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सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 201, कुल 485 में से

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पृष्ठ 201

द्वितीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५१
ननु कस्य कस्य भूतस्य गुणाः केषु केषु भूतेषु स्थिताः ? विद्यायाः १ कानि
कान्यक्षराणि २कस्य कस्य भूतस्य गुणान् लक्षयन्तीत्यत आह—
तस्माद्व्योमगुणः शब्दो वाय्वादीन्व्याप्य संस्थितः ।
व्योमबीजैस्तु विद्यास्थैर्लक्षयेच्छब्दपञ्चकम् ॥३६॥
तस्माद् व्योम्नः ३श्वेतरभूतेभ्यः स्थूलत्वाद् व्यापकत्वम्, तेन व्योमगुणः
शब्दो वाय्वादीन् वायुतेजःसलिलपृथिव्यात्मकान् व्याप्य स्थितः । विद्यास्थैर्व्योम-
बीजैः पञ्चभिः पञ्चभूतेषु स्थितानां शब्दानां पञ्चकं लक्षयेत्, व्योमवाचकत्वाद्
हकारपञ्चकं तद्गुणं शब्दपञ्चकं लक्षयतीत्यर्थः ॥३६॥
ननु विद्यायां षड् हकाराः ४सन्ति, अन्यस्य हकारस्य किं प्रयोजनमित्यत
आह—
तेषां कारणरूपेण स्थितं ध्वनिमयं परम् ।
किस किस भूत के गुण किन किन भूतों में रहते हैं और विद्या के कौन कौन से
अक्षर किस किस भूत के गुणों को लक्षित करते हैं, इस विषय का वर्णन अब किया जा
रहा है—
ऊपर बताये व्याप्यव्यापक भाव के कारण आकाश का गुण शब्द वायु प्रभृति
में भी रहता है । विद्या स्थित पाँच हकार इन्हीं गुणों के सूचक हैं ॥ ३६ ॥
ऊपर बताई गई पद्धति से आकाश अपने से भिन्न भूतों की अपेक्षा स्थूल है, व्यापक
है । इसलिये आकाश का गुण शब्द वायु, तेज, जल और पृथिवी को भी व्याप्त करके
स्थित है । विद्या में स्थित पाँच व्योम बीज पाँच भूतों में स्थित पाँच प्रकार के शब्दों
को लक्षित करते हैं। इसका भाव यह है कि हकार आकाश का वाचक होता है । विद्या
में पाँच हकार वर्ण हैं। पाँच वर्ण आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी में विद्यमान
शब्दों की ओर इंगित करते हैं ॥ ३६ ॥
यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्या में तो छः हकार हैं, इस बचे हुए छठे हकार का क्या
प्रयोजन है ? इसी का समाधान प्रस्तुत करते हैं—
उन पाँच शब्दों का कारणभूत तत्त्व ध्वनिमय नाद है । यह छठा हकार
इसी को लक्षित करता है ॥
१. विद्यायां-ख. ज. झ. उ. । २. 'कस्य कस्य भूतस्य गुणान्'—नास्ति-ख. ज. उ. ।
३. श्वेतेरेभ्यः-ख. ने. ज. उ. । ४. निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
माना जाता है, किन्तु यहाँ स्थूल का अर्थ व्यापक तथा सूक्ष्म का अर्थ व्याप्य करने के
कारण व्याप्य (सूक्ष्म) पृथिवी आदि की अपेक्षा से जल आदि तत्त्वों की व्यापकता
(स्थूल) के आधार पर स्थूल (व्यापक) तत्त्वों को वरीयता दी गई है ।

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