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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४३
मिका देवी परा, स स सर्वः पदार्थो महेश्वरो विश्वजगन्नियामकः परमशिवः ।
^१लोके यद्यद्वस्तु यत्किञ्चित्करणसामर्थ्यशालि तत्सामर्थ्यरूपेण परैव परिणता,
तत्तत्सामर्थ्यवद्वस्तुरूपेण परमशिवः परिणत इति वक्तुं शक्यते । किं वक्तव्यमेत-
दुभयमयविद्यावर्णसमानसंख्यावत्पदार्थरूपेण तावेव परिणतावित्यर्थः । तदुक्त-
मभियुक्तैः—
त्वं चन्द्रिका शशिनि तिग्मरुचौ रुचिस्त्वं
त्वं चेतनासि पुरुषे पवने बलं त्वम् ।
त्वं स्वादुताऽसि सलिले शिखिनि त्वमूष्मा
निःसार^२मम्ब निखिलं त्वदृते यदि स्यात् ॥ इति ॥३१॥
(अ० स्त० २०)
नियमन करने वाली परा देवी के और वे सब पदार्थ महेश्वर के, सारे जगत् का नियमन
करने वाले परम शिव के स्वरूप हैं । लोक में जिस किसी वस्तु में जो कुछ विशेष कार्य
करने की शक्ति दिखाई पड़ती है, वह सामर्थ्य परा शक्ति का ही परिणाम है और उस
उस सामर्थ्य से सम्पन्न पदार्थ परम शिव का परिणाम है । अर्थात् प्रत्येक पदार्थ का
अपना स्वरूप परम शिव का और उस पदार्थ की सामर्थ्य परा शक्ति का परिणाम है,
उनसे अभिन्न है । इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ शिवमय और उसकी सामर्थ्य शक्तिमय है ।
ऐसी स्थिति में यह कौन असंभव बात है कि शिवशक्तिमय इस विद्या के वर्णों के और
समान संख्या वाले पदार्थों के रूप में परम शिव और परा शक्ति ही परिणत होते हैं ।
^१अम्बास्तव में कहा गया है—
तुम चन्द्रमा में चाँदनी के रूप में, सूर्य में प्रभा के रूप में, पुरुष में चेतना के रूप
में, पवन में वेग के रूप में, जल में स्वाद के रूप में और अग्नि में उष्णता के रूप में
निवास करती हो । ओ मा ! तुम्हारे बिना यह सारा जगत् सूना हो जायगा ॥३१॥
१. सर्वलोके-ख. ज. झ. उ. । २. मेतदखिलं-ख. ने., मेव-ज. झ. ।

  1. पञ्चस्तवी के विषय में हम अन्यत्र (आगम और तन्त्रशास्त्र, पृ० ८६-८७) लिख
    चुके हैं कि लघुस्तव के कर्ता धर्माचार्य ही इसके रचयिता हैं । इन पाँच स्तवों में से
    तीन स्तवों (लघुस्तव, चर्चास्तव और सकलजननीस्तव) के पंडित हरभट्ट शास्त्री कृत
    पाण्डित्यपूर्ण टीका के साथ कश्मीर के प्रसिद्ध विद्वान् पंडित श्री दीनानाथ यक्ष द्वारा
    संपादित संस्करण प्रकाश में आ चुके हैं । यह दुःख का विषय है कि बाकी के दो स्तव
    (घटस्तव और अम्बास्तव) अभी प्रकाशित नहीं हो सके । अम्बास्तव का अठारहवां श्लोक
    (लक्ष्मीवशीकरण) भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण (निर्णयसागर प्रेस, द्वितीय संस्करण,
    पृ० ३०६-३०७) में उद्धृत है।

१४४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
ननु भूतगुणमयी शिवेत्युक्तम्, शिवाया तत्संख्या कुत ²इत्यत आह—
व्याप्ता पञ्चदशार्णैः सा विद्या भूतगुणात्मिका ।
पञ्चभिश्च तथा षड्भिश्चतुर्भिरपि चाक्षरैः ॥३२॥
सा शिवा ³परैव विद्या, वाच्यवाचकयोरभेदात्⁴ । पञ्चभिरक्षरैर्वाग्भव-
बीजस्यावयवैः, षड्भिरक्षरै कामराजबीजस्यावयवैः, चतुर्भिरक्षरैः शक्तिबीजस्या-
वयवैः । न क्षरन्तीत्यक्षराणि, तेषां नित्यत्वात् । ⁵स्वांशैर्नाशरहितैः पञ्चदशार्णे-
र्व्याप्ता, अत एव ⁶भूतगुणात्मिका ॥ ३२ ॥
बीजत्रयमक्षरशो विभज्य भूतगुणात्मकतावासनामुक्त्वेदानीमक्षराण्यरवयवशो
विभज्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकतावासनामाह—
स्वरव्यञ्जनभेदेन सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनी ।
सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपिणी ॥ ३३ ॥
तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा भाव्यते सदा ।
इस पर प्रश्न उठता है कि विद्या में तो पन्द्रह अक्षर हैं, तब यहाँ ३६ संख्या कहाँ से
आवेगी ? इसका उत्तर आगे देते हैं—
वह भूतगुणात्मिका विद्या पन्द्रह वर्णों से व्याप्त है । यह पाँच, छः और चार
अक्षरों के तीन बीजों में विभक्त है ॥३२॥
वाच्य और वाचक की अभिन्नता के कारण परा शक्ति और परा विद्या में कोई
भेद नहीं है। पाँच अक्षर वाग्भव बीज के, छः अक्षर कामराज बीज के और चार अक्षर
शक्ति बीज के अवयव हैं। अक्षर शब्द का अर्थ है जिसका क्षरण (नाश) न हो। अक्षर
नित्य हैं, अतः इनका क्षरण नहीं होता। यह विद्या इन नाशरहित पन्द्रह वर्णों से व्याप्त
है, इसलिये प्रधानतः यह भूतगुणात्मिका कहलाती है ॥३२॥
इस प्रकार यहाँ तीन बीजों के क्रम से अक्षरों का विभाग और उनकी पन्द्रह भूत-
गुणों के रूप में भावना को बताने के बाद अब इन अक्षरों के भी अवयवों का विभाग कर
कर उनकी ३६ तत्त्वों के रूप में वासना बताई जा रही है—
स्वर और व्यंजन के भेद से यह विद्या ३७ अवयवों वाली हो जाती है।
विद्या के ये सैंतीस अवयव परा देवी के छत्तीस तत्त्वों वाले विश्वमय स्वरूप का
और एक तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप का बोध कराते हैं। इस तरह से
श्रीविद्या की सदा इन्हीं रूपों में भावना करनी चाहिये ॥३३-३४॥
१. शिवायाः-ख. ज. झ. उ. । २. इत्याह-ज. झ. उ. । ३. परैवाम्बिका या वाच्य-
ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रभेदिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. एवंविधस्वांशैः-ख. ने.ज.
झ. उ. । ६. भूतात्मिका-ख. ने. ज. झ उ. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४५
स्वरव्यञ्जनभेदेन प्रथमबीजेऽकारचतुष्टयमीकारश्चेति पञ्च स्वराः, शिष्टानि
षड् व्यञ्जनानि, एवमेकादश । द्वितीयबीजेऽकारपञ्चकमीकारश्चेति षट् स्वराः,
शिष्टानि व्यञ्जनानि सप्त, एवं त्रयोदश । तृतीयबीजेऽकारत्रयमीकारश्चेति
चत्वारः स्वराः, शिष्टानि व्यञ्जनानि पञ्च, एवं नव । इत्येवं विभागेनाक्षरावयवा-
स्त्रयस्त्रिंशत् । बीजत्रयान्ते बिन्दवस्त्रय इति षट्त्रिंशत् । तत्समष्टिरेका । एवं
सप्तत्रिंशत्प्रभेदिनो विद्या समष्टिरूपा । एवं सप्तत्रिंशत्प्रभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्व-
रूपिणी तत्त्वातीतस्वभावा च विद्यैषा । व्यष्टिसमष्टिभेदेन षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मिका
तदतीता (च) इयम् । षट्त्रिंशत्तत्त्वान्यवयवभूतानि, तेषां रूपवती, सप्तत्रिंशत्प्र-
भेदेन तत्त्वातीतस्वभावा च । स्वस्य भावः स्वभावः, शिवस्य यादृशो भावस्तादृशोऽ-
स्या¹ इति भावयितव्यमित्यर्थः । तत्त्वानां लक्षणानि मयैव सौभाग्यसुधोदये
निरूपितानि । यथा—
स्वर और व्यंजन के भेद से विद्या में ३७ वर्ण होते हैं । जैसे प्रथम बीज में
चार अकार और ईकार मिलकर पाँच स्वर हुए, बाकी छः व्यंजन हैं । इस तरह से
प्रथम बीज में ११ अक्षर हुए । द्वितीय बीज में पाँच अकार और ईकार मिल कर छः
स्वर हुए, बाकी सात व्यंजन हैं । दोनों मिलकर द्वितीय बीज में १३ अक्षर हुए । तीसरे
बीज में तीन अकार और ईकार मिलकर चार स्वर और बाकी पाँच व्यंजन हैं । इस
तरह से यहाँ अक्षरों की संख्या ९ हुई । सब मिलाकर अक्षरों की संख्या ३३ हुई । तीन
बीजों के अन्त में तीन बिन्दु हैं । इनको भी मिलाने से यह संख्या छत्तीस हुई । इन
सबकी समष्टि भी एक है । इस तरह से यह समष्टि विद्या ३७ भेद वाली है । इन ३७
भेदों के कारण यह विद्या ३६ तत्त्वों वाली और तत्त्वातीत स्वभाव वाली भी है ।
व्यष्टि रूप में यह ३६ तत्त्वों वाली और समष्टि रूप में तत्त्वातीत है । यह ३६ तत्त्वों
को अपना अवयव बनाकर उनका स्वरूप धारण कर लेती है और ३७ वें स्वरूप में
प्रवेश कर उनसे ऊपर उठ जाती है, तत्त्वातीत विश्वोत्तीर्ण स्वरूप धारण कर लेती है ।
स्वभाव शब्द का अर्थ है अपना भाव । अपना, अर्थात् शिव का जैसा स्वरूप है वैसा ही
स्वरूप इस विद्या का भी है, ऐसी भावना करनी चाहिये । तत्त्वों के लक्षण मैंने ही
¹सौभाग्यसुधोदय में बताये हैं । जैसे कि—
१. स्याः स्वभाव-ख. ने. ज. उ. ।

