"
(सिद्धान्तकौमुदी, संज्ञाप्रकरण)।

[ ३८ ]
प्रधान होने से सोमात्मक है। यहाँ तक क्रिया शक्ति का प्रवेश नहीं होता। ऊर्मि (ऊकार)
से ही क्रियाशक्ति की प्रवृत्ति होती है। जब इच्छा या ईशान में क्रिया शक्ति प्रविष्ट
होती है, तो इसके दो भेद हो जाते हैं। प्रकाश के अंश से रश्रुति और विश्रान्ति के अंश
से लश्रुति प्रस्फुरित होती है। इनका उच्चारण अभी अस्फुट रहता है, अतः व्यंजन के
समान इनकी स्थिति नहीं रहती। इनमें स्वर और व्यंजन दोनों के धर्मों के रहने से
इनको नपुंसक (षण्ढ) कहा जाता है। अनुत्तर और आनन्द का जब इच्छा और उन्मेष
में प्रसार होता है, तो ए और ओ इन दो स्वरों की तथा ए और ओ से अनुत्तर और
आनन्द का संघट्ट होने पर ऐ और औ की निष्पत्ति होती है। यहाँ तक क्रिया शक्ति
का व्यापार चलता है। इसके बाद सारा कार्य-जगत् पुनः अनुत्तर में प्रविष्ट होना
चाहेगा, किन्तु ज्ञान शक्ति की सहायता से पहले वह वेदनरूप बिन्दु में तथा उसके बाद
विसर्ग के रूप में परिणत हो जाता है। ये सोलह परामर्श 'बीजस्वरूप हैं और व्यंजनों
को योनि कहा जाता है।
व्यंजनों की उत्पत्ति की प्रक्रिया तन्त्रसार (पृ० १५-१६) में ही इस तरह से
बताई गई है—अनुत्तर से कवर्ग की, श्रद्धात्मक इच्छा से चवर्ग की, सकर्मक इच्छा से
टवर्ग और तवर्ग की तथा उन्मेष से पवर्ग की निष्पत्ति होती है। त्रिविध इच्छा से
य र ल की तथा उन्मेष से वकार की, पुनः त्रिविध इच्छा से श ष स की तथा विसर्ग
से हकार की निष्पत्ति मानी गई है। क्षकार योनि (व्यंजन) के संघट्ट से बनता है।
भगवान् अनुत्तर (अकार) ही इस स्वरव्यंजनात्मक कुल का स्वामी (कुलेश्वर) है और
विसर्ग उसकी शक्ति है। इसका नाम कौलिकी है। इसकी सहायता से आनन्द से लेकर
हकार पर्यन्त यह वर्णात्मक सृष्टि होती है। वर्गों में विभक्त ये वर्ण ही तत्त्वों का रूप
धारण कर लेते हैं। विसर्ग शक्ति आणव, शाक्त और शांभव के भेद से तीन प्रकार की
है। आणव शक्ति चित्तविश्रान्ति रूप, शाक्त चित्तसंबोध रूप और शांभव शक्ति चित्त-
प्रलय रूप मानी जाती है। इस त्रिविध विसर्ग शक्ति की सहायता से भगवान् कुलेश्वर
विश्वव्यापार में प्रवृत्त होते हैं। निर्विभाग रूप में परामर्श करने पर ये अकेले हैं।
²बीज और योनि के रूप में विभक्त होने पर ये शक्ति और शक्तिमान् के रूप में
१. "द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ।
बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा, बीजं स्वरा मताः ॥
कादिभिश्च स्मृता योनिः, नवधा वर्गभेदतः ।
प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला ॥
बीजमत्र शिवः, शक्तियोंनिः" (मालिनीविजय, ३।१०-१२) ।
२. उत्तर की टिप्पणी देखिये।

[ ३९ ]
द्विविध भासित होते हैं। क्षकार और अन्य आठ वर्गों के साथ मिलकर ये नववर्गात्मक
हो जाते हैं। मातृका का रूप धारण करने पर ये पचास प्रकार के हो जाते हैं। इस
प्रकार तन्त्रसार में अतिसंक्षेप में बताई गई इस वर्णसृष्टिप्रक्रिया का अभिनवगुप्त ने
तन्त्रालोक (३।१६७-२१९) में विस्तार से वर्णन किया है।
परात्रिंशिका के ६-९ श्लोकों की व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त ने वर्गों से तत्त्वों
की उत्पत्ति का संक्षेप में उल्लेख किया है। १वे कहते हैं कि अकार से विसर्ग पर्यन्त
शिव तत्त्व की व्याप्ति है। कवर्ग से पांच महाभूत, चवर्ग से पांच तन्मात्रा, टवर्ग से पांच
