योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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‘आविर्भवन्ती’ विशेषण का कोई विशेष्य नहीं मिलता । ‘मनस्क’ नामक कोई
मुद्रा भी नहीं है । अतः यह पाठ शुद्ध नहीं है । ]
अनुवाद--निश्वास का लोप, शरीर की विस्पन्दता तथा नेत्रपद्मों
का अर्धनिमीलन होने पर श्रेष्ठ मुनियों में जो अमनस्क मुद्रा का आविर्भाव
होता है, हम उसका दर्शन करते हैं ।
व्याख्या--अमनस्क भाव में स्थित व्यक्ति के स्वरूप के विषय में अमनस्क-
योग २।८१-९१ विशेषतः द्रष्टव्य है ।
‘निश्वास का लोप’ से पूर्ण श्वासक्रिया का लोप समझना चाहिये । वायु-
ग्रहण रूप निश्वास (ज्योत्स्नाटीका ४।११२) नहीं होगा तो वायु का बहिः
निःसारणरूप उच्छ्वास (या प्रश्वास) भी नहीं होगा । (निःश्वास शब्द भी
क्वचित् प्रयुक्त होता है निश्वास के लिए; निःश्वासो निःसारणम्, योगचिन्ता०
पृ० १७६) । ‘निश्वासलोपैः’ आदि शब्दों में जो तृतीया है वह ‘इत्थम्भूतलक्षणे’
(अष्टा० २।३।२१) सूत्र से है । निश्वासलोप आदि ज्ञापक हेतु हैं ।
शरीर का विशेषण ‘निभृत’ दिया गया है । निश्चल, निष्कम्प, स्थिर
अर्थों में निभृत शब्द का प्रयोग प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है (कुमारसंभव ३।४२;
शाकुन्तल १।८) । प्राणस्थैर्य से शारीरिक स्थैर्य भी होता है; मन की स्थिरता
प्राण की स्थिरता का हेतु है ।
आत्मस्थ होने पर नेत्र की अर्धनिमीलित स्थिति होती है (ह० यो० प्र०
४।४१) । प्रयत्नशून्यता(=निरायाम)-पूर्वक स्थैर्य होने पर ऐसा ही होता
है—यह ज्ञातव्य है ।
अमी यमीन्द्राः¹ सहजामनस्का²
देहे ममत्वे³ शिथिलायमाने ।
मनोऽतिगं मारुतवृत्तिशून्यं
गच्छन्ति भावं गगनावशेषम्⁴ ॥२२॥