  1. यह विस्तृत उद्धरण भी नित्याषोडशिकार्णव के परिशिष्ट (पृ० ३०६-३२१) में
    प्रकाशित इस ग्रन्थ के प्रथम प्रपंच (श्लो० २८-४८) में पाठभेदों के साथ उपलब्ध है ।
    इस ग्रन्थ का प्रथम संस्करण सन् १९६८ में प्रकाशित हो चुका था । यह खेद का विषय
    है कि कश्मीर ग्रन्थमाला में सन् १९१४ में प्रकाशित श्री जगदीश चन्द्र चटर्जी के
    'कश्मीर शैविज्म' के तथा सन् १९३८ में प्रकाशित सटीक प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (पृ० १६३-
    १०

१४६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया निखिलमपि जगत् स्रष्टुम्।
१पस्पन्दे स स्पन्दः प्रथमं शिवतत्त्वमुच्यते तज्ज्ञैः ॥
इच्छा सैव स्वच्छा सन्ततसमवायिनी २सती शक्तिः।
सचराचरस्य जगतो बीजं निखिलस्य निज३निलीनस्य ॥
स्वेच्छाशक्त्युद्गीर्णं ४जगदात्माहन्तया समाच्छाद्य ।
निवसन् स एव निखिलानुग्रहनिरतः सदाशिवोऽभिमतः ॥
५विश्वं स एव पश्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः।
सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ॥
माया विभेदबुद्धिर्निजांशभूतेषु६ निखिलभूतेषु७ ।
नित्यं तस्य निरङ्कुशविभवं वेलेव ८वारिधिं रुन्धे ॥
स तया परिमितमूर्तिः संकुचितसमस्तशक्तिरेष पुमान्।
रविरिव सन्ध्यारक्तः संहृतरश्मिः स्वभासनेऽप्यपटुः ॥
यह जो अनुत्तरमूर्ति परम शिव है, वह अपनी इच्छा से इस सारे जगत् को बनाने के
लिये जब स्पन्दनशील होता है, तो इस स्पन्दनव्यापार को ही आगम शास्त्र के ज्ञाता
प्रथम शिवतत्त्व के नाम से जानते हैं। उस अनुत्तर तत्त्व की स्वच्छ इच्छा शक्ति शिव
के साथ सदा अविनाभाव सम्बन्ध से जुड़ी रहती है। यही शक्तितत्त्व है। अपने में
छिपे हुए सारे स्थावरजंगमात्मक जगत् को यही पैदा करती है। अपनी इच्छा शक्ति से
निकले हुए इस जगत् को अपनी अहन्ता से आच्छादित कर, अर्थात् अपना ही स्वरूप मान
कर सब पर अनुग्रह करने में लगा हुआ तत्त्व सदाशिव माना गया है। इस सारे जगत् को
इदन्ता के रूप में देखने वाला, अर्थात् अपने से भिन्न मानने वाला तत्त्व ईश्वर कहलाता है।
ऊपर बताई गई अहन्ता और इदन्ता में अभेद दृष्टि को जगाने वाला तत्त्व शुद्धविद्या है।
अपने ही अंग से उत्पन्न हुए समस्त प्राणियों में भेद बुद्धि को पैदा करने वाला
तत्त्व माया है। समुद्र की वेला (किनारा) जैसे समुद्र को आगे बढ़ने से रोक देती है,
उसी तरह से यह माया उस परम शिव के समस्त वैभव को छिपा देती है। इस माया
शक्ति के कारण परिमित स्वरूप वाले पुरुष की समस्त शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं।
उसकी स्थिति सन्ध्याकालीन उस सूर्य के समान हो जाती हैं, जो कि अपनी ललाई में
१. प्रस्यन्दे स स्यन्दः-क. ख. ने. । २. परा-मु. । ३. विली-क. ख. । ४. जगदात्म-
तया-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ५. विश्वं पश्चात् पश्यन्-ख. ग. ने. ज. झ. उ. ।
६. जातेषु-ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ७. जीवेषु-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. वारिधे-ख. ग.
ने. ज. झ. उ. ।
पर कुछ विद्वान् अब भी इसको क्षेमराज की कृति मान कर स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में इसके
प्रकाशन और अनुसन्धान में प्रवृत्त हैं।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४७
सम्पूर्णकर्तृताद्या या बह्व्यः सन्ति शक्तयस्तस्य ।
संकोचात् संकुचिताः कलादिरूपेण रुषन्त्येनम् ॥
१तत्सर्वकर्तृता सा संकुचिता कतिपयार्थमातृपरा ।
किञ्चित्कर्तारममुं कलयन्ती कीर्त्यते कलानाम्ना२ ॥
सर्वज्ञताऽस्य शक्तिः परिमिततनुरल्पवेद्यमातृपरा ।
ज्ञानमुपपादयन्ती विद्येति निगद्यते बुधैराद्यैः ॥
नित्यपरिपूर्णतृप्तिः शक्तिस्तस्यैव परिमिता तु सती ।
भोगेषु रञ्जयन्ती सततममुं रागतत्त्वतां याता ॥
या नित्यताऽस्य शक्तिर्निष्कृष्य निधनोदयप्रदानेन ।
नियतपरिच्छेदकरी क्लृप्ता स्यात् कालतत्त्वरूपेण ॥
छिपा हुआ स्वयं अपने को भी प्रकाशित करने में असमर्थ हो जाता है। सम्पूर्णकर्तृता
आदि जो इसकी अनेक शक्तियाँ हैं, स्वयं इसके इस स्वरूप-संकोच के कारण वे भी
संकुचित हो जाती हैं और वे ही कला आदि का स्वरूप धारण कर इसको घेर लेती हैं।
उस परम शिव की सर्वकर्तृता शक्ति जब संकुचित होती है, तो यह कुछ विषयों
तक ही सीमित हो जाती है। इसी के कारण पुरुष की कर्तृत्वशक्ति भी सीमित हो जाती
है। १सर्वकर्तृता का किंचित्कर्तृता के रूप में कलन करने वाली यह शक्ति कलातत्त्व के
नाम से जानी जाती है। सर्वज्ञता शक्ति जब अपने स्वरूप का संकोच करती है, तो वह
कुछ ही विषयों को जान पाती है। ज्ञान के इस संकोच को पैदा करने वाली शक्ति को
आगमशास्त्र के प्राचीन विद्वानों ने 'विद्या' नाम दिया है। उसी परम शिव की नित्य-
परिपूर्णतृप्ति नामक शक्ति जब परिमित (संकुचित) होती है, तो वह पुरुष को सदा
भोगों में लगाये रहती है। अपनी इसी रंजकता के कारण इस तत्त्व का नाम 'राग'
पड़ गया है। इसकी नित्यता शक्ति जब निकल जाती है, तो पुरुष जन्म-मृत्यु के चक्कर
में पड़ जाता है। तब हम उसे नियत (निश्चित) समय में ही देख पाते हैं। पुरुष के इस
समयकृत संकोच को करने वाली शक्ति ही 'कालतत्त्व' के रूप में प्रकट होती है। इस
परम शिव की निरावरण स्वातंत्र्य शक्ति जब संकुचित हो जाती है, तो वह पुरुष को
१. यत्-मु. । २. नाम-ख. ग. ने. झ. उ. ।
१. शिव के सर्वज्ञता आदि छः गुणों का वर्णन आगम-तन्त्रशास्त्र, पुराण आदि में
अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रथमतः उसका अनादि बोध माया के कारण लुप्त हो
जाता है और कला आदि के कारण बाकी बचे पाँच गुण भी संकुचित हो जाते हैं। इसी-
लिये अनेक आचार्यों ने माया का भी कंचुकों में समावेश कर उनकी संख्या छः मानी
है। इस प्रसंग में विज्ञानभैरव भाषानुवाद, पृ० ८ की पहली टिप्पणी भी देखिये।

