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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

५० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति।।४३।।
पार्थ! वे ‘कामात्मानः’- कामनाओं से युक्त, ‘वेदवादरताः’- वेद के
वाक्यों में अनुरक्त, ‘स्वर्गपराः’- स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं कि इससे
आगे कुछ है ही नहीं-ऐसा कहनेवाले अविवेकीजन जन्म-मृत्युरूपी फल
देनेवाली एवं भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये बहुत-सी क्रियाओं का
विस्तार कर लेते हैं और दिखावटी शोभायुक्त वाणी में व्यक्त भी करते हैं।
अर्थात् अविवेकियों की बुद्धि अनन्त भेदोंवाली होती है। वे फलवाले वाक्य में
ही अनुरक्त रहते हैं, वेद के वाक्यों को ही प्रमाण मानते हैं, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ
मानते हैं। उनकी बुद्धि बहुत-सी भेदोंवाली है, इसलिये अनन्त क्रियाओं की
रचना कर लेते हैं। वे नाम तो परमतत्त्व परमात्मा का ही लेते हैं; किन्तु उसकी
ओट में अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। तो क्या अनन्त क्रियाएँ कर्म
नहीं हैं? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं, अनन्त क्रियाएँ कर्म नहीं हैं। तो वह एक
निश्चित क्रिया है क्या? श्रीकृष्ण अभी यह नहीं बताते। अभी तो केवल इतना
कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे
अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। वे केवल विस्तार ही नहीं करते
अपितु आलंकारिक शैली में उसे व्यक्त भी करते हैं। उसका प्रभाव क्या
होता है?-
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।४४।।
उनकी वाणी की छाप जिन-जिन के चित्त पर पड़ जाती है, अर्जुन!
उनकी भी बुद्धि नष्ट हो जाती है, न कि वे कुछ पाते हैं। उस वाणी द्वारा हरे हुए
चित्तवालों के और भोग-ऐश्वर्य में आसक्तिवाले पुरुषों के अन्तःकरण में
क्रियात्मिका बुद्धि नहीं रह जाती। इष्ट में समाधिस्थ करनेवाली निश्चयात्मक
क्रिया उनमें नहीं होती।
ऐसे अविवेकियों की वाणी सुनता कौन है? भोग और ऐश्वर्य में
आसक्तिवाले ही सुनते हैं, अधिकारी नहीं सुनता। ऐसे पुरुषों में सम और

द्वितीय अध्याय ५१
आदितत्त्व में प्रवेश दिलानेवाली निश्चयात्मक क्रिया से संयुक्त बुद्धि
नहीं होती।
प्रश्न उठता है कि 'वेदवादरताः'- जो वेद के वचनों में अनुरक्त हैं,
क्या वे भी भूल करते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५॥
अर्जुन! 'त्रैगुण्यविषया वेदाः'- वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश करते
हैं। इसके आगे का हाल वे नहीं जानते। इसलिये 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।'-
अर्जुन! तू तीनों गुणों से ऊपर उठ अर्थात् वेदों के कार्यक्षेत्र से आगे बढ़। कैसे
बढ़ा जाय? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- 'निर्द्वन्द्वः'- सुख-दुःख के द्वन्द्वों से
रहित, नित्य सत्य वस्तु में स्थित और योगक्षेम को न चाहता हुआ आत्मपरायण
हो। इस प्रकार ऊपर उठ। प्रश्न उठता है कि हम ही उठें या कोई वेदों से ऊपर
उठा भी है? श्रीकृष्ण बताते हैं कि आगे जो भी उठता है, ब्रह्म को जानता है
और जो ब्रह्म को जानता है, वह विप्र है।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६॥
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय
से जितना प्रयोजन रहता है, अच्छी प्रकार ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों
से उतना ही प्रयोजन रहता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदों से ऊपर उठता है वह
ब्रह्म को जानता है, वही ब्राह्मण है। अर्थात् तू वेदों से ऊपर उठ, ब्राह्मण बन।
अर्जुन क्षत्रिय था, श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्राह्मण बन। ब्राह्मण, क्षत्रिय
इत्यादि वर्ण स्वभाव की क्षमताओं के नाम हैं। यह कर्मप्रधान है, न कि जन्म
से निर्धारित होनेवाली कोई रूढ़ि। जिसे गंगा की धारा प्राप्त है, उसे क्षुद्र
जलाशय से क्या प्रयोजन? कोई उसमें शौच लेता है, तो कोई पशुओं को
नहला देता है। इसके आगे कोई उपयोग नहीं है। इसी प्रकार ब्रह्म को साक्षात्
जाननेवाले उस विप्र महापुरुष का, उस ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन
रह जाता है। प्रयोजन रहता अवश्य है, वेद रहते हैं; क्योंकि पीछेवालों के लिये