कर्मेन्द्रिय, तवर्ग से पांच ज्ञानेन्द्रिय, पवर्ग से मन, अहंकार, बुद्धि, प्रकृति और पुरुष नामक
पांच तत्त्व, यकार से वकार पर्यन्त चार वर्णों से मशः राग-नियति, विद्या, कला-काल
और माया तत्त्व की सृष्टि होती है। शकार से क्षकार पर्यन्त पांच वर्णों से ब्रह्मपंचक,
अर्थात् महामाया, शुद्धविद्या, ईश्वर, सदाशिव और शक्ति नामक तत्त्वों की सृष्टि
होती है। यह आदि-क्षान्ता वर्णमाला ही सभी मन्त्रों और २विद्याओं की भी जननी
है। परापंचाशिका १४-१८ श्लोकों में भी तत्त्वों की वर्णात्मकता का यही क्रम
वर्णित है।
योगिनीहृदय के चक्रसंकेत में वर्गों अथवा तत्त्वों की चक्रात्मकता और मन्त्रसंकेत में
विद्यागत वर्णों की तत्त्वात्मकता प्रतिपादित है। इसी तरह से पूजासंकेत ( ३।११४-
१५४) में नौ चक्रों की वैखरीमयता और मध्यमा वाणी रूप भूतलिपिमयता वर्णित
है। दीपिकाकार (३।१०८) ने स्पष्ट कहा है कि स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्।
उसका जब इन्द्रिय मार्ग से बाहरों अथवा में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो वह
संवित् विश्वाकार बन जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं
है, किन्तु अपनी संविद्देवी ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण चतुष्टय, अव्यक्त, महत्,
अहंकार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तियां, इनके विषय, पुर्यष्टक और सोलह
विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर लेती है। इसी का नाम
श्रीचक्र है।
शिव के अघोर, वामदेव आदि पांच मुखों से पृथिवी आदि पांच तत्त्वों की उत्पत्ति
मानी जाती है और इन पांच तत्त्वों को ही प्रधान मान कर अन्य सभी तत्त्वों का इन्हीं में
अन्तर्भाव किया जाता है। दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इस विषय का भी
१. इस प्रसंग को आचार्य नीलकण्ठ गुरुटू ने परात्रिंशिका के अपने भाषानुवाद की
टिप्पणियों (पृ० १५१-१५४) में स्पष्ट किया है।
२. परात्रिंशिका के इस वचन से भी स्पष्ट है कि पुरुष और स्त्री देवताओं के मनुओं के
लिये मन्त्र और विद्या शब्द का पृथक्-पृथक् प्रयोग होता रहा है।

[ ४० ]
यथावसर वर्णन किया है (पृ० १६९) । इस प्रसंग में पृ० १३८-१३९ की तथा पृ० १६५
की टिप्पणियां देखनी चाहिये ।
पृ० १५५-१५७, १६३-१६९, १८६-१८८ में सांख्यदर्शन और शैवागमों में प्रति-
पादित अनेक सिद्धान्तों की दीपिकाकार ने चर्चा की है। इन विषयों के स्पष्टीकरण के
लिये यहाँ अनेक टिप्पणियाँ दी गई हैं तथा कुछ विशिष्ट ग्रन्थों का स्थाननिर्देश भी किया
गया है, जहाँ कि इन विषयों की विशेष चर्चा हुई है। उनमें से एक विशेष विषय की चर्चा
करना हम आवश्यक समझते हैं। सांख्यकारिका (श्लो० २५) में सात्त्विक के लिये वैकृत
और राजस के लिये तैजस शब्द प्रयुक्त है। शैवागमों में मतंगपारमेश्वर (वि० १८।४३-
४४) सांख्यकारिका का अनुसरण करता है। इसके विपरीत मृगेन्द्रागम (वि० १२।२),
भोगकारिका (श्लो० ३५), १तत्त्वप्रकाश (श्लो० ५४) आदि में सात्त्विक के लिये
तैजस और राजस के लिये वैकृत शब्द प्रयुक्त हुआ है। दीपिका (पृ० १८८) में उद्धृत
स्वच्छन्दसंग्रह को भी यही क्रम मान्य है। सात्त्विक को वैकृत और राजस को तैजस कहना
कुछ अटपटा सा लगता है।
कामकला
कामकला अथवा कामबिन्दु की यहाँ अनेक स्थलों पर चर्चा आई है। हमने १६-
१७, १९, ५४ और ५६ पृष्ठों की टिप्पणियों में इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न
