योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३५
न्यासस्थानान्याह—
एतांस्तु विन्यसेद् देहे¹ मातृकान्या²सवत् प्रिये ।
एतान् गणेशान् । मातृका³न्यासवत् मातृकावैखरीन्यासस्थानेषु न्यसे-
दित्यर्थः ॥२१॥
ग्रहन्यासमाह—
स्वरैस्तु सहितं सूर्यं हृद्यधः प्रविन्यसेत् ॥२१॥
बिन्दुस्थाने सुधासूतिं यादिवर्णचतुष्टयैः ।
भूपुत्रं लोचनद्वन्द्वे कवर्गाधिपतिं प्रिये ॥२२॥
हृदये विन्यसेच्छुक्रं चवर्गाधिपतिं पुनः⁴ ।
हृदयोपरि विन्यस्येत् टवर्गाधिपतिं बुधम् ॥२३॥
बृहस्पतिं कण्ठदेशे तवर्गाधिपतिं प्रिये ।
नाभौ शनैश्चरं चैव⁵ पवर्गेशं सुरेश्वरि ॥२४॥
वक्त्रे शादिचतुर्वर्णैः सहितं राहुमेव च ।
क्षँकारसहितं केतुं पायौ देवेशि विन्यसेत् ॥२५॥
अब उन स्थानों का उल्लेख कर रहे हैं, जहाँ कि इनका विन्यास किया जाता है—
हे प्रिये ! अपने शरीर में मातृका न्यास की पद्धति से इनका विन्यास
करना चाहिये ॥
इन गणेशों को मातृका के वैखरी वर्णों का जहाँ जहाँ न्यास किया जाता है, उन्हीं
स्थानों में विन्यस्त करना चाहिये ॥
अब ग्रहन्यास की विधि बताते हैं—
स्वरों के साथ सूर्य को हृदय के नीचे और यकार आदि चार वर्णों के साथ
चन्द्र को बिन्दुस्थान में विन्यस्त करना चाहिये । हे प्रिये ! कवर्ग के स्वामी मङ्गल
को दोनों नेत्रों में, चवर्ग के अधिपति शुक्र को हृदय में, टवर्ग के अधिपति बुध
को हृदय के ऊपर और हे प्रिये ! तवर्ग के अधिपति बृहस्पति को कण्ठ में
विन्यस्त करना चाहिये । हे सुरेश्वरि ! पवर्ग के स्वामी शनैश्चर को नाभि में
और शकार आदि चार वर्णों के अधिपति राहु को मुँह में विन्यस्त करे । हे
देवेशि ! क्षकार के साथ केतु को पायु देश में विन्यस्त करे ॥२१-२५॥
१. देवि-ख. ने. ङ. च. छ. ज. झ. उ. । २. स्थान-ख. च. ज. झ., स्थानके
पुनः-ने. उ. । ३. स्थान-ने. ज. झ. उ. । ४. बुधः-ख. । ५. विन्यस्य-घ. ज. झ. उ. ।
६. देवि-क. ग. । ७. लक्षाभ्यां-उ. ।