५२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
उनका उपयोग है। वहीं से चर्चा आरम्भ होगी। इसके उपरान्त योगेश्वर श्रीकृष्ण
कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियों का प्रतिपादन करते हैं-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।४७।।
कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। ऐसा समझ कि
फल है ही नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी
अश्रद्धा भी न हो।
अब तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने उनतालीसवें श्लोक में पहली बार कर्म
का नाम लिया; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या और उसे करें कैसे?
उस कर्म की विशेषताओं पर प्रकाश डाला कि-
(१) अर्जुन! इस कर्म द्वारा तू कर्मों के बन्धन से अच्छी प्रकार छूट
जायेगा।
(२) अर्जुन! इसमें आरम्भ का अर्थात् बीज का नाश नहीं है। आरम्भ
कर दें तो प्रकृति के पास कोई उपाय नहीं कि उसे नष्ट कर दे।
(३) अर्जुन! इसमें सीमित फलरूपी दोष भी नहीं है कि स्वर्ग या
ऋद्धियों-सिद्धियों में फँसाकर खड़ा कर दे।
(४) अर्जुन! इस कर्म का थोड़ा भी साधन जन्म-मरण के भय से
उद्धार करानेवाला होता है।
किन्तु अभी तक उन्होंने यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? किया
कैसे जाय? इसी अध्याय के इकतालीसवें श्लोक में उन्होंने बताया-
(५) अर्जुन! इसमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही है, क्रिया एक ही है।
तो क्या बहुत-सी क्रियावाले भजन नहीं करते? श्रीकृष्ण कहते हैं- वे कर्म
नहीं करते। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि अविवेकियों की बुद्धि
अनन्त शाखाओंवाली होती है, इसलिये वे अनन्त क्रियाओं का विस्तार कर
लेते हैं। वे दिखावटी शोभायुक्त वाणी में उन क्रियाओं को व्यक्त भी करते हैं।

द्वितीय अध्याय ५३
उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो
जाती है। अतः निश्चयात्मक क्रिया एक ही है; लेकिन यह नहीं बताया कि वह
क्रिया कौन-सी है?
सैंतालीसवें श्लोक में उन्होंने कहा- अर्जुन ! कर्म करने में ही तेरा
अधिकार है, फल में कभी नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म
करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो अर्थात् निरन्तर करने के लिये उसी में लीन
होकर करें; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? प्रायः इस श्लोक का
उद्धरण देकर लोग कहते हैं कि कुछ भी करो, केवल फल की कामना मत
करो, हो गया निष्काम कर्मयोग। किन्तु अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया ही नहीं
कि वह कर्म है कौन-सा, जिसे करें? यहाँ पर केवल कर्म की विशेषताओं पर
प्रकाश डाला कि कर्म देता क्या है और कर्म करते समय बरती जानेवाली
सावधानियाँ क्या हैं? प्रश्न ज्यों-का-त्यों बना हुआ है, जिसे योगेश्वर आगे
अध्याय तीन-चार में स्पष्ट करेंगे।
पुनः इसी पर बल देते हैं-
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।४८।।
धनंजय ! आसक्ति और संगदोष को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में
समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर। कौन-सा कर्म? निष्काम
कर्म कर। 'समत्वं योग उच्यते'- यह समत्व भाव ही योग कहलाता है।
विषमता जिसमें न हो, ऐसा भाव समत्व कहलाता है। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ
विषम बनाती हैं, आसक्ति हमें विषम बनाती है, फल की इच्छा विषमता पैदा
करती है, इसीलिये फल की वासना न हो; फिर भी कर्म करने में अश्रद्धा न
हो। देखी-सुनी सभी वस्तुओं में आसक्ति का त्याग करके, प्राप्ति और अप्राप्ति
के विषय में न सोचकर केवल योग में स्थित रहते हुए कर्म कर। योग से चित्त
चलायमान न हो।
योग एक पराकाष्ठा की स्थिति है और एक प्रारम्भ की स्थिति भी होती
है। प्रारम्भ में भी हमारी दृष्टि लक्ष्य पर ही रहनी चाहिये। अतः योग पर दृष्टि

