योगतारावली (आदि शङ्कराचार्य - अमनस्क दशा, नादानुसन्धान एवं राजयोग रहस्य सटीक)
Yogataraavali of Adi Shankaracharya with Commentary
आदि शङ्कराचार्य (व्याख्याकार: डॉ. रामशङ्कर भट्टाचार्य) द्वारा
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व्याख्या--'सावधान' और 'अभ्यासशूर'--ये दो साभिप्राय विशेषण हैं ।
'अव + धा' का अर्थ होता है--अन्तर्गमन; अतः अवधान का अर्थ होगा--एक-
आलम्बन परायणता ।
'स्तम्भित अवस्था' नाश की अवस्था नहीं है--यह अच्छी तरह से ज्ञातव्य है ।
'प्रचार' का अर्थ है--भ्रमण, गमनागमन, प्रवृत्ति । यहाँ 'क्रिया' अर्थ
करना उचित है ।
केवल कुम्भक में श्वासरोध के साथ-साथ मन का भी रोध होता है--यह
ग्रन्थकार का कहना है । प्रकृत बात यह है कि श्वासरोध मनोरोध का अवश्य
सहायक होता है--यदि वह रोध वैराग्यादिपूर्वक हो; अन्यथा केवल श्वासरोध
पूर्वक मनोरोध योग की दृष्टि में विशेष लाभप्रद नहीं होता ।
सहस्रशः सन्तु हठेषु कुम्भाः
संभाव्यते केवलकुम्भ एव ।
कुम्भोत्तमे यत्र तु रेचपूरौ
प्राणस्य न प्राकृतवैकृताख्यौ ॥१०॥
अनुवाद-हठयोग के ग्रन्थों में यद्यपि सहस्र प्रकार के कुम्भकों का
उल्लेख है, तथापि 'केवल' कुम्भक की श्रेष्ठता मानी गई है । कारण यह
है कि इस श्रेष्ठ कुम्भक में प्राण ( बाह्य वायु ) के रेचक ( अपर नाम
'प्राकृत' तथा पूरक ( अपर नाम 'वैकृत' ) का अस्तित्व नहीं रहता ।
व्याख्या--'हठ' शब्द हठयोग को भी कहता है ( हठात् हठयोगात्,
ज्योत्स्ना ३।५१ । हठयोग शब्द से हठयोग-ग्रन्थ या हठयोगसंप्रदाय रूप
अर्थ लेना असंगत नहीं है । 'हठेषु' में जो बहुवचन है उसकी संगति इस दृष्टि
से हो जाती है । 'संभाव्यते' में जो 'सम् + भू' धातु है उससे गौरव या समादर
का अतिशय होना ज्ञापित होता है ।