योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ योगिनीहृदयम् [ मन्त्रसंकेतः
परापञ्चशिकायामप्युक्तम्—"द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता"
(श्लो० ४०) इति । तानि तद्गुणानां शब्दादीनां वाचकानि लक्षकाणि, हकाराद्य-
क्षराण्याकाशार्थेषु संकेतितत्वात्तद्गुणेषु शब्दादिषु लक्षकाण्येव । तदुक्तमभियुक्तैः—
“साक्षात् संकेतितं योऽर्थमभिधत्ते स वाचकः” (का० प्र० २।७) इति । कोऽर्थः ?
शब्दादिगुणवतामाकाशादिभूतानां यानि बीजानि वाचकानि १हकारादीनि, तानि
तद्गुणानां शब्दादीनां लक्षकाणीत्यर्थः२ ॥३७॥
सोलह स्वर चन्द्र की १६ कलाओं के द्योतक हैं । हे देवि ! ये सभी स्वर१ बीजाक्षरों को
धारण करने वाले हैं, अतः इनको ‘योनि' कहा जाता है ॥
परापञ्चाशिका में भी बताया गया है— “बीज और योनि के भेद से यह मातृका
देवी दो रूपों में स्थित है”। आकाश आदि के अभिव्यंजक ये हकार आदि बीजाक्षर उन
आकाश आदि के शब्द आदि गुणों को भी लक्षित करते हैं । हकार आदि अक्षरों का
साक्षात् संकेतित (अभिधेय) अर्थ तो आकाश आदि ही हैं, किन्तु लक्षणा वृत्ति के द्वारा
ये आकाशादिगत गुणों को भी लक्षित कर देते हैं । इस विषय में अभियुक्तों की उक्ति
है—"साक्षात् संकेतित अर्थ को बताने वाला शब्द वाचक होता है”। इससे यह अभि-
प्राय निकलता है कि शब्द आदि गुणों से संपन्न आकाश आदि भूतों के वाचक जो हकार
आदि बीजाक्षर हैं, वे आकाशादिगत शब्द आदि गुणों का भी लक्षणा वृत्ति के द्वारा बोध
कराते हैं ॥३७॥
१. ‘हकारादीनि' नास्ति—ख. ने. ज. उ. । २. त्युक्तम्-ख. ।
१. सूर्य की १२, अग्नि की १० तथा सोम की १६ कलाओं की चर्चा योगिनीहृदय
(३।१००-१०१) में हुई है और दीपिकाकार ने स्वच्छन्दसंग्रह के प्रमाण से इनके नाम
दिये हैं। वहाँ चन्द्र की १६ कलाओं में १६ स्वरों का, वह्नि की १० कलाओं में यादि
क्षान्त दस वर्णों का तथा सूर्य की १२ कलाओं में ककार से ठकार पर्यन्त वर्णों का
अनुलोम क्रम से तथा भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का प्रतिलोम क्रम से विन्यास प्रदर्शित
है। अतः चिद्गगनचन्द्रिका के प्रस्तुत श्लोक में द्वादश और दश स्वर केवल संख्या
के सूचक माने जाने चाहिये । यहाँ स्वरों को योनि तथा व्यंजनों को बीज माना गया
है । कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री ने भी इसी मत का प्रतिपादन किया है । किन्तु मालिनी-
विजय (३।१०-११) में स्वरों को बीज तथा व्यंजनों को योनि बताया गया है। अभिनव-
गुप्त (तन्त्रसार,पृ० १५) इसी मत का अनुसरण करते हैं। आगे (३।१५३) दीपिकाकार
भी स्वरों को बीज ही मानते हैं।
सूर्य, वह्नि और सोम की ३८ कलाओं के समान अघोर आदि पाँच मन्त्रों की भी
३८ कलाएँ हैं। उनके नाम स्वच्छन्दतन्त्र (१।५३-५९) तथा नेत्रतन्त्र (२२।२६-३४)
में देखे जा सकते हैं।