५४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
रखते हुए कर्म का आचरण करना चाहिये। समत्व भाव अर्थात् सिद्धि और
असिद्धि में समभाव ही योग कहलाता है। जिसको सिद्धि और असिद्धि विचलित
नहीं कर पातीं, विषमता जिसमें पैदा नहीं होती, ऐसा भाव होने के कारण यह
समत्व योग कहलाता है। यह इष्ट से समत्व दिलाता है, इसलिये इसे समत्व
योग कहते हैं। कामनाओं का सर्वथा त्याग है, इसलिये इसे निष्काम कर्मयोग
कहते हैं। कर्म करना है, इसलिये इसे कर्मयोग कहते हैं। परमात्मा से मेल
कराता है, इसलिये इसका नाम योग अर्थात् मेल है। इसमें बौद्धिक स्तर पर
ध्यान रखना पड़ता है कि सिद्धि और असिद्धि में समभाव रहे, आसक्ति न हो,
फल की वासना न आने पाये इसलिये यही निष्काम कर्मयोग बुद्धियोग भी
कहा जाता है।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥४९॥
धनंजय! 'अवरं कर्म'- निकृष्ट कर्म, वासनावाले कर्म बुद्धियोग से
अत्यन्त दूर हैं। फल की कामनावाले कृपण हैं। वे आत्मा के साथ उदारता नहीं
बरतते, अतः समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर। जैसी कामना है वैसा
मिल भी जाये तो उसे भोगने के लिये शरीर धारण करना पड़ेगा। आवागमन
बना है तो कल्याण कैसा? साधक को तो मोक्ष की भी वासना नहीं रखनी
चाहिये; क्योंकि वासनाओं से मुक्त होना ही तो मोक्ष है। फल की प्राप्ति का
चिन्तन करने से साधक का समय व्यर्थ नष्ट हो जाता है और फल प्राप्त होने
पर वह उसी फल में उलझ जाता है। उसकी साधना समाप्त हो जाती है। आगे
वह भजन क्यों करे? वहाँ से वह भटक जाता है। इसलिये समत्व बुद्धि से योग
का आचरण करें।
ज्ञानमार्ग को भी श्रीकृष्ण ने बुद्धियोग कहा था कि अर्जुन! यह बुद्धि तेरे
लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयी और यहाँ निष्काम कर्मयोग को भी
बुद्धियोग कहा गया। वस्तुतः दोनों में बुद्धि का, दृष्टिकोण का ही अन्तर है।
उसमें लाभ-हानि का रिकार्ड रखकर उसे जाँच कर चलना पड़ता है, इसमें
बौद्धिक स्तर पर समत्व बनाये रखना पड़ता है इसलिये इसे समत्व बुद्धियोग

द्वितीय अध्याय ५५
भी कहा जाता है। इसलिये धनंजय ! तू समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर;
क्योंकि फल की वासनावाले अत्यन्त कृपण हैं।
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५०॥
समत्व बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य-पाप दोनों को ही इसी लोक में त्याग देता
है, उनसे लिपायमान नहीं होता। इसलिये समत्व बुद्धियोग के लिये चेष्टा कर।
‘योगः कर्मसु कौशलम्’- समत्व बुद्धि के साथ कर्मों का आचरण-कौशल
ही योग है।
संसार में कर्म करने के दो दृष्टिकोण प्रचलित हैं। लोग कर्म करते हैं तो
उसका फल भी अवश्य चाहते हैं या फल न मिले तो कर्म करना ही नहीं
चाहते; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण इन कर्मों को बन्धनकारी बताते हुए ‘आराधना’
को एकमात्र कर्म मानते हैं। इस अध्याय में उन्होंने कर्म का नाम मात्र लिया।
अध्याय ३ के ९वें श्लोक में उसकी परिभाषा दी और चौथे अध्याय में कर्म के
स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण ने सांसारिक
परम्परा से हटकर कर्म करने की कला बतायी कि कर्म तो करो, श्रद्धापूर्वक
करो; किन्तु फल के अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दो। फल जायेगा कहाँ?
यही कर्मों के करने का कौशल है। निष्काम साधक की समग्र शक्ति इस प्रकार
कर्म में लगी रहती है। आराधना के लिये ही तो शरीर है। फिर भी जिज्ञासा
स्वाभाविक है कि क्या सदैव कर्म ही करते रहना है या इसका कुछ परिणाम
भी निकलेगा? इसे देखें-
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१॥
बुद्धियोग से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होनेवाले फल को त्यागकर
जन्म और मृत्यु के बन्धन से छूट जाते हैं। वे निर्दोष अमृतमय परमपद को
प्राप्त होते हैं।
यहाँ तीन बुद्धियों का चित्रण है। (श्लोक ३९) सांख्य बुद्धि में दो फल
हैं- स्वर्ग और श्रेय। (श्लोक ५१) कर्मयोग में प्रवृत्त बुद्धि का एक ही फल है