किया है। भावार्थ प्रकरण (२।२०-२५) में भी इसकी व्याख्या देखी जा सकती है।
त्रिपुरा सम्प्रदाय का यह अपना सिद्धान्त है। विभिन्न ग्रन्थों में इसकी अनेकविध व्याख्या
की गई है। महाकालसंहिता के एक खण्ड का नाम ही कामकला खण्ड है। हम जानते
हैं कि अपने पति महान् मीमांसक मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में हारता हुआ देख उनकी
विदुषी पत्नी भारती ने शंकराचार्य से कामकला विषयक प्रश्न किया था। इस कामकला
के स्वरूप की ही पुण्यानन्द ने अपने कामकलाविलास में व्याख्या की है। श्रद्धेय कविराज
जी ने भी अपने ग्रन्थ "तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि" में संगृहीत 'शक्तिसाधना'
और 'सृष्टि का उन्मेष' (शाक्तमत) शीर्षक निबन्धों में तथा "भारतीय संस्कृति और
साधना" के प्रथम भाग में संकलित 'शक्ति का जागरण' शीर्षक निबन्ध में इस विषय
को स्पष्ट किया है। अभी हाल में ( २३-२९ अगस्त, सन् १९८७ ) हालैण्ड के लाइडेन
नगर स्थित कर्न इंस्टीट्यूट में सम्पन्न हुए विश्व संस्कृत परिषद् के सातवें अधिवेशन की
आगम और तन्त्रशास्त्र विषयक गोष्ठी ( २८ अगस्त, प्रातःकाल) में कामकला पर
एक सचित्र लेख पढ़ा गया था। आशा की जा सकती है कि यह सचित्र निबन्ध वहाँ से
प्रकाशित होने वाले विवरण में प्रकाशित होगा और इससे पाठक लाभान्वित हो सकेंगे।
१. तत्त्वप्रकाश की तात्पर्यदीपिका टीका के लेखक कुमार (देव) ने यहाँ सांख्यकारिका
के अनुसार ही विवरण किया है।

[ ४१ ]
छः अथवा आठ धातु
अष्टांगहृदय¹ आदि आयुर्वेद के ग्रन्थों में रस, रक्त आदि सात धातुओं की चर्चा
है। योगिनीहृदय (२।६०) की दीपिका में अष्टांगहृदय के इसी श्लोक को उद्धृत कर
धातुओं और योगिनियों की संख्या सात बताई गई है, किन्तु आगे (३।३०) छः ही
धातुदेवताओं का उल्लेख और व्याख्यान है। सेतुबन्धकार भास्करराय की व्याख्या भी
दोनों स्थलों पर परस्पर विरुद्ध है। इसका समाधान हम पृ० १९० की टिप्पणी में कर
चुके हैं। तदनुसार इस प्रकरण में धातुओं और धातुदेवता डाकिनियों की संख्या छः ही
मानी जायगी। योगिनीहृदय में ही आगे (३।११४) योगिनी पद से ब्राह्मी आदि आठ
देवियों का ग्रहण कर धातुओं की संख्या भी आठ मानी गई है। उक्त सात धातुओं के
साथ क्रोध (ओज)² को जोड़ने पर धातुओं की संख्या आठ हो जाती है। इस संबन्ध में
पृ० ३१० की टिप्पणी देखी जा सकती है। योगिनीहृदय और दीपिका में सर्वत्र रस के
स्थान पर 'त्वक्' शब्द प्रयुक्त है। दीपिकाकार (३।११४) ने त्वक् का भ्रूमध्य से, रक्त
का नितम्ब, मांस का नाभि, मेदा का हृदय, अस्थि का कण्ठ, मज्जा का मुख, शुक्र का
नासापुट तथा क्रोध (ओज) का ललाट चक्र से संबन्ध बताया है। ऐसा करते समय
उन्होंने इसके लिये कोई प्रमाण नहीं दिया।
व्याकुलाक्षर
ख. मातृका को छोड़ कर योगिनीहृदय अथवा दीपिका की अन्य किसी मातृका में
व्याकुलाक्षर का प्रयोग नहीं मिलता, जब कि भास्करराय ने योगिनीहृदय के कुछ श्लोकों
को ³व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखा हुआ माना है। तन्त्रराजतन्त्र तथा परमानन्दतन्त्र
की टीका के पटल समाप्ति के सूचक पद्यों में व्याकुलाक्षर पद्धति का अनुसरण किया
गया है। भास्करराय ने सेतुबन्ध (७।८३) में इस पद्धति को समझाने के लिये इस पद्य
को उद्धृत किया है—
देवतारथगोमूक इति यो वेत्ति न क्रमम्।
स व्याकुलाक्षरे मूको देवतारथगोऽपि सन्॥