१४८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः ]
याऽस्य स्वतन्त्राख्या शक्तिः संकोचशालिनी सैव ।
कृत्याकृत्येष्ववशं नियतममुं नियमयन्त्यभून्नियतिः ॥
इच्छादित्रिसमष्टिः१ शक्तिः शान्ताऽस्य संकुचद्रूपा ।
२संकुचितेच्छाद्यात्मकसत्त्वादिमाम्यरूपिणी तु सती ॥
बुद्ध्यादिसामरस्य३रूपा चित्तात्मिका मता प्रकृतिः ।
इच्छाऽस्य रजोलूपाऽहङ्कृतिरासीदहंप्रतीतिकरी ॥
ज्ञानाऽस्य सत्त्वरूपा निर्णयबोधस्य कारणं बुद्धिः ।
तस्य क्रिया तमोमयमूर्तिर्मन इत्युच्यते विकल्पकरी ॥
४वामादिपञ्चभेदः स एव संकुचितविग्रहो देवः ।
ज्ञानक्रियोपरागप्राधान्याद् विविधविषय५रूपोऽभूत् ॥
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनजिह्वाघ्राणानि बोधकरणानि ।
वाक्पाणिपादपायूपस्था६ख्याकानि कर्मकरणानि ॥
भले-बुरे की पहचान से भी वंचित कर देती है। इस तरह से पुरुष का नियमन करने
वाली यह शक्ति 'नियति' के नाम से जानी जाती है।
इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति को अपने में समेटे हुए शान्ता शक्ति जब अपने
स्वरूप को संकुचित करती है, तो उसमें विद्यमान संकुचित इच्छा, ज्ञान और क्रिया
शक्तियां सत्त्व, रज और तमोगुण के रूप में और स्वयं शान्ता शक्ति साम्यावस्था वाली
प्रकृति के रूप में परिणत हो जाती है। यह प्रकृति बुद्धि, मन और अहंकार को अपने
में समेटे हुए चित्त का स्वरूप धारण करती है। इच्छा शक्ति ही पहले रजोगुण के रूप में
और बाद में अहंकार के रूप में परिणत होती है। यह अहंकार ही अहमात्मक अभिमान
है। ज्ञानशक्ति पहले सत्त्वगुण के रूप में और बाद में बुद्धि के रूप में परिणत होती है।
यह निश्चयात्मक ज्ञान की जननी है। क्रियाशक्ति पहले तमोगुण के रूप में और बाद में मन
के रूप में परिणत होती है। यह मन संकल्पविकल्पात्मक व्यापार का साधन है। १वाम-
देव आदि पाँच मन्त्रों का शरीर धारण करने वाला संकुचित स्वरूप का यह शिव ज्ञान और
क्रियाशक्ति की छाया पड़ने पर ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय बन जाता है। श्रोत्र, चक्षु,
स्पर्शन, जिह्वा और घ्राण ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ
१. ष्टिाशक्ति-क. ग. उ. । २. संकलिते-ख. ग. ने. झ. उ. । ३. रस्यस्वरूप-
ख. ग. ने. ज. झ. उ. । ४. वागादिपञ्चभेदैः-क. ख. मु. । ५. विषयि-ख. ग. ने.
ज. उ. । ६ स्थकनामानि-ख., स्थाख्यानि-मु. ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १४९
शब्दस्पर्शौ रूपं रसगन्धौ चेति भूतसूक्ष्माणि।
अयमेवातिनिकृष्टो जातो भूतात्मनाऽपि भूतेशः॥
गगनमनिलश्च तेजः सलिलं भूमिश्च पञ्चभूतानि।
श्रोत्रादिकरणवेद्याः शब्दाद्यास्तानि वेदकान्येषाम्॥
वचनकरी वागासीत् पाणिः स्यात् करणभूतमादाने।
गमनविसर्गानन्दत्रितये पादा¹दिकत्रिकं करणम्॥
गन्धवती भूमिः स्यादापः सांसिद्धिकद्रवास्तेजः।
उष्णस्पर्शं²मरूपस्पर्शो वायुरम्बरं शब्दः॥ इति॥३३-३४॥
(सौ० सु० १।२८-४८)
पुनरपि सिंहावलोकनन्यायेन भूतगुणानां पञ्चदशतां विद्यायाश्च तन्मय-
रूपतां विवृणोति—
पृथिव्यादिषु भूतेषु व्यापकं चोत्तरोत्तरम् ॥३४॥
भूतं त्वधस्तनं व्याप्यं
पृथिव्यादिषु। आदिशब्देनाप्तेजोवाय्वाकाशा गृह्यन्ते। ⁴तेषूत्तरोत्तरं
व्यापकमधिकवृत्ति। अधस्तनं भूतं व्याप्यं न्यूनवृत्ति। कोऽर्थः? आकाशमध-
ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच सूक्ष्मभूत (तन्मात्राएँ)
हैं। यही भूतेश शिव अपनी अत्यन्त निकृष्ट (जड़) अवस्था में आकर स्थूल भूतों का भी
स्वरूप धारण कर लेता है। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाँच भूत हैं।
शब्द आदि विषयों का ज्ञान श्रोत्र आदि इन्द्रियों से होता है। इस तरह से ये विषय वेद्य
और इन्द्रियाँ वेदक कही जाती हैं। वागिन्द्रिय वचन की और पाणि आदान क्रिया की
साधन है। पाद, पायु और उपस्थ क्रमशः गमन, विसर्ग और आनन्द के साधन हैं। भूमि
गन्ध गुणवाली, जल सांसिद्धिक (स्वभावसिद्ध) द्रव (रस) वाला, तेज उष्ण स्पर्शवाला,
वायु अरूप स्पर्शवाला और आकाश शब्द गुणवाला है ॥३३-३४॥
प्रस्तुत प्रकरण का सिंहावलोकन करते हुए पुनः पाँच भूतों के पन्द्रह गुणों और
विद्या के पन्द्रह वर्णों का विवरण प्रस्तुत करते हैं—
पृथिवी आदि पाँच महाभूतों में ऊपर ऊपर के भूत व्यापक रूप में और नीचे
के भूत व्याप्य रूप में रहते ३४-३५॥
पृथिवी शब्द के साथ जो आदि शब्द लगा है, वह जल, तेज, वायु और आकाश का
संग्राहक है। इन सबमें आगे आगे का तत्त्व व्यापक है, अधिक जगह घेरता है और
१. दिकं-ख. ग. ने. ज. झ. उ.। २. विशिष्टं सस्पर्शो-मु.। ३. शब्दाद-ने.
ज. झ. उ.। ४. पृथिव्यादिषु भूतेषूत्तरं भूतं व्यापक-ख. ने. ज. झ.।

