योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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चूंकि हठ का लक्षण है—प्राणापांनयोरैक्यलक्षणः प्राणायामो हठयोगः
( ह० यो० प्र० १।१ की टीका ), इसलिये हठशास्त्र में कुम्भक की नियत सत्ता
स्वाभाविक रुप से स्वीकार्य होता है ।
प्राणायाम के भेद से कुम्भक के भेद होते हैं ( हठयोग में प्राणायाम के
सूर्यभेद आदि आठ भेद इसी दृष्टि से होते हैं ); अतः आठ प्रकार के कुम्भक हुये
(द्र० घेरण्ड० ५।१६ 'अष्ट कुम्भकाः' ) । प्रसंगतः यह ज्ञातव्य है कि देवल ने सात
प्रकार का कुम्भक माना है ( द्र० योगचिन्ता० पृ० १८ ) ।
त्रिकूटनाम्नि स्तिमितेऽन्तरङ्गे
खे स्तम्भिते केवलकुम्भकेन¹ ।
प्राणानिलो भानु-शशाङ्क नाड्यो
विहाय सद्यो वलयं प्रयाति ॥११॥
[ १. त्रिकूटनाम्नि तिमिरेऽन्तरे खे स्तम्भं गते केवलकुम्भ एव (पाठा०) ।
इसका अर्थ है—आन्तर शून्य में स्थित त्रिकूट नामक तिमिर में वायु के स्तम्भित
( कुम्भक के द्वारा ) होने पर 'केवल' कुम्भक वर्तमान रहता है । यह अर्थ
कुछ अस्पष्ट है । ]
अनुवाद--त्रिकूट नामक अन्तःस्थित शून्य देश जब केवल कुम्भक के
द्वारा स्तम्भित हो जाता है, तब प्राणवायु सूर्यनाडी ( पिङ्गला ) और
चन्द्रनाडी (इडा) को छोड़कर तत्काल ही लीन हो जाता है ।
व्याख्या--त्रिकूट नामक आन्तर शून्य देश चक्रविशेष है, लयोपयोगी नौ
चक्रों के विवरण में इसका उल्लेख मिलता है—ब्रह्मचक्र ( मूलाधार में ),
स्वाधिष्ठानचक्र, नाभिचक्र, हृच्चक्र, कण्ठ-चक्र, तालुचक्र ( घण्टिकामूल ),
भ्रूचक्र, निर्वाणचक्र ( ब्रह्मरन्ध्र में ), त्रिकूटचक्र ( यह ब्रह्मचक्र के ऊपर है;
पूर्णगिरि के पृष्ठ में ) ( द्र० योगचिन्ता० पृ० १२०-१२१; सौभाग्यलक्ष्मी-