१. "रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि धातवः" (सूत्रस्थान, १।१८)।
२. "सर्वेषामन्तःबहिष्करणानां यद् यदनुप्रविशति तत्तन्मध्यनाडोभुवि सर्वाङ्गानुप्राणन-
सारायां प्राणात्मना चेतनरूपेणास्ते यदोज इति कथ्यते" (पृ० ४५-४६) परात्रिंशिका
की व्याख्या में अभिनवगुप्त ने यह ओज का लक्षण दिया है।
३. हमें सुहृद्वर प० जनार्दन शास्त्री पाण्डेय ने सूचना दी है कि सं. सं. वि. वि. से
प्रकाशित वेदविषयक ग्रन्थ 'बैठपरिभाषा' में भी व्याकुलाक्षर पद्धति का प्रयोग किया
गया है।

व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखे गये श्लोक के पादों में ऊपर बताये गये क्रम से अक्षरों
का क्रम बदल दिया जाता है। इस क्रम को समझने के लिये भी भास्करराय ने ही
१नाथनवरत्नमाला की अपनी स्वोपज्ञ टीका में दूसरा श्लोक दिया है—
कटपयवर्गभवैरिह पिण्डान्त्यैरक्षरैरङ्काः ।
नेत्रे शून्यं ज्ञेयं तथा स्वरे केवले कथिते ॥
इस वचन के अनुसार क से ञ तक, ट से न तक के अक्षरों से एक से दस तक, प
से म तक के अक्षरों से एक से पांच तक और य से क्ष तक के अक्षरों से एक से नौ संख्या
का ग्रहण होगा। इस पद्धति से ऊपर के पहले श्लोक के दे से ८, व से ४, ता से ६,
र से २, य से ७, गो से ३, मू से ५ और क सं १ संख्या गृहीत होगी। इस क्रम से
श्लोकों के पादों को व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखने पर पहले पाद का आठवां, फिर चौथा,
छठा, दूसरा, सातवां, तीसरा, पांचवां और अन्त में पहला अक्षर लिखा जायगा। जैसे
कि सेतुबन्ध में ही आठवें विश्राम के १९९ वें श्लोक के प्रथम पाद को त्स्यं सं था द्यं म
मां त म—इस तरह से व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखा गया है। आठवें अक्षर को पहले
(म), चौथे अक्षर को दूसरे (द्यं), छठे अक्षर को तीसरे (मां), दूसरे अक्षर को
चौथे (सं), सातवें अक्षर को पांचवें (त), तीसरे अक्षर को छठे (था), पाँचवें अक्षर
को सातवें (म) और अन्त में पहले अक्षर को आठवें (त्स्यं) क्रम से लिखने पर
व्याकुलाक्षर पाद का सही स्वरूप इस प्रकार बन जाता है—म द्यं मां सं त था म त्स्यं।
अन्यत्र भी इसी तरह से व्याकुलाक्षर पद्धति से लिखे गये वाक्यों का उद्धार कर उनका
सही स्वरूप जाना जा सकता है।
क्रम-व्युत्क्रम
योगिनीहृदय और दीपिका में अनेक स्थानों पर किसी न किसी कारण से परम्परा
प्राप्त क्रम बदल दिया गया है। जैसे कि श्लोक १८-१९ में रौद्री, ज्येष्ठा और वामा
शक्ति के क्रम को बनाये रखने के लिये चतुष्कोण का पहले और अश्रिमिश्रय का पाठ बाद
में किया गया है। इसी प्रकार "शाक्ते वह्नौ"२ ( २।२५ ) यह क्रम न होकर "वह्नौ
शाक्ते" यह क्रम होना चाहिये। कामरूप आदि पीठों की योगिनीहृदय प्रतिपादित मन,
अहंकार, बुद्धि और चित्तरूपता के प्रमाण में अपने ग्रन्थ सौभाग्यसुधोदय को उद्धृत करते
समय दीपिकाकार ने वहाँ का क्रम बदल दिया है (पृ० ६१)। इसी तरह से योगिनी-
हृदय की श्रीचक्र का सृष्टि प्रक्रिया को बनाये रखने के लिये दीपिकाकार ने सुभगोदय-
१. यह ग्रन्थ अब श्रीगुरुनवरत्नमाला के नाम से स्वोपज्ञ व्याख्या के साथ पीताम्बरा
पीठ, दतिया से प्रकाशित हो चुका है।
२. भास्करराय ने यहाँ सङ्केतित पाठ को ही मान्यता दी है।

वासना के श्लोकों का भी क्रम बदला है (पृ० ७१-७२)। त्रिविध पशुओं का क्रम सकल,
प्रलयाकल और विज्ञानाकल है, किन्तु "अशुद्धशुद्धमिश्राणाम्” (२।४३) पदों की व्याख्या