१५० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेत
स्तनानां भूतानां व्यापकम्, अधिकवृत्तित्वात् । अन्यान्यपि चत्वारि भूतानि
व्याप्यानि, न्यूनवृत्तित्वात् । एवं वायुरग्न्यादीनां त्रयाणां व्यापकः, तानि त्रीणि
व्याप्यानि । एवं तेजोऽप्यधस्तनयोर्व्यापकम्, ते द्वे व्याप्ये । एवमापः पृथिव्या
व्यापिकाः, पृथवी व्याप्येत्यर्थः ॥३४-३५॥
तेन व्यापकगुणा व्याप्ये¹ स्थिता इत्याह—
तद्गुणा व्यापकाश्रयाः ।
व्याप्येष्ववस्थिता देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥३५॥
व्यापकाश्रयास्तद्गुणा व्यापकगुणाः, व्याप्येष्ववस्थिताः स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ।
स्थूलमधिकवृत्ति व्यापकम्, सूक्ष्ममल्पवृत्ति व्याप्यम् । व्यापकव्याप्ययोः स्थूलसूक्ष्म-
विभेदाद् व्यापकगुणा व्याप्येषु तिष्ठन्तीत्यर्थः ॥३५॥
नीचे-नीचे का भूत व्याप्य है, कम जगह घेरता है। इसका अभिप्राय यह है कि आकाश
अपने नीचे के सभी भूतों में व्यापक रूप से रहता है। सभी में इसकी स्थिति रहने से
यह सभी तत्त्वों को घेरे हुए है। इसकी अपेक्षा अन्य चार भूत व्याप्य हैं, क्योंकि आकाश
में रहने से उनका घेरा आकाश की अपेक्षा कम है। इसी तरह वायु शेष तीन अग्नि आदि
की दृष्टि से व्यापक है और वे तीन भूत व्याप्य हैं। इसी प्रकार तेज नीचे के दो भूतों
की अपेक्षा व्यापक है और वे दोनों व्याप्य हैं। इन दोनों में भी जल पृथिवी की अपेक्षा
से व्यापक है और पृथिवी व्याप्य है ॥ ३४-३५ ॥
इससे निष्कर्ष यह निकलता है कि व्यापक भूत के गुण व्याप्य भूत में रहते हैं। इसी
विषय को स्पष्ट करते हैं—
हे देवि ! व्यापक भूत में रहने वाले उसके गुण व्याप्य भूत में भी रहते
हैं, क्योंकि स्थूल और सूक्ष्म के भेद से इनमें परस्पर व्याप्यव्यापकभाव
संबन्ध है ॥ ३५ ॥
व्यापक आश्रय (भूत) के गुण भी व्यापक होते हैं, अर्थात् व्याप्य आश्रिय (भूत) में
भी वे रहते हैं, क्योंकि ये ¹स्थूल और सूक्ष्म के भेद से विभक्त हैं। स्थूल शब्द का अर्थ
यहाँ व्यापक है, जो कि अधिक जगह घेरता है। सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य है, जो कि कम
जगह घेरता है। व्यापक और व्याप्य भूत की इस स्थूलता और सूक्ष्मता के कारण व्यापक
भूत के गुण व्याप्य भूत में भी रहते हैं ॥ ३५ ॥
१. व्याप्येष्वर्थेषु—ख. ने. ज. झ. उ. ।
1 इस प्रकरण में अनेक स्थलों पर स्थूल और सूक्ष्म शब्दों का प्रयोग प्रचलित अर्थ
से सर्वथा भिन्न रूप में हुआ है। दर्शन शास्त्र में सर्वत्र स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म तत्त्व श्रेष्ठ

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५१
ननु कस्य कस्य भूतस्य गुणाः केषु केषु भूतेषु स्थिताः ? विद्यायाः १ कानि
कान्यक्षराणि २कस्य कस्य भूतस्य गुणान् लक्षयन्तीत्यत आह—
तस्माद्व्योमगुणः शब्दो वाय्वादीन्व्याप्य संस्थितः ।
व्योमबीजैस्तु विद्यास्थैर्लक्षयेच्छब्दपञ्चकम् ॥३६॥
तस्माद् व्योम्नः ३श्वेतरभूतेभ्यः स्थूलत्वाद् व्यापकत्वम्, तेन व्योमगुणः
शब्दो वाय्वादीन् वायुतेजःसलिलपृथिव्यात्मकान् व्याप्य स्थितः । विद्यास्थैर्व्योम-
बीजैः पञ्चभिः पञ्चभूतेषु स्थितानां शब्दानां पञ्चकं लक्षयेत्, व्योमवाचकत्वाद्
हकारपञ्चकं तद्गुणं शब्दपञ्चकं लक्षयतीत्यर्थः ॥३६॥
ननु विद्यायां षड् हकाराः ४सन्ति, अन्यस्य हकारस्य किं प्रयोजनमित्यत
आह—
तेषां कारणरूपेण स्थितं ध्वनिमयं परम् ।
किस किस भूत के गुण किन किन भूतों में रहते हैं और विद्या के कौन कौन से
अक्षर किस किस भूत के गुणों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन अब किया जा
रहा है—
ऊपर बताये व्याप्यव्यापक भाव के कारण आकाश का गुण शब्द वायु प्रभृति
में भी रहता है । विद्या स्थित पाँच हकार इन्हीं गुणों के सूचक हैं ॥ ३६ ॥
ऊपर बताई गई पद्धति से आकाश अपने से भिन्न भूतों की अपेक्षा स्थूल है, व्यापक
है । इसलिये आकाश का गुण शब्द वायु, तेज, जल और पृथिवी को भी व्याप्त करके
स्थित है । विद्या में स्थित पाँच व्योम बीज पाँच भूतों में स्थित पाँच प्रकार के शब्दों
को लक्षित करते हैं। इसका भाव यह है कि हकार आकाश का वाचक होता है । विद्या
में पाँच हकार वर्ण हैं। पाँच वर्ण आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी में विद्यमान
शब्दों की ओर इंगित करते हैं ॥ ३६ ॥
यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्या में तो छः हकार हैं, इस बचे हुए छठे हकार का क्या
प्रयोजन है ? इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं—
उन पाँच शब्दों का कारणभूत तत्त्व ध्वनिमय नाद है । यह छठा हकार
इसी को लक्षित करता है ॥
१. विद्यायां-ख. ज. झ. उ. । २. 'कस्य कस्य भूतस्य गुणान्'—नास्ति-ख. ज. उ. ।
३. श्वेतेरेभ्यः-ख. ने. ज. उ. । ४. निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
माना जाता है, किन्तु यहाँ स्थूल का अर्थ व्यापक तथा सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य करने के
कारण व्याप्य (सूक्ष्म) पृथिवी आदि की अपेक्षा से जल आदि तत्त्वों की व्यापकता
(स्थूल) के आधार पर स्थूल (व्यापक) तत्त्वों को वरीयता दी गई है ।

१५२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
तेषां शब्दानां कारणरूपेण स्थितः कारणात्मना स्थितो ध्वनिनादः शब्दानां
कारणम्। तदुक्तमभियुक्तैः—
पिण्डो वाचकविस्तरस्य महतः संस्कारशेषा¹ स्थिति-
र्नादोऽसौ तव देवि मूर्ध्नि समनासीमानमुल्लङ्घयन्।
²घण्टाक्वाण इव क्रमेण विरम³न्नन्यामणीयस्तनी-
माजिघ्रन् परचिद्दशामनुभवन् मूर्तिं पुराणीमुमे⁴ ॥ इति ।
तन्मयं ⁵तल्लक्षकत्वात्। परं कामराजबीजस्थितककारलकारमध्यगतहकारा-
क्षरम्। कोऽर्थः ? कामराजमध्यस्थितः षष्ठो हकार आकाशादिपञ्चभूतगतशब्द-
पञ्चककारणनादरूपः कामराजबीजस्य स्थितिरूपतां लक्षयतीत्यर्थः ॥
ऊपर बताये गये पाँच प्रकार के शब्दों को उत्पन्न करने वाला ध्वनिमय नाद ही इन
सबका कारण है। जैसा कि किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है—
वर्ण, पद, वाक्यरूप इस विशाल शब्द विस्तार की जहाँ संस्कार के रूप में स्थिति
बनी रहती है, उसी का नाम पिण्ड है। इसको नाद कहते हैं। इसका भाव यह है कि
नाद के रूप में परिणत हुए पिण्ड मन्त्र में वर्ण, पद, वाक्य रूप शब्दप्रपंच की संस्कार के
रूप में स्थिति रहती है। सारा शब्दप्रपंच यहाँ आकर शान्त हो जाता है। हे देवि उमे !
यह नाद ललाट से ऊपर बढ़ता हुआ जब समना की सीमा को लांघकर उन्मनावस्था में
पहुँचता है, तब वह एक अनोखी सूक्ष्मतर अवस्था को स्पर्श करता हुआ परचिद्दशा रूप
अपने पुराने वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह कैसे होता है, इसका उदा-
हरण है— घण्टा ध्वनि। जैसे घण्टे को बजाने से उत्पन्न हुई ध्वनि धीरे-धीरे सूक्ष्म से
सूक्ष्मतर होती हुई सनसनाहट के रूप में बदल कर अन्ततः विलीन हो जाती है, उसी तरह
से नाद भी समना पर्यन्त सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था में पहुँचता हुआ अन्त में विलीन हो
जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है ।।
कामराज बीज के ककार और लकार के बीच में विद्यमान छठा हकार इसी नादमय
शब्द को लक्षित करता है। इसका अभिप्राय यह है कि कामराज बीज में स्थित छठा
हकार आकाश आदि पाँच भूतों में विद्यमान पाँच शब्दों के कारणभूत छठे नादरूप
शब्द का बोधक है। इससे कामराज बीज स्थिति का प्रतिनिधि है, इस बात की पुनः¹
पुष्टि हो जाती है।
१. दोषा-ख. ग. ने. ज. झ. ब. उ. । २. 'घण्टा ॰॰॰मुमे' नास्ति-क. ग. उ. ।
३. न्नन्त्यां-ब. । ४. णीं मम-ख. ब. । ५. तल्लक्ष्यत्वात्-ख. ने. ज. झ. ।
१. कामराज बीज की स्थितिरूपता का प्रतिपादन पहले (२।२२-२३) किया जा
चुका है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५३
ननु हकारादिवर्णा आकाशादिभूतवाचका इत्युक्तम्, कथं शब्दादिपञ्चभूत-
गुणानामपि वाचका इत्युच्यन्त इत्यत आह—
भवेद् गुणवतां बीजं गुणानामपि वाचकम् ॥३७॥
गुणवताम्, गुणाः शब्दादयः पञ्च, तद्वतामाकाशादीनां पञ्चभूतानां बीजम् ।
जातावेकवचनम् । अत्र विद्यायां हकारादीनि पञ्चभूताक्षराणि व्यञ्जनानि । अत्रै-
वोक्तम्—"हकाराद् व्योम संभूतम्" (२।२९) इत्यादिना १ । अतो बीजान्युच्यन्ते ।
ककारादिक्षकारान्तानां व्यञ्जनानां बीजत्वमुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्—
षण्ढवर्जंमहिमद्युतेः २स्वरा बिन्दुसर्गंरहिताश्च ये शुचेः ।
सर्व एव शशिनः कलाः३ शिवे योनयो विधृतबोजतः स्वराः४ ॥ इति ।
(श्लो० ४०)
फिर प्रश्न उठता है कि पहले यह बताया गया था कि विद्यागत हकार आदि वर्ण
आकाश आदि भूतों के वाचक हैं, अब कहा जा रहा है कि ये वर्ण भूतगत शब्द आदि
गुणों के भी वाचक हैं । यह कैसे होगा ? इसी का उत्तर देते हैं—
गुणवान् आकाश आदि के वाचक बीजभूत हकार आदि अक्षर आकाशादि-
गत गुणों के भी वाचक हो जाते हैं ॥३७॥
यहाँ एकवचन में प्रयुक्त बीज शब्द बीज जाति का वाचक है । विद्या में विद्यमान
बीजाक्षर शब्द आदि गुणों से युक्त आकाश आदि के तो वाचक हैं ही, वे आकाश आदि
में विद्यमान गुणों के भी वाचक हो जाते हैं । यहाँ विद्या में पाँच भूतों के वाचक हकार
आदि अक्षर व्यंजन हैं । पहले (२।२९) ही इस विषय का वर्णन किया जा चुका है ।
हकार आदि से आकाश आदि की इस उत्पत्ति के कारण ही इनको 'बीज' कहा गया है ।
ककार से क्षकार पर्यन्त व्यंजनों को चिद्गगनचन्द्रिका में 'बीज' नाम दिया गया है ।
जैसे कि—
षण्ढ (ऋ ॠ ऌ ॡ) स्वरों को छोड़कर बाकी बारह स्वर सूर्य की बारह कलाओं के,
बिन्दु और विसर्ग को भी छोड़कर बाकी दस स्वर अग्नि की १० कलाओं के और सभी
१. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. कला-ख. ने. ज. उ. । ३. कलाश्च ये
योनयो-ख. ज. झ. उ. । ४. बीजकास्तदा-ख. ने. ज. उ. ।