५६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जन्म-मृत्यु से मुक्ति, निर्मल अविनाशी पद की प्राप्ति। बस ये दो ही योगक्रिया
हैं। इसके अतिरिक्त बुद्धि अविवेकजन्य है, अनन्त शाखाओंवाली है, जिसका
फल कर्मभोग के लिये बारम्बार जन्म-मृत्यु है।
अर्जुन की दृष्टि त्रिलोकी के साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामीपन तक
ही सीमित थी। इतने तक के लिये भी वह युद्ध में प्रवृत्त नहीं हो रहा था। यहाँ
श्रीकृष्ण उसे नवीन तथ्य उद्घाटित करते हैं कि आसक्तिरहित कर्म द्वारा
अनामय पद प्राप्त होता है। निष्काम कर्मयोग परमपद को दिलाता है, जहाँ
मृत्यु का प्रवेश नहीं है। इस कर्म में प्रवृत्ति कब होगी?-
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।
जिस काल में तेरी (प्रत्येक साधक की) बुद्धि मोहरूपी दलदल को
पूर्णतः पार कर लेगी, लेशमात्र भी मोह न रह जाय- न पुत्र में, न धन में, न
प्रतिष्ठा में- इन सबसे लगाव टूट जायेगा, उस समय जो सुनने योग्य है उसे तू
सुन सकेगा और सुने हुए के अनुसार वैराग्य को प्राप्त हो सकेगा अर्थात् उसे
आचरण में ढाल सकेगा। अभी तो जो सुनने लायक है, उसे न तो तू सुन पाया
है और आचरण का तो प्रश्न ही नहीं खड़ा होता। इसी योग्यता पर पुनः प्रकाश
डालते हैं-
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।५३।।
अनेक प्रकार के वेदवाक्यों को सुनकर विचलित हुई तेरी बुद्धि जब
परमात्मस्वरूप में समाधिस्थ होकर अचल-स्थिर ठहर जायेगी, तब तू समत्व
योग को प्राप्त होगा। पूर्ण सम स्थिति को प्राप्त करेगा, जिसे 'अनामय परमपद'
कहते हैं। यही योग की पराकाष्ठा है और यही अप्राप्य की प्राप्ति है। वेदों से तो
शिक्षा ही मिलती है; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं, 'श्रुतिविप्रतिपन्ना'- श्रुतियों के
अनेक सिद्धान्तों को सुनने से बुद्धि विचलित हो जाती है। सिद्धान्त तो अनेकों
सुने, लेकिन जो सुनने योग्य है लोग उससे दूर ही रहते हैं।

द्वितीय अध्याय ५७
यह विचलित बुद्धि जिस समय समाधि में स्थिर हो जायेगी, तब तू योग
की पराकाष्ठा अमृत पद को प्राप्त करेगा। इस पर अर्जुन की उत्कण्ठा स्वाभाविक
है कि वे महापुरुष कैसे होते हैं जो अनामय परमपद में स्थित हैं, समाधि में
जिनकी बुद्धि स्थिर है? उसने प्रश्न किया-
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।५४।।
'समाधीयते चित्तं यस्मिन् स आत्मा एव समाधिः'- जिसमें चित्त
का समाधान किया जाय, वह आत्मा ही समाधि है। अनादि तत्त्व में जो समत्व
प्राप्त कर ले, उसे समाधिस्थ कहते हैं। अर्जुन ने पूछा- केशव ! समाधिस्थ
स्थिरबुद्धिवाले महापुरुष के क्या लक्षण हैं? स्थितप्रज्ञ पुरुष कैसे बोलता है?
वह कैसे बैठता है? वह कैसे चलता है? चार प्रश्न अर्जुन ने किये। इस पर
भगवान श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हुए कहा-
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।५५।।
पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग देता है, तब
वह आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट हुआ स्थिरबुद्धिवाला कहा जाता है। कामनाओं
के त्याग पर ही आत्मा का दिग्दर्शन होता है। ऐसा आत्माराम, आत्मतृप्त
महापुरुष ही स्थितप्रज्ञ है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।५६।।
दैहिक, दैविक तथा भौतिक दुःखों में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता,
सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा दूर हो गयी है तथा जिसके राग, भय और
क्रोध नष्ट हो गये हैं, मननशीलता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ मुनि
स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। उसके अन्य लक्षण बताते हैं-