करते समय दीपिकाकार ने योगिनीहृदय के क्रम से ही इन पदों की व्याख्या की है।
"पिण्डरूपपदग्रन्थि” ( ३।९१ ) यहाँ पिण्ड, पद, रूप—यह क्रम होना चाहिये, किन्तु
छन्द के अनुरोध से यहाँ पद के पहले ही रूप पढ़ दिया गया है। ऐसे स्थलों की
व्याख्या करते समय दीपिकाकार ने यथोचित पूरी सावधानी बरती है।
दीपिका की कुछ विसंगतियां
ऊपर वर्णित सभी विशेषताओं के रहते हुए भी दीपिका में कुछ विसंगतियां दिखाई
पड़ती हैं। इनमें से कुछ का उल्लेख कर उनके समाधान का प्रयत्न हमने टिप्पणियों में
किया है। प्रारम्भ में ही नौ चक्रों की वासना के प्रसंग में स्वर और व्यंजनों का विन्यास
बताते हुए मकार का विनियोग कहीं भी नहीं किया गया। पृ० २६ की टिप्पणी में
हमने इसका समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, किन्तु २।७० तथा ३।१००-१०१
की व्याख्या में भी दीपिकाकार ने इसी बात को दुहराया है। दूसरी तरफ हम यह
देखते हैं कि योगिनीहृदय ( २।७० ) में पचास ही वर्ण माने गये हैं और दीपिकाकार
( १।४६, २।७०) ने भी इस बात को स्वीकार किया है।
"अकुले विषुसंज्ञे च" ( १।२५ ) इत्यादि श्लोक की व्याख्या में अमृतानन्द ने विषु
को अकुल का विशेषण माना है और नवें आधार के रूप में बिन्दु का ग्रहण किया है।
"अकुलादिषु” ( २।८ ) यहाँ पर भी दीपिकाकार ने नवम आधार के रूप में बिन्दु को
ही लिया है। इस विषय में हम पृ० ३६-३७ तथा पृ० ११३ की टिप्पणियों में
और यहां उपोद्घात ( पृ० ३२ टि० ) में भी आवश्यक विचार कर चुके हैं।
कुल और अकुल की द्विविध व्याख्या का समाधान भी हम ग्रन्थभाग के पृ० ३२९
की तथा उपोद्घात भाग पृ० ३४-३५ की टिप्पणी में कर चुके हैं। इसी तरह
अमृतानन्द योनि और बीज की भी परस्पर विरुद्ध दो तरह की व्याख्या करते हैं
(पृ० १५३-१५४, ३१६-३१८, ३४४)। पृ० १५४ तथा पृ० ३४४ की टिप्पणियों
में इस ओर इंगित कर हमने वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है।
१।१० तथा ३।१७५-१७६ की व्याख्या को अधिक स्पष्ट करने के लिये हमने वहाँ
( पृ० १६-१७ तथा ३६४-३६५ ) विशेष टिप्पणियाँ की हैं। इसी तरह से कामेश्वर के
बाण बीजों का उद्धार बताने वाले स्वच्छन्दसंग्रह के वचन की अस्पष्टता को देखते हुए वहाँ
भी टिप्पणी की है। नौ रन्ध्रों (नवाधार) की दीपिका (पृ० ३३४) में उपलब्ध द्विविध
नामावली की चर्चा अभी हम 'आधार' शीर्षक के अन्तर्गत कर चुके हैं। दीपिकाकार ने
"देहाक्षादिविशुद्धिदा·······योगादिक्लेशभेदेन” ( ३।१४०-१४१ ) यहाँ अक्ष (इन्द्रिय)
पद की व्याख्या करते समय नैयायिक मत के अनुसार इन्द्रियों की प्राप्यकारिता का उल्लेख
किया है, किन्तु हमें यह स्मरण रखना होगा कि नैयायिक इन्द्रियों को भौतिक मानते हैं

[ ४४ ]
अतः उनके मत में इन्द्रियों की प्राप्यकारिता उचित है । इसके विपरीत सांख्यदर्शन में
इन्द्रियों की आहंकारिकता मानी जाती है । यहां इन्द्रियों की प्राप्यकारिता का सिद्धान्त
मान्य नहीं है । दीपिकाकार सर्वत्र शैवागम संमत सांख्य दृष्टि का अनुवर्तन करते हैं ।
अतः यहाँ प्रदर्शित इन्द्रियों की प्राप्यकारिता परपक्ष प्रदर्शन मात्र माना जायगा । इसको
दीपिकाकार का सिद्धान्त नहीं माना जा सकता । इसीलिये उन्होंने 'योग' पद का अर्थ
संयोग न कर समवाय किया है ।
आभार प्रदर्शन
सितम्बर, ८२ से अगस्त, ८५ तक हमने भारत सरकार की शास्त्रचूडामणि