१५४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
परापञ्चशिकायामप्युक्तम्—"द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता"
(श्लो० ४०) इति । तानि तद्गुणानां शब्दादीनां वाचकानि लक्षकाणि, हकाराद्य-
क्षराण्याकाशार्थेषु संकेतितत्वात्तद्गुणेषु शब्दादिषु लक्षकाण्येव । तदुक्तमभियुक्तैः—
“साक्षात् संकेतितं योऽर्थमभिधत्ते स वाचकः” (का० प्र० २।७) इति । कोऽर्थः ?
शब्दादिगुणवतामाकाशादिभूतानां यानि बीजानि वाचकानि १हकारादीनि, तानि
तद्गुणानां शब्दादीनां लक्षकाणीत्यर्थः२ ॥३७॥
सोलह स्वर चन्द्र की १६ कलाओं के द्योतक हैं । हे देवि ! ये सभी स्वर१ बीजाक्षरों को
धारण करने वाले हैं, अतः इनको ‘योनि' कहा जाता है ॥
परापञ्चाशिका में भी बताया गया है— “बीज और योनि के भेद से यह मातृका
देवी दो रूपों में स्थित है”। आकाश आदि के अभिव्यंजक ये हकार आदि बीजाक्षर उन
आकाश आदि के शब्द आदि गुणों को भी लक्षित करते हैं । हकार आदि अक्षरों का
साक्षात् संकेतित (अभिधेय) अर्थ तो आकाश आदि ही हैं, किन्तु लक्षणा वृत्ति के द्वारा
ये आकाशादिगत गुणों को भी लक्षित कर देते हैं । इस विषय में अभियुक्तों की उक्ति
है—"साक्षात् संकेतित अर्थ को बताने वाला शब्द वाचक होता है”। इससे यह अभि-
प्राय निकलता है कि शब्द आदि गुणों से संपन्न आकाश आदि भूतों के वाचक जो हकार
आदि बीजाक्षर हैं, वे आकाशादिगत शब्द आदि गुणों का भी लक्षणा वृत्ति के द्वारा बोध
कराते हैं ॥३७॥
१. ‘हकारादीनि' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. त्युक्तम्-ख. ।
१. सूर्य की १२, अग्नि की १० तथा सोम की १६ कलाओं की चर्चा योगिनीहृदय
(३।१००-१०१) में हुई है और दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इनके नाम
दिये हैं। वहाँ चन्द्र की १६ कलाओं में १६ स्वरों का, वह्नि की १० कलाओं में यादि
क्षान्त दस वर्णों का तथा सूर्य की १२ कलाओं में ककार से ठकार पर्यन्त वर्णों का
अनुलोम क्रम से तथा भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का प्रतिलोम क्रम से विन्यास प्रदर्शित
है। अतः चिद्गगनचन्द्रिका के प्रस्तुत श्लोक में द्वादश और दश स्वर केवल संख्या
के सूचक माने जाने चाहिये । यहाँ स्वरों को योनि तथा व्यंजनों को बीज माना गया
है । कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री ने भी इसी मत का प्रतिपादन किया है । किन्तु मालिनी-
विजय (३।१०-११) में स्वरों को बीज तथा व्यंजनों को योनि बताया गया है। अभिनव-
गुप्त (तन्त्रसार,पृ० १५) इसी मत का अनुसरण करते हैं। आगे (३।१५३) दीपिकाकार
भी स्वरों को बीज ही मानते हैं।
सूर्य, वह्नि और सोम की ३८ कलाओं के समान अघोर आदि पाँच मन्त्रों की भी
३८ कलाएँ हैं। उनके नाम स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९) तथा नेत्रतन्त्र (२२।२६-३४)
में देखे जा सकते हैं।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५५
लक्षणायां निमित्तमाह—
कार्यकारणभावेन तयोरैक्यं विवक्षया ।
तयोः गुणगुणिनोः । कार्यकारणभावेन । गुणी कारणम्, गुणः कार्यम् । अतः
कार्यकारणभावेनै¹कत्वविवक्षया विवक्षितमेवैकत्वम्, न तु तात्त्विकम् । गुणगुणिनोः
कार्यकारणभावादेकत्वमारोप्य तत्संबन्धं निमित्तीकृत्य लक्षण्या गुणिशब्दा गुणेषु
योज्यन्त² इत्यर्थः । तदुक्तं ³महास्वच्छन्दसंग्रहे—
शब्दः ⁴शान्तत्वघोरत्वविशेषा⁵पन्नरूपकः ।
शब्दस्तु शब्दतन्मात्रं मृदूष्णकठिनश्चलः ॥
लक्षणा में कोई निमित्त होना चाहिये, उसी को बताते हैं—
गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । उनकी एकता की ओर
इंगित करना ही मात्र यहाँ लक्षणा का प्रयोजन है ॥
गुण और गुणी का कार्यकारणभाव संबन्ध होता है । इनमें से गुणी कारण और
गुण कार्य है । अतः इस कार्यकारणभाव की एकता को बताना मात्र यहाँ लक्षणा का
प्रयोजन है । अर्थात् यहाँ एकता की विवक्षामात्र है, इनमें वास्तविक एकता नहीं है ।
गुण और गुणी में कार्यकारणभाव संबन्ध के आधार पर इनमें एकता का आरोप कर
देते हैं । इस एकता संबन्ध को ही निमित्त बना कर लक्षणा वृत्ति के द्वारा गुणी के वाचक
शब्दों का प्रयोग गुणों में भी कर दिया जाता है । इस विषय का विस्तार महास्वच्छन्द-
संग्रह में इस तरह से किया गया है—
स्थूल रूप में शब्द ¹शान्त, घोर और मूढ नामक विशेष दशा को धारण कर लेता
है । सूक्ष्म रूप में विद्यमान यही शब्द शब्दतन्मात्र कहलाता है । ²मृदु, उष्ण, कठिन,
१. एकत्वं विवक्षितं न तु—ख. ने. ज. उ. । २. योज्याः—ख. उ. । ३. 'महा'
नास्ति—झ. । ४. सा(शा)न्तद्वयोरर्थविशे—ख. ने. ज. उ. । ५. षोऽयं न रूपकः—ख. ज.
उ., पः पञ्चरूपकः—ने. ।
१. सांख्यकारिका (श्लो० ३८) में पाँच तन्मात्राओं को अविशेष तथा उनसे उत्पन्न
पाँच महाभूतों को विशेष संज्ञा दी गई है तथा इन विशेषों को शान्त, घोर और मूढ स्वभाव
का बताया गया है । वाचस्पति मिश्र सत्त्वगुणमय सुखात्मक प्रकाशात्मक और लघुस्वभाव
को शान्त, रजोगुणमय दुःखात्मक अव्यवस्थित स्वभाव को घोर तथा तमोगुणात्मक निराशा
से भरे हुए भारी स्वभाव को मूढ बताते हैं । शान्त, घोर और मूढ स्वभाव के भोग्य
विषयों का भोक्ता पुरुष भी इन स्वभावों से आक्रान्त हो जाता है ।
२. इस विषय का विस्तार और संक्षेप मतङ्गपारमेश्वर (वि० १९-२३ पटल),
स्वच्छन्दतन्त्र (१२।१५-३०), मृगेन्द्रागम (वि० १२।१९-२९), तत्त्वसंग्रह (श्लो० २-४),
भोगकारिका (श्लो० ५-२०), तत्त्वप्रकाश (श्लो० ६१-६३) आदि में देखा जा सकता है ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३५६ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
विशिष्टस्पर्शरूपश्च स्पर्शतन्मात्रसंज्ञकः ।
नीलपीतत्वशुक्लत्वविशिष्टं रूपमेव च ॥
रूपतन्मात्रमित्युक्तं १मधुरत्वादिसंयुतम् ।
रसतन्मात्रसंज्ञं तु सौरभादिविशेषितः ॥
गन्धः स्याद् गन्धतन्मात्रं तेभ्यो वै भूतपञ्चकम् ।
आकाशं शब्दतन्मात्रं नित्यं शब्दगुणं महत् ॥
व्यापकं निर्मलं तत्त्वमवकाशप्रदानकम् ।
स्पर्शतन्मात्रतो वायुश्चलद्रूपोऽनिलोऽभवत् ॥
जगत्प्राणोऽनिलो व्यूहप्रेरणं च लघुर्भवेत् ।
शब्दस्पर्शगुणः प्रोक्तो गमागमनकर्मकृत् ॥
शब्दस्पर्शरूपगुणं तेजस्तत्त्वं तु भास्वरम् ।
रूपतन्मात्रकार्यं च पाककर्मकरं शिवे ॥
रसतन्मात्रतो जातं वारितत्त्वं द्रवात्मकम् ।
शब्दस्पर्शरूपरसगुणं संग्रहकर्मकृत् ॥
चल आदि विशेष स्पर्शवाला तत्त्व स्पर्शतन्मात्र कहलाता है। नील, पीत, शुक्ल आदि
विशिष्ट रूपों वाला तत्त्व रूपतन्मात्र कहा गया है। मधुरत्व आदि गुणों से विशिष्ट
रसतन्मात्र और सुरभि (सुगन्ध) आदि से विशिष्ट गन्धतन्मात्र कहा गया है। इन्हीं से
पांच भूतों की उत्पत्ति होती है। शब्दतन्मात्र से आकाश की अभिव्यक्ति होती है।
शब्द गुण वाला यह आकाश नित्य, महान्, व्यापक और निर्मल है। अन्य सभी तत्त्वों
को यह अवकाश देने वाला है, अर्थात् अन्य सभी भूत आकाश के द्वारा प्रदत्त अवकाश
में ही स्थित हैं। स्पर्शतन्मात्र से वायु की उत्पत्ति होती है। यह वायु चंचल गति वाला
है, जगत् का प्राण है, १व्यूहन और प्रेरण इसकी वृत्ति है और यह बहुत हल्का है। शब्द
और स्पर्श ये दो गुण इसमें हैं। श्वास-प्रश्वास के रूप में गमन (बाहर जाना)
और आगमन (भीतर आना) की क्रिया यही करता है। शब्द, स्पर्श और रूप गुण वाला
भास्वर तेजस्तत्त्व रूपतन्मात्र का कार्य है। हे शिवे ! यह तत्त्व पाक क्रिया का निष्पादक
है। रसतन्मात्र से द्रवात्मक जल तत्त्व निकलता है। इसमें शब्द, स्पर्श, रूप और रस
१. मधुरत्वोष्णसं-ख. ज. झ. उ. ।

