सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 286

२३६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः
स्वरैः अकारादिविसर्गान्तैः षोडशभिः सहितम्, 'नाम्न आदौ, सूर्यं हृदयाधो
विन्यसेत्²। बिन्दुस्थाने ललाटे। अत्रैवोक्तम् - "दीपाकारोऽर्धमात्रश्च ललाटे
वृत्त इष्यते" (१।२८) इत्यादिना। सुधासूतिं चन्द्रमसम्। यादिवर्णचतुष्टयैः
यरलवै³श्चतुर्भिर्विन्यसेदित्यर्थः। भूपुत्रम् अङ्गारकम्। लोचनद्वन्द्वे कवर्गस्योपरि
स्थितमधिपतिं विन्यसेत्। हृदये वक्षसि। स्पष्टमन्यत् पायौ देवेशि विन्यसेदि-
त्यन्तम् ॥२१-२५॥
नक्षत्राणां स्थानानि न्यासं चाह-
ललाटे दक्षनेत्रे च वामे कर्णद्वये पुनः ।
पुटयोर्नासिकायाश्च कण्ठे स्कन्धद्वये पुनः ॥२६॥
पश्चात् कूर्पर४युग्मे च मणिबन्धद्वये ५तथा ।
स्त⁶नयोर्नाभिदेशे च कटिबन्धे ततः परम् ॥२७॥
ऊरुयुग्मे तथा जान्वोर्जङ्घयोश्च पदद्वये ।
ज्वलत्कालानलप्रख्या वरदाभयपाणयः ॥२८॥
अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वरों के साथ सूर्य को हृदय के नीचे विन्यस्त करे।
बिन्दुस्थान, अर्थात् ललाट में सुधासूति चन्द्रमा को य र ल व इन चार वर्णों के साथ
विन्यस्त करे। ललाट में बिन्दु का स्थान है, यह विषय यहीं (१।२८) वर्णित हो चुका
है। भूपुत्र (अंगारक) मंगल को कवर्ग के अधिपति के रूप में दोनों नेत्रों में विन्यस्त
करे। हृदय का अर्थ वक्षस्थल है। 'पायौ देवेशि विन्यसेत्' पर्यन्त अन्य पदों का
अर्थ स्पष्ट है ॥२१-२५॥¹
स्थाननिर्देश पूर्वक नक्षत्रों का न्यास बताया जा रहा है-
हे देवताओं के द्वारा पूजित देवि ! ललाट, दक्ष और वाम नेत्र, दोनों कान,
दोनों नासापुट, कण्ठ, दोनों कन्धे, दोनों कूर्पर (कोहनियाँ), दोनों मणिबन्ध
(कलाईयाँ), दोनों स्तन, नाभिदेश, दोनों कटिबन्ध, दोनों जांघे, दोनों घुटने,
दोनों पिण्डलियाँ, दोनों पैर-इन सत्ताईस स्थानों में सत्ताईस नक्षत्रों का विन्यास
१. आदौ नाम्ना-क. ख. ग.। २. विन्यस्य-ख. ने. झ. उ.। ३. 'चतुर्भिः'
नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. कूर्परयोर्युग्मे-क. उ.। ५. पुनः-क. ग., ऽपि च-ज.।
६. हस्तयोः-च. छ. ज. झ.। ७. द्वन्द्वे-च. उ.।

  1. कुछ पुस्तकों में प्रस्तुत प्रकरण में ग्रह आदि के ध्यान के श्लोक भी मिलते हैं।-
    दीपिका में इनकी व्याख्या नहीं मिलती। आगे (३।३०-३१) दीपिकाकार कहते हैं कि
    ध्यान आगमान्तर से जानना चाहिये। इससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि योगिनी-
    हृदय में ग्रह, नक्षत्र आदि का ध्यान वर्णित नहीं है।