योजना में कार्य किया । इससे पहले ही योगिनीहृदय के द्वितीय संस्करण की निजी
प्रति को हमने योगिनीहृदय और दीपिका की सरस्वती भवन, वाराणसी स्थित
ख. और ग. मातृकाओं के आधार पर परिष्कृत कर लिया था । इस ग्रन्थ-युगल का
भाषानुवाद करने से पहले अन्य उपलब्ध मातृकाओं की सहायता से इनका पूर्णतया
संशोधन कर लेना हमें उचित प्रतीत हुआ और इस कार्य को हमने दो वर्षों ( सन्
८२-८३) में पूरा किया । दिनांक २८-१२-८३ से २४-१-८४ तक ग्रन्थ के परिष्कृत
स्वरूप का लेखन कार्य सम्पन्न हुआ तथा सन् ८४ के अन्त तक अनुवाद का कार्य चलता
रहा । दि० ५-१२-८४ से २७-१२-८४ की अवधि में पाठ निर्धारण का कार्य भी पूरा हो
गया । अब केवल प्रकाशन की प्रतीक्षा थी । एक अथवा दूसरे कारणों से इसमें विलम्ब
होता रहा और अन्ततः मोतीलाल बनारसी दास ने इस ग्रन्थ के प्रकाशन का निर्णय
लिया । इस प्रसंग में हम शिक्षा मन्त्रालय, डॉ० आन्द्रे पादु और मोतीलाल बनारसीदास
प्रकाशन संस्था को विशेष रूप से स्मरण करना चाहते हैं। सुहृद्वर पण्डित श्री जनार्दन
शास्त्री पाण्डेय जी के प्रयत्न से ही विज्ञानभैरव भाषानुवाद का प्रकाशन हो सका था । इस
ग्रन्थ के प्रकाशन में भी उनकी प्रेरणा ही प्रधान रही है। इस ग्रन्थ को सुपरिष्कृत रूप देने
में उनके सुझाव बहुत उपयोगी रहे हैं । हम उनके प्रति भी आभार प्रदर्शित करते हैं ।
सरस्वती भवन पुस्तकालय, वाराणसी; गायकवाड़ शोधसंस्थान, बड़ोदरा; राजस्थान
पुरातत्त्व मन्दिर, जोधपुर तथा उसकी उदयपुर शाखा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों
को भी हम कृतज्ञता के साथ स्मरण करना चाहते हैं । परापंचाशिका की मातृकाएँ हमें
चार स्थानों से मिलीं, जिनकी चर्चा हम यथास्थान कर चुके हैं । इन संस्थाओं के प्रति
भी हम अपना आभार व्यक्त करते हैं । परिशिष्टों के निर्माण में चि० तरुणकुमार द्विवेदी,
बी० ए० ने सहायता की । हम उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं ।
मकर संक्रान्ति, संवत् २०४४ व्रजवल्लभ द्विवेदी
वाराणसी, १५-१-८८ शास्त्रचूडामणि विद्वान्

विषय-सूची

उपोद्घात
योगिनीहृदय और दीपिका-१, मातृकाओं का परिचय-१, प्रस्तुत संस्करण-३,
परापंचाशिका की मातृकाएँ-४, परापंचाशिका का परिचय-५, श्रीकुल (त्रिपुरा) का
साहित्य-६, योगिनीहृदय और वामकेश्वर तन्त्र-९, योगिनीहृदय की टीकाएं-१०,
मूल और टीका में स्मृत ग्रन्थ-ग्रन्थकार-११, त्रिपुरा सम्प्रदाय की प्रवृत्ति-१३,
चक्रसंकेत-१६, मन्त्रसंकेत (भावार्थ, सम्प्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, सर्व-
रहस्यार्थ और महातत्त्वार्थ)-२१, पूजासंकेत (त्रिविध पूजा)-२९, जप-३१,
पचास या इक्यावन पीठ-३३, नौ आधार-३४, वर्णों और तत्त्वों की उत्पत्ति-३६,
कामकला-४०, छः अथवा आठ धातु-४१, व्याकुलाक्षर-४१, क्रम-व्युत्क्रम-४२,
दीपिका की कुछ विसंगतियां-५३, आभार प्रदर्शन-४४

१. चक्रसंकेत
दीपिकाकार का मंगलाचरण १-३
शास्त्र की अवतारणा ४-६
शास्त्र की गोपनीयता और परम्परा ६-८
शास्त्र के अनधिकारी ८-१०
शास्त्र के अधिकारी एवं शास्त्रज्ञान का फल १०-११
संकेतत्रय का उद्देश १२
संकेतत्रय के ज्ञान का फल और अनुबन्ध-चतुष्टय १३
चक्रसंकेत का उपक्रम १४
चक्र का अवतार क्रम १४-१६
बैन्दव और त्रिकोण चक्र १६-२०
कामकला का स्वरूप १७-२१
नवयोनि अथवा अष्टार चक्र, उसकी अम्बिकारूपता २१-२५
अन्तर्दशार चक्र २५-२६
बहिर्दशार चक्र २७-२८
चतुर्दशार चक्र, चक्रत्रय की रौद्रीरूपता २८-२९
