योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकभाषानुवादसहितम् २४५
“चतुरस्राद्यरेखायै नमः" इति¹ मन्त्रेण आदितो दक्षांसपृष्ठादिचूलीपृष्ठान्त-
स्थानेषु दशसु व्यापकत्वेन न्यसेत् । दक्षांसस्य पृष्ठं पश्चाद्भागः । सचूलीमूलेति ।
मूलं शिरसः पुरस्ताद्भागः । पृष्ठं शिरसः पश्चाद्भागः । स्फिग्वेव स्फिक्कम् ²ऊरु-
सन्धिः । स्पष्टमन्यत् ॥४२-४४॥
एषु स्थानेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह—
अत्रैव स्थानदशकेऽणिमाद्या दश न्यसेत् ॥४४॥
सिद्धीः
अणिमालघिमामहिमेशितावशित्वप्राकाम्यभुक्तीच्छाप्राप्तिसर्वकामाख्याः सिद्ध-
योऽणिमाद्या दश ॥४४-४५॥
चतुरस्रमध्यरेखायां व्यापकमाह—
तदन्तश्च तनुव्यापकत्वेन सुन्दरि ।
चतुरस्रमध्यरेखायै नम इत्यपि वल्लभे ॥४५॥
³विन्यसेत्
“चतुरस्राद्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से प्रथमतः दाहिने कन्धे के पृष्ठ भाग से लेकर
चूली (सिर) के पृष्ठ भाग पर्यन्त दस स्थानों में व्यापक न्यास करे । दाहिने कन्धे का
पृष्ठ पिछला भाग है। मूल का अर्थ सिर का अगला भाग और पृष्ठ पिछला हिस्सा है।
स्फिक् के लिये ही स्फिक्वक शब्द प्रयुक्त है । इसका अर्थ ऊरु सन्धि अर्थात् नितम्ब भाग
है । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥४२-४४॥
इन स्थानों में जिन शक्तियों का विन्यास करना है, अब उनको बताया जा
रहा है—
इन्हीं दस स्थानों में अणिमा आदि दस सिद्धियों का न्यास करना
चाहिये ॥४४-४५॥
अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशिता, वशिता, प्राकाम्य, भुक्ति, इच्छा, प्राप्ति और
सर्वकामा—ये दस सिद्धियाँ हैं ॥४४-४५॥
चतुरस्र की मध्यरेखा में व्यापक न्यास इस तरह से किया जाता है—
हे सुन्दरि ! वल्लभे ! इसके अन्दर की मध्यरेखा में “चतुरस्रमध्यरेखायै
नमः" इस मन्त्र से पूरे शरीर में व्यापक न्यास करे ॥४५-४६॥
१. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'ऊरुसन्धिः' नास्ति-क. ग. ने. । ३. विन्यस्य-
ख. छ. ज., तस्याः-क. ग. ।