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सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 485 में से

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पृष्ठ 296

२४६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
तदन्तः सिद्धिस्यानानामन्तर्देशे "चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" १इति मन्त्रेण
तनुव्यापकत्वेन विन्यसेदित्यन्वयः२ ॥४५-४६॥
चतुरस्रमध्यरेखायां न्यस्तव्याः शक्तीराह—
तस्याः३ स्थानेषु ब्रह्माण्याद्यास्तथाऽष्टसु ।
तस्याः चतुरस्रमध्यरेखायाः । अष्टसु स्थानेषु । ब्रह्माण्याद्या ब्रह्माणीमाहे-
श्वरीकौमारीवैष्णवीवाराहीन्द्राणीचामुण्डामहालक्ष्मीः । तथा विन्यसेदित्य-
न्वयः ॥४६॥
तासां स्थानाष्टकमाह—
पादाङ्गुष्ठद्वये पार्श्वे दक्षे मूर्ध्नोऽन्यैपार्श्वके ॥४६॥
वामदक्षिणजान्वोश्च बहिरांसद्वये तथा।
स्पष्टम्५ ॥४६-४७॥
इसके अन्दर, अर्थात् दस सिद्धियों का जहाँ विन्यास किया गया, उस रेखा से बाद
की मध्य रेखा में "चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥४५-४६॥
चतुरस्र की मध्यरेखा में इन शक्तियों का न्यास करना चाहिये—
उस चतुरस्र रेखा के आठ स्थानों में ब्रह्माणी आदि आठ शक्तियों का न्यास
करना चाहिये ॥४६॥
उस चतुरस्र की मध्यरेखा के आठ स्थानों में ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी,
वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी—इस आठ शक्तियों का न्यास करना
चाहिये ॥४६॥
इनके आठ स्थानों को अब बताते हैं—
पैरों के दोनों अंगूठों में, सिर के दाहिने और बायें भाग में, वाम और दक्षिण
जानुओं (घुटनों) में तथा दोनों कन्धों के बाहरी भागों में इनका न्यास किया
जाता है ॥४६-४७॥
इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है ॥४६-४७॥
१. इत्यादि-ख. ज. झ. उ. । २. दित्यर्थः-क. ग. ने. झ. । ३. स्थानेषु विन्यस्य-
क. ग. ने. झ.। ४. मूर्धन्य-क. ग. ने. झ. । ५. स्पष्टमेतत्-ज.।