अवशिष्ट चक्रत्रय और उनकी वामा-ज्येष्ठतारूपता ३०
शान्त्यतीता आदि पांच शक्तियों (कलाओं) की श्रीचक्रमय वासना ३१
नौ चक्रों में स्थित शक्तियां और उनका स्वरूप (वासनान्तर) ३१-३३

[ ४६ ]
चक्र की कामकलारूपता ३३-३४
अकुल आदि स्थानों में चक्र की त्रिविध भावना ३४-४२
अकुल और कुल मध्यवर्ती नवाधार निरूपण ३४-४०
बिन्दु से उन्मनी पर्यन्त नाद-कलाओं का स्वरूप और उच्चारण काल ४२-५२
देश और काल से अनवच्छिन्न निसर्गसुन्दर परम तत्त्व ५२-५३
अम्बिका आदि, शान्ता आदि शक्तियाँ तथा वाक्चतुष्टय ५३-५७
अम्बिका आदि, शान्ता आदि शक्तियाँ तथा पीठचतुष्टय ५७-६०
लिङ्गचतुष्टय ६०-६३
विद्या तथा शक्तिचतुष्टय आदि की वाच्यवाचकता ६३
जाग्रदादि अवस्था चतुष्टय ६४
स्वसंविदात्मक त्रैपुर स्वरूप की सर्वोत्कृष्टता ६४-७४
संवित् की मुद्रारूपता और मुद्रा पद की निरुक्ति ७४-७६
दशविध मुद्राओं का आन्तर और बाह्य स्वरूप ७६-८८
परम तत्त्व की चक्रमयता ८९-९०
श्रीचक्र की त्रिधा तथा नवधा भावना ९०-९४
श्रीचक्र का सृष्टि-संहार क्रम और त्रिपुरा चक्र के ज्ञान का फल ९४-९७
नौ चक्रों का स्वरूप और उनके नामों की निरुक्ति ९७-१००
श्रीचक्र में महात्रिपुरसुन्दरी की पूजा का विधान १००-१०१
चक्रसंकेत की फलश्रुति १०१-१०३
२. मन्त्रसंकेत
मन्त्रसंकेत का उपक्रम और उसके ज्ञान का फल १०४-१०५
करशुद्धिकरी आदि नौ विद्याएं १०५-१११
नौ विद्याओं का न्यास १११-११३
अकुल आदि नवाधारों में चक्रेश्वरियों के साथ नौ चक्रों का न्यास १०३-११४
त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरियों की नौ चक्रों में पूजा ११४-११५
नौ विद्याओं की एकाकारता ११६
मन्त्रसंकेत की षड्विधता ११६-११८
भावार्थ का निरूपण (श्रीविद्या का अक्षरार्थ) ११८-१३६
मातृकाचतुष्टय तथा कामकला १२८-१३४
सम्प्रदायार्थ का निरूपण १३६-१७४
विद्या की विश्वमयता तथा विश्वोत्तीर्णता १३८-१४५
षट्त्रिंशत्तत्त्व निरूपण १४६-१४९

[ ४० ]
त्रिविध प्रमाता (सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकल) १६२-१६६
गुरु पारम्पर्य क्रम १७२-१७३
निगर्भार्थ का निरूपण १७४-१७७
कौलिकार्थ का निरूपण (चक्र, देवता, विद्या, गुरु और शिष्य की एकता) १७८-१९८
वाक्चतुष्टय १९१-१९४
सर्वरहस्यार्थ का निरूपण (स्वात्मबुद्धि) १९८-२०९
महातत्त्वार्थ का निरूपण (विश्वोत्तीर्ण-विश्वमय तत्त्व में स्वात्मनियोजन) २०२-२१२
महातत्त्वार्थ के अधिकारी और अनधिकारी २१३-२१६
मन्त्रसंकेत की फलश्रुति २१७-२१८
३. पूजासंकेत
त्रिविध पूजा—नाम और लक्षण २१९-२२३
परा पूजा की श्रेष्ठता और उसका स्वरूप २२३-२३०
षोढा न्यास (गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि, पीठ) २३०-२४२
श्रीचक्र न्यास (संहार क्रम) २४३-२५९
श्रीचक्र न्यास (सृष्टि क्रम) २५९-२६८
करशुद्ध्यादि न्यास २६८-२६९
विद्या न्यास २६९-२७१
तत्त्व न्यास २७१-२७३
परा न्यास २७१-२७४
चतुर्विध न्यास का कालविभाग २७४-२७५
आसन परिकल्पन और बलिदान २७५-२७७
विघ्नाप्रसारण और प्राकार-चिन्तन २७७-२८०
सामान्यार्घ्य से सूर्य आदि नवग्रहों का पूजन २८०-२८२
बाह्य श्रीचक्र का उद्धार व पुष्पांजलि निवेदन २८२-२८५
सामान्यार्घ्य की विधि (वह्नि, सूर्य और इन्दु कलाओं का अर्चन) २८५-२९२
विशेषार्घ्य की विधि २९२
गुरुपादुका का पूजन २९३
प्रसादग्रहण, आन्तर होम और पूर्णाहुति २९४-२९९
श्रीचक्र की पूजा का क्रम ३००-३०१
गणेश, बटुकभैरव और गुरुपंक्ति का पूजन ३०१-३०२