  1. ऊपर उद्धृत स्थलों का अवलोकन कीजिये । टीकाकारों ने व्यूहन का अर्थ
    अवयव-घटन, अवयव-विरचन, विविध-वहन अथवा पुंजीकरण किया है। पांच भूतों में वायु
    पहला तत्त्व है, जो कि जागतिक पदार्थों को योजना बद्ध रूप से जुटाने में लगता है।
    वायु के इस व्यूहन और प्रेरण व्यापार की ही चर्चा प्रस्तुत उद्धरण में भी हुई है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५७
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धपञ्च ¹गुणान्वितम् ।
पृथिवीतत्त्वमाख्यातं ²कठिनं सर्वधारणम् ॥
पृथ्व्यादिव्योमतत्त्वान्त³पञ्चकं पूर्वपूर्वकम् ।
कार्यदृष्ट्या⁴ समावृत्य वर्तते पञ्चकं क्रमात् ॥ इति⁵ ॥
पूर्वं विद्यास्थहकारपञ्चकस्य पञ्चभूतस्थितशब्दपञ्चक⁶लक्षकतामुक्त्वे-
दानीं ⁷वाय्वादिभूतचतुष्टयगतं स्पर्शचतुष्टयं वायुवाचकबीजैर्लक्षयति—
महामायात्रयेणापि कारणेन च बिन्दुना ॥ ३८ ॥
वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां च चतुष्टयम् ।
उत्पन्नं भावयेद् देवि स्थूलसूक्ष्मविभेदतः ॥ ३९ ॥
महामाया ईकारः, तेषां त्रयं बीजत्रयशिखरवर्तिनामीकाराणां बिन्दुद्वयार्ध-
मात्रामयानां त्रयम् । कारणेन च बिन्दुना तदक्षर⁸त्रयकारणेनाकारहकारसामरस्य-
रूपेण कामाख्येनोर्ध्वबिन्दुना । वाय्वग्निजलभूमीनां स्पर्शानां चतुष्टयमुत्पन्नं
ये चार गुण रहते हैं । यह तत्त्व संग्रह क्रिया का निष्पादक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस
और गन्ध इन पाँच गुणों से युक्त पृथिवी तत्त्व है । यह कठोर है और सबको धारण
करने वाला है । पृथिवी से लेकर आकाश पर्यन्त पाँच तत्त्वों में पहला तत्त्व अपने कार्य
तत्त्व को अपने में समेटे हुए रहता है ॥
विद्यास्थित पाँच हकार पाँच भूतों में स्थित पाँच शब्दों को लक्षित करते हैं, इस
विषय का वर्णन करने के उपरान्त अब बताया जा रहा है कि विद्यागत वायुवाचक
बीजों से वायु प्रभृति चार भूतों के चार प्रकार के स्पर्शों को लक्षित किया जाता है—
हे देवि ! तीन महामायाओं और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और
भूमिगत चार स्पर्शों को उत्पति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये, क्योंकि
स्थूल और सूक्ष्म भूत के क्रम से स्पर्श गुण की अनुवृत्ति चार भूतों में मानी
जाती है ॥३८-३९॥
महामाया शब्द यहाँ ईकार का वाचक है । श्रीविद्या में तीन ईकार हैं । इनकी स्थिति
तीनों बीजों के अन्त में है तथा इनका आकार दो बिन्दु और हार्धकला से बना है ।
इनके अतिरिक्त एक कारण बिन्दु भी है । यह तीनों ईकाराक्षरों का कारण है और
इसकी स्थिति अकारहकारसामरस्यमय ऊर्ध्व बिन्दु के रूप में है, जिसको काम बिन्दु
१. गुणात्मकम्–ख. ने. ज. उ. । २. कथितं–ख. ज. उ. । ३. तत्त्वान्तं–ज. झ. उ. ।
४. कार्यं व्यत्यास–ने. ज. झ. । ५. इतः परं केवलं कपुस्तके विद्यमानः पाठोऽग्रे
सूक्ष्माक्षरेषु स्थापितः । ६. पञ्चकं पूर्वं कथयित्वे–क. ग. । ७. वायुवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं
स्पर्शचतुष्टयं लक्षयतीत्याह–ने. ज. झ. उ. । ८. त्रयं नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. ।