बैन्दव चक्र में कामेश्वर-कामेश्वरी का अर्चन ३०२-३०७
नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं का पूजन ३०७-३०८, ३५७

[ ४८ ]
प्रकटा आदि नौ योगिनियों का आवरण देवताओं के
साथ त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में पूजन ३०८-३५६
भूतलिपि का विन्यास क्रम ३२५-३४५
चक्रपूजा के बाद कुलदीप निवेदन ३५७-३५८
पुष्पांजलि समर्पण के बाद जपविधान ३५८
कूटत्रय तथा कुण्डलीत्रय में नाद की भावना ३५८-३६२
जप के समय शून्यषट्क आदि की भावना ३६३
शून्यषट्क की भावना का प्रकार ३६३-३६४
अवस्थापंचक की भावना का प्रकार ३६५-३६८
विषुवसप्तक की भावना का प्रकार ३६९-३७६
चक्रदेवताओं का तर्पण ३७६-३७८
नैमित्तिक पूजन ३७८-३७९
श्रीचक्र में ६४ करोड़ योगिनियों का निवास ३७९-३८०
अष्टाष्टक पूजा ३८०-३८१
गुरुपरम्परा से प्राप्त ज्ञान की फलवत्ता ३८१-३८२
नैवेद्य समर्पण एवं बलि निवेदन ३८२-३८७
शास्त्र की गोपनीयता ३८८
चुम्बक, ज्ञानलुब्ध और नास्तिकों की अनर्हता ३८८-३९०
ग्रन्थ की फलश्रुति ३९०-३९४
परिशिष्ट
परापञ्चाशिका आद्यनाथविरचिता ३९५-४००
योगिनीहृदय-श्लोकार्द्धानुक्रमणी ४०१-४१२
परापञ्चाशिका-श्लोकार्द्धानुक्रमणी ४१३-४१४
मूले दीपिकायां च स्मृता ग्रन्थ-ग्रन्थकाराः ४१५-४१६
संकेतपरिचयः ४१७-४१८
दीपिकोद्धृतवचनानुक्रमणी ४१९-४३४

योगिनीहृदयम्
दी पि का भा षा नु वा द सं व लि त म्
चक्रसंकेतः प्रथमः
जगद्वन्द्यावेतौ गणपबटुकौ विश्वविनुतौ
जगद्रक्षाशीलौ जपनिरतसामीप्यफलदौ¹।
रथाङ्गे सन्नद्धौ रविशशिकृशानुज्ज्वलदृशो
मयि स्यातां रक्षापरवशधियौ सद्गुणमयौ ॥१॥
²तन्नित्यं ज्योतिषां ज्योतिर्जयत्येकमनुत्तरम्³।
न यद्⁴ भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः⁵॥२॥
सारा संसार जिनकी वन्दना और स्तुति करता है, जो सदा जगत् की रक्षा करने
में लगे रहते हैं, जप में लगे साधकों को जो ¹सामीप्य नामक मोक्ष प्रदान करते हैं,
श्रीचक्र के साथ जो सदा संयुक्त हैं, सूर्य-चन्द्र और अग्निरूपी तीन उज्ज्वल नेत्रों को जो
धारण करने वाले हैं, ऐसे सारे सद्गुणों के निधान गणेश और बटुक मेरी रक्षा करने में
लग जांय ॥१॥
सभी प्रकाशात्मक वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली वह एक और नित्य अनुत्तर
शिवात्मक ज्योति ही सर्वश्रेष्ठ है। इसको सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर
सकते। अभिप्राय यह है कि उस प्रकाशात्मक ज्योति से ही सब कुछ प्रकाशित होता
है ॥२॥
१. साहित्यवरदौ-ख. ग. ज. झ. ने. उ. । २. य-क. । ३. त्तमम्-क. ।
४. तद्-क. । ५. तारकाः-ग. झ. उ. ।
१. गणेश और बटुक भगवती महात्रिपुरसुन्दरी के निवासस्थान श्रीचक्र के द्वार-
रक्षक हैं। श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर इनकी पूजा का विधान है (यहीं पूजासंकेत का
१०९ वां श्लोक देखिये)। दीपिका की प्रायः सभी मातृकाओं में 'सामीप्यफलदौ' के
स्थान पर 'साहित्यवरदौ' पाठ मिलता है। मुद्रित पुस्तक के इस पाठ को केवल उ.
मातृका का समर्थन मिलता है। इन दोनों पाठों के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है,
तो भी हमने यहाँ 'सामीप्यफलदौ' पाठ को ही मूल में इस लिये रखा है कि इससे
सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य के नाम से पुराण, आगम आदि में चतुर्धा
विभक्त मुक्ति का बोध सरलता से हो जाता है। जैसे राजदरबार में पहुँचा देता द्वार-