१५८ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
लक्ष्यं भावयेत् । स्थूलसूक्ष्मविभेदतः । सूक्ष्माणि पृथिव्यप्तेजांसि, स्थूलो वायुरर्वा-
चीनेभ्यः । अत एव एवंविधेन ईकारत्रयेणापि लक्षिता बिन्दवः ¹षट्संख्याकाः ।
कारणं बिन्दुः समष्टिवृत्तं हि, षड्बिन्दुलाञ्छितवृत्तात्मकत्वाद् वायुमण्डलस्य ।
तदुक्तमभियुक्तैः—"कण्ठादितालुपर्यन्तं वृत्तं षड्बिन्दुलाञ्छितम् । धूम्रम्" इति ।
[एवमन्यत्रापि—
समष्टिबिन्दुना वायुः स्थूलसूक्ष्मप्रभेदतः ।] तद्वायुमण्डलवाचकेन ईकारत्रयेण
समष्टिबिन्दुना च स्थूलसूक्ष्मविभेदतो वाय्वादि²भूतचतुष्टयस्थितं स्पर्शचतुष्टयं
लक्षयेदित्यर्थः ॥ ३८-३९ ॥
वायुवाचकैर्वायुगुणं स्पर्शचतुष्टयं लक्षयित्वेदानीं तेजोवाचकैरक्षरैस्तद्गुणं
रूपत्रयं लक्षयति—

कहते हैं । इन तीन ईकारों और कारण बिन्दु से वायु, अग्नि, जल और भूमिगत चार
प्रकार के स्पर्श उत्पन्न हुए हैं, ऐसी भावना करनी चाहिये । इन चतुर्विध स्पर्शों की
उत्पत्ति स्थूल-सूक्ष्म के भेद से होती है । इनमें पृथिवी, जल और तेज सूक्ष्म तथा वायु
इनसे स्थूल है । ऊपर बताया गया है कि ईकार का स्वरूप दो बिन्दुओं से बना है । तीन
ईकारों में मिलकर छः बिन्दु हुए और कारण बिन्दु समष्टि वृत्त का स्वरूप धारण कर
लेता है । इस तरह से छः बिन्दुओं से लांछित वृत्ताकार ¹वायुमण्डल का स्वरूप इससे
बन जाता है । किसी अभियुक्त ने वायुमण्डल का स्वरूप बताया है—"कण्ठ से तालु पर्यन्त
वृत्ताकार छः बिन्दुओं से लांछित वायुमण्डल होता है । यह धूम्र वर्ण का है" । ²[अन्यत्र भी
कहा गया है—"स्थूल और सूक्ष्म के भेद से समष्टि बिन्दु वायुमण्डल का बोध कराता
है ।"] इस तरह से वायुमण्डल के वाचक तीन ईकार और समष्टि बिन्दु में स्थूल और
सूक्ष्म के भेद से वायु प्रभृति चार भूतों में विद्यमान चार स्पर्शों की भावना करनी
चाहिये ।।३८-३९।।
विद्यागत वायुवाचक अक्षरों से वायु के गुणभूत चार स्पर्शों को लक्षित करने के बाद
अब तेजोवाचक अक्षरों में तेजोगत रूपत्रय की भावना बताते हैं—

१. षट् सन्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भूत' नास्ति—ख. ने. ज झ. उ. ।
१. वायुमण्डल का यह स्वरूप मूल ग्रन्थ (१।४२) में भी बताया गया है ।
२. कोष्ठक में संस्कृत के जिस अंश की व्याख्या की गई है, वह केवल एक मातृका
में उपलब्ध है और पूर्व श्लोक की व्याख्या में महास्वच्छन्दसंग्रह के उद्धरण के बाद
रखा गया है । वहाँ उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है, अतः हमने प्रसंग के अनुसार इसको
यहाँ रखकर उसका भाषानुवाद किया है ।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५९
रूपाणां त्रितयं तद्वत् त्रिभी रेफैर्विभावितम् ।
रूपाणां त्रितयं वह्निवारिभूमिष्ठानां रूपाणां त्रितयं त्रिभो रेफैर्विभावितं
लक्षितम् ॥
ननु रूपं पृथिव्यप्तेजसां साधारणम्, कथं तेजोबीजेन रेफेण लक्षितमित्यत
आह—
प्रधानं तेजसो रूपं तद्बीजेन हि जन्यते ॥४०॥
१सत्यं त्रिष्वपि भूतेषु विद्यते रूपम्, तथापि वाय्वाकाशयोरभावात् प्रथमं
तेजस एव२ रूपं प्रधानम् । पश्चादितरयोर्भूतयोस्तद्बीजेन रेफेण जन्यते ३प्रका-
श्यते । जननं प्रादुर्भावः ॥४०॥
पूर्वं तेजोवाचकैरक्षरैस्तेजोगुणं रूपत्रयं लक्षयित्वेदानीमब्वाचकैरक्षरैस्तद्गुणं
रसद्वयं लक्षयति—
विद्यास्थैश्चन्द्रबीजैस्तु स्थूलः सूक्ष्मो रसः स्मृतः ।
इसी तरह से विद्यागत तीन रेफों में तीन रूपों की भावना करे ॥
तेज, जल और पृथिवीगत रूप ही रूपत्रय के नाम से वर्णित है । विद्यागत तीन रेफों
से इनकी उत्पत्ति हुई है, ऐसी भावना करनी चाहिये ॥
रूप गुण पृथिवी, जल और तेज तीनों में रहता है, तब इसकी उत्पत्ति अग्निबीज
रेफ से कैसे मानी जाती है ? इसका समाधान करते हैं—
रूप गुण प्रधानतः तेजस्तत्त्व में ही रहता है, अतः उसकी उत्पत्ति अग्निबीज
से ही मानी जाती है ॥४०॥
आपका यह कहना ठीक है कि तीनों भूतों में रूप रहता है, तो भी वायु और
आकाश में तो यह है नहीं । उसके बाद प्रधानतः इसकी स्थिति सर्वप्रथम अग्नि में ही
मानी जाती है । जल और पृथिवी में रूप की उत्पत्ति इसके बाद ही होती है और वह
भी अग्निबीज रेफ के द्वारा ही लक्षित होती है । इस तरह अग्निबीज रेफ ही तीनों तत्त्वों
में रूप को प्रकाशित करता है । इस पूरे प्रकरण में उत्पत्ति का अर्थ प्रादुर्भाव करना
चाहिये ॥४०॥
इस तरह से अग्नितत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रूपों की उत्पत्ति बताने के बाद
अब जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से दो प्रकार के रसों की उत्पत्ति बताते हैं—
विद्यागत चन्द्रबीजों से स्थूल और सूक्ष्म रस की निष्पत्ति होती है ॥
१ 'सत्यं' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'एव' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।
३. 'प्रकाश्यते' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।

१६० योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
१विद्याबीजस्थैश्चन्द्रबीजैः सकारैः। अभिधानमात्रमेतत्। तदुक्तमभि-
युक्तैः—
व्योमेन्दुवह्न्यधरबिन्दुभिरेकमन्य२द्रक्ताच्छकेन्द्रशिखिभिः सरमार्थचन्द्रैः।
अन्यद् द्युशीतकरपावकमन्वमन्तैर्बीजैरमोभिरुदिता त्रिपुरेति विद्या॥ इति।
(प्र० सा० ९।३)
स्थूलः सूक्ष्मः। स्थूलो रसोऽप्तत्त्वगतः, व्यापकत्वात्। सूक्ष्मो रसो भूतत्त्वगतः,
व्याप्यत्वात्। स्मृतः भावितः। स्मृतिर्हि भावना॥
ननु विद्यायां३ सकारत्रयमस्ति, अप्पृथिव्योस्तु रसद्वयमेव, इतरेण सकारेण
किमुच्यत इत्यत आह—
श्रीविद्या के बीजों में चन्द्रबीज (सकार) भी है। चन्द्रबीज सकार का १अभिधान
है, इसमें प्रपंचसार का यह वचन प्रमाण है—
व्योम हकार, इन्दु सकार, वह्नि रेफ, अधर ऐकार, बिन्दु अनुस्वार—इन सबके मिलने
पर त्रिपुरा विद्या का प्रथम बीज; रक्त हकार, अच्छ सकार, ककार, इन्द्र लकार,
शिखी रेफ, रमा ईकार, अर्धचन्द्र बिन्दु—इन सबके मिलने पर द्वितीय बीज तथा द्यु
हकार, शीतकर सकार, पावक रेफ, मनु औकार, अमन्त विसर्ग—इन सबके मिलने पर
तृतीय बीज बनता है। इन तीन बीजों वाली विद्या ही २त्रिपुरा विद्या कही जाती है।
जलतत्त्वगत रस स्थूल (व्यापक) और पृथिवी तत्त्वगत सूक्ष्म (व्याप्य) है, क्योंकि पृथिवी
की अपेक्षा जलतत्त्व अधिक व्यापक (बड़ा) है। अतः जलगत रस की स्थूल (व्यापक)
रूप में और पृथिवीगत रस की सूक्ष्म (व्याप्य) रूप में भावना की जाती है॥
प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन सकार हैं, जल और पृथ्वी में रस दो ही प्रकार
का है, तब तीसरे सकार का क्या प्रयोजन है—
१. 'विद्याबीजस्थैः' नास्ति—ख. ने. ज. ब. उ.। २. 'रक्ताच्छ....विद्या' नास्ति—
ख. ग. ने. ज. ब.। ३. विद्यायामस्यां—ख. ने. ज. झ. उ.।

  1. इसका अभिप्राय यह है कि चन्द्र शब्द से सकार का बोध होता है। प्रपंचसार
    के जिस वचन को यहाँ प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया है, उसमें चन्द्र शब्द से
    विद्यागत सकार का उद्धार बताया गया है।
  2. नि० षो० की व्याख्या ऋजुविमर्शिनी (पृ० १०६) में इस श्लोक को आवाहनी
    विद्या के प्रसंग में उद्धृत किया गया है। इस विद्या का विनियोग त्रिपुरा के आवाहन
    के लिये किया जाता है, अतः प्रपंचसार में यह त्रिपुरा के नाम से ही संबोधित कर
    दी गई है।

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १६१
संबन्धो विदितो लोके रसस्याप्यमृतस्य च ॥४१॥
अमृतस्य सुधाया रसस्यापि संबन्धो लोके विदितः सुरासुरैरपांनिधौ मध्य-
माने तत्सारभूतममृतं समुदितमिति पुराणप्रसिद्ध्या¹ लोके विदितः² परिज्ञातः³ ।
अत्राप्तत्त्वसारभूतत्वात् तद्गुणो रसस्तृतीयसकारेण लक्ष्यते । कोऽर्थः ? अप्त्तत्त्वं
स्थूलम्, अमृतं तत्सारभूतं सूक्ष्मम्, तद्व्याप्या पृथिवी च सूक्ष्मा । तेन सलिलामृत-
पृथिव्यन्तरे⁴ त्रिधा स्थितो रसो विद्यास्थैस्त्रिभिः सकारैर्लक्ष्यत इत्यर्थः ॥४१॥
पूर्वमब्वाचकैरक्षरैरबगुणं रसत्रयं लक्षयित्वेदानीं पृथिवीवाचकैर्वर्णैः पृथिवीगुणं
गन्धं लक्षयति—
⁵वसुन्धरागुणो गन्धस्तल्लिपिर्गन्धवाचिका ।
वसुन्धरायाः पृथिव्याः, गुणो गन्धः । तल्लिपिः पृथिवीवाचकवर्णो लकारः ।
गन्धवाचिका गन्धस्य⁶ परिभाषणकरी ।
लोक में अमृत रस का भी संबन्ध विदित है । इस अमृत का ही तृतीय
सकार से बोध होता है ॥४१॥
अमृत (सुधा) के रस का भी संबन्ध लोक में विदित है कि देव और दानवों ने
मिलकर क्षीरसमुद्र का जब मन्थन किया था, तो समुद्र के जल से उसके सार के रूप में
अमृत निकला था । पुराणवर्णित यह कथा लोक में प्रसिद्ध है । यह अमृत जलतत्त्व का
सार है । अतः जल का यह अमृतमय रस विद्यागत तृतीय सकार से लक्षित होता है ।
इनमें जलतत्त्व स्थूल (व्यापक) है । जलतत्त्व का सारभूत अमृत सूक्ष्म (व्याप्य) है और
जलतत्त्व की व्याप्य पृथिवी का रस भी सूक्ष्म (व्याप्य) है । इस तरह जल, अमृत और
पृथिवी में विद्यमान त्रिविध रस विद्यागत तीन सकारों से लक्षित होता है ॥४१॥
इस तरह जलतत्त्व के वाचक अक्षरों से त्रिविध रस को लक्षित करने के बाद
अब पृथिवीवाचक वर्णों से पृथिवीगत गन्ध गुण की वासना बताते हैं—
गन्ध पृथिवी का गुण है । पृथिवी का वाचक वर्ण इस गन्ध को लक्षित
करता है ॥
वसुन्धरा (पृथिवी) का गुण गन्ध है । उसकी लिपि, अर्थात् पृथिवी तत्त्व का
वाचक वर्ण लकार, गन्ध की वाचिका है, पृथिवीवाचक वर्ण तद्गत गन्ध को भी
लक्षित करता है ॥
१. प्रसिद्धं-ख. ने. ज. उ. । २. 'विदितः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. ज्ञातम् ।
अतोऽमृतसार-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. न्तरस्थितो-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. वसु-
नामाऽपि गन्ध-क. । ६. गन्धस्य प्रकाशिका-ने. ज. झ. उ.
११

१६२ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
ननु विद्यायां लकारत्रयमस्ति, तत्रैकेन लकारेण पृथिवी १संस्थितो गुणो गन्धो
लक्षितः, शिष्टाभ्यां २लकाराभ्यां किं क्रियत इत्यत आह—
भुवनत्रयसंबन्धात् त्रिधात्वं तु महेश्वरि ॥४२॥
भुवनत्रयं लोकत्रयम्, तत्संबन्धात् लोकत्रयाधारत्वात्, आधाराधेयभावः३
संबन्धः, तस्मात् संबन्धाद्धेतोः पृथिव्या ४स्त्रिधात्वम्। तेन पृथिवी ५भागत्रयगत-
गन्धत्रयलक्षकं लकारत्रयमित्यर्थः ॥४२॥
“हकाराद् व्योम संभूतं ककारात्तु प्रभञ्जनः” (२।२९) ६इत्यत्र वायुवाचक-
तयोक्तस्य७ ककारस्य प्रमातृवाचकत्वेनापि वक्तुं शक्यत्वादन्यैरक्षरैः स्पर्शचतुष्टयं
लक्षयित्वेदानीं ककारत्रयेण प्रमातृत्रयं लक्षयति—
अशुद्धशुद्धमिश्राणां प्रमातॄणां परं वपुः।
क्रोधीशत्रितयेनाथ विद्यास्थेन प्रकाश्यते ॥४३॥
यहाँ पुनः प्रश्न उठता है कि विद्या में तो तीन लकार हैं, इनमें से एक से पृथिवीगत
गुण गन्ध लक्षित हो जायगा, बाकी दो लकारों का क्या प्रयोजन है ? अब इसी का
उत्तर देते हैं—
हे महेश्वरि ! भुवन (लोक) तीन होते हैं। इन तीनों भुवनों को लक्षित
करने के अभिप्राय से विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥
पृथिवी तीनों भुवनों (लोकों) से संबद्ध है। तीनों लोक इसी पर ठहरे हुए हैं, अतः
इनमें परस्पर आधाराधेयभाव संबन्ध है। इस संबन्ध के कारण पृथिवी तीन लोकों के रूप
में विभक्त मान ली जाती है। पृथिवी के इन तीन भागों में विद्यमान तीन गन्धों को
लक्षित करने के लिये ही विद्या में तीन लकार स्थित हैं ॥ ४२ ॥
पहले (२।२९) बताया गया है कि हकार से आकाश और ककार से वायुतत्त्व की
अभिव्यक्ति हुई। वायुतत्त्व के वाचक विद्यागत ककार तीन प्रमाताओं के भी वाचक हो
सकते हैं, अतः महामाया प्रभृति वर्णों से स्पर्शचतुष्टय की वासना (२।३८) बता कर
अब यहाँ विद्यागत तीन ककार वर्णों से तीन प्रमाताओं को लक्षित करते हैं—
अशुद्ध, शुद्ध और मिश्र स्वभाव वाले त्रिविध प्रमाताओं का वासनात्मक
स्वरूप विद्यागत तीन क्रोधीश ( ककार ) वर्णों से लक्षित होता है ॥ ४३ ॥
१. 'संस्थितो' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । २. 'लकाराभ्यां' नास्ति—ख. ने. ज.
झ. ड. । ३. 'भावः' नास्ति—ख. ने. ज. झ. ड. । ४. स्त्रित्वम्—ख. ने. ज. झ. ड. ।
५. भागत्रयाल्लोकत्रय—क. ग. । ६. इत्येवं—ख. ने. ज. झ. ड. । ७. क्तस्यापि—
झ. ड. । ८. णां प्र—ख. ने. ज. झ. ड. । ९. न्थितो—ख. ज. ।