५८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।५७।।
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ शुभ अथवा अशुभ को प्राप्त होकर न
तो प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। शुभ वह है जो
परमात्मस्वरूप में लगाता है, अशुभ वह है जो प्रकृति की ओर ले जानेवाला
होता है। स्थितप्रज्ञ पुरुष अनुकूल परिस्थितियों से न प्रसन्न होता है और न
प्रतिकूल परिस्थितियों से द्वेष करता है; क्योंकि प्राप्त होने योग्य वस्तु न उससे
भिन्न है और न पतित करनेवाले विकार ही उसके लिये हैं अर्थात् अब साधन
से उसका अपना कोई प्रयोजन नहीं रहा।
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।५८।।
जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, ठीक वैसे ही यह
पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर
होती है। खतरे को देखते ही कछुआ जिस प्रकार अपने सिर और पैर समेट
लेता है, ठीक इसी प्रकार जो पुरुष विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब ओर
से समेटकर हृदय-देश में निरोध कर लेता है, उस काल में उस पुरुष की बुद्धि
स्थिर होती है। किन्तु यह तो एक दृष्टान्त मात्र है। खतरे का अहसास मिटते ही
कछुआ तो अपने अंगों को पुनः फैला देता है, क्या इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ
महापुरुष भी विषयों में रस लेने लगता है? इस पर कहते हैं-
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।५९।।
इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण करनेवाले पुरुषों के विषय तो निवृत्त
हो जाते हैं क्योंकि वे ग्रहण ही नहीं करते; किन्तु उनका राग निवृत्त नहीं होता,
आसक्ति लगी रहती है। सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों से समेटनेवाले निष्कामकमी
का राग भी 'परं दृष्ट्वा'- परमतत्त्व परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो
जाता है।

द्वितीय अध्याय ५९
महापुरुष कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों में नहीं फैलाता।
एक बार जब इन्द्रियाँ सिमट गयीं तो संस्कार ही मिट जाते हैं, पुनः वे नहीं
निकलते। निष्काम कर्मयोग के आचरण द्वारा परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के
साथ उस पुरुष का विषयों से राग भी निवृत्त हो जाता है। प्रायः चिन्तन-पथ में
हठ करते हैं। हठ से इन्द्रियों को रोककर वे विषय से तो निवृत्त हो जाते हैं
किन्तु मन में उनका चिन्तन, राग लगा रहता है। यह आसक्ति ‘परं दृष्ट्वा’-
परमात्मा का साक्षात्कार करने के बाद ही निवृत्त होती है, इसके पूर्व नहीं।
‘पूज्य महाराज जी’ इस सम्बन्ध में अपनी एक घटना बताया करते थे।
गृहत्याग से पूर्व उन्हें तीन बार आकाशवाणी हुई थी। हमने पूछा- “महाराज
जी ! आपको आकाशवाणी क्यों हुई, हम लोगों को तो नहीं हुई?” तब इस पर
महाराज जी ने कहा- ‘हो ! ई शंका मोहूं के भई रही।’ अर्थात् यह सन्देह मुझे
भी हुआ था। तब अनुभव में आया कि मैं सात जन्म से लगातार साधु हूँ। चार
जन्म तो केवल साधुओं-सा वेश बनाये, तिलक लगाये, कहीं विभूति पोते,
कहीं कमण्डल लिये विचरण कर रहा हूँ। योगक्रिया की जानकारी नहीं थी।
लेकिन पिछले तीन जन्म से बढ़िया साधु हूँ, जैसा होना चाहिये। मुझमें
योगक्रिया जागृत थी। पिछले जन्म में पार लग चला था, निवृत्ति हो चली थी;
किन्तु दो इच्छाएँ रह गयी थीं- एक स्त्री और दूसरी गाँजा। अन्तर्मन में इच्छाएँ
थीं, किन्तु बाहर से हमने शरीर को दृढ़ रखा। मन में वासना लगी थी इसलिये
जन्म लेना पड़ा। जन्म लेते ही भगवान ने थोड़े ही समय में सब दिखा-सुनाकर
निवृत्ति दिला दी, दो-तीन चटकना दिया और साधु बना दिया।
ठीक यही बात श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों द्वारा विषयों को न ग्रहण
करनेवाले पुरुष के भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं; किन्तु साधना द्वारा
परमपुरुष परमात्मा का साक्षात्कार कर लेने पर वह विषयों के राग से भी
निवृत्त हो जाता है। अतः जब तक साक्षात्कार न हो, कर्म करना है।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
( रामचरितमानस, ५/४८/६ )
इन्द्रियों को विषयों से समेटना कठिन है। इस पर प्रकाश डालते हैं-

६० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
यततो ह्यापि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।६०।।
कौन्तेय! प्रयत्न करनेवाले मेधावी पुरुष की प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके
मन को बलात् हर लेती हैं, विचलित कर देती हैं। इसलिये-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।।
उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयत करके योग से युक्त और समर्पण के
साथ मेरे आश्रित हो; क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की
बुद्धि स्थिर होती है। यहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण साधन के निषेधात्मक अवयवों के
साथ उसके विधेयात्मक पहलू पर जोर देते हैं। केवल संयम और निषेध से
इन्द्रियाँ वश में नहीं होतीं, समर्पण के साथ इष्ट-चिन्तन अनिवार्य है। इष्ट-
चिन्तन के अभाव में विषय-चिन्तन होगा, जिसके कुपरिणाम श्रीकृष्ण के ही
शब्दों में देखें-
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।६२।।
विषयों का चिन्तन करनेवाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती
है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है। कामना-पूर्ति में व्यवधान आने से क्रोध
उत्पन्न होता है। क्रोध किसे जन्म देता है?-
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।६३।।
क्रोध से विशेष मूढ़ता अर्थात् अविवेक उत्पन्न होता है। नित्य-अनित्य
वस्तु का विचार नहीं रह जाता। अविवेक से स्मरण-शक्ति भ्रमित हो जाती है
(जैसा अर्जुन को हुआ था- ‘भ्रमतीव च मे मनः।’ (१/३०) गीता के
समापन पर उसने कहा- ‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।’ (१८/७३) क्या करें,
क्या न करें?- इसका निर्णय नहीं हो पाता।), स्मृति भ्रमित होने से योग-

द्वितीय अध्याय ६१
परायण बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धिनाश होने से यह पुरुष अपने श्रेय-
साधन से च्युत हो जाता है।
यहाँ श्रीकृष्ण ने बल दिया है कि विषयों का चिन्तन नहीं करना चाहिये।
साधक को नाम, रूप, लीला और धाम में ही कहीं लगे रहना चाहिये। भजन
में ढील देने पर मन विषयों में जायेगा। विषयों के चिन्तन से आसक्ति हो जाती
है। आसक्ति से उस विषय की कामना साधक के अन्तर्मन में होने लगती है।
कामना की पूर्ति में व्यवधान होने पर क्रोध, क्रोध से अविवेक, अविवेक से
स्मृति-भ्रम और स्मृति-भ्रम से बुद्धि नष्ट हो जाती है। निष्काम कर्मयोग को
बुद्धियोग कहा जाता है; क्योंकि बुद्धि-स्तर पर इसमें विचार रखना चाहिये
कि कामनाएँ न आने पाएँ, फल है ही नहीं। कामना आने से यह बुद्धियोग नष्ट
हो जाता है। 'साधन करिय बिचारहीन मन सुद्ध होय नहिं तैसे।'
(विनयपत्रिका, पद संख्या ११५/३) विचार आवश्यक है। विचारशून्य
पुरुष श्रेय-साधन से नीचे गिर जाता है। साधन-क्रम टूट जाता है, सर्वथा नष्ट
नहीं होता। भोग के पश्चात् साधन वहीं से पुनः आरम्भ होता है, जहाँ अवरुद्ध
हुआ था।
यह तो विषयाभिमुख साधक की गति है। स्वाधीन अन्तःकरणवाला
साधक किस गति को प्राप्त होता है? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।६४।।
आत्मा की विधि को प्राप्त प्रत्यक्षदर्शी महापुरुष राग-द्वेष से रहित वश
में की हुई अपनी इन्द्रियों द्वारा 'विषयान् चरन्'- विषयों में विचरता हुआ भी
'प्रसादमधिगच्छति'- अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त होता है। वह अपनी
भावदृष्टि में रहता है। महापुरुष के लिये विधि-निषेध नहीं रह जाते। उसके
लिये कहीं अशुभ नहीं रहता, जिससे वह बचाव करे तथा उसके लिये कोई
शुभ शेष नहीं रह जाता, जिसकी वह कामना करे।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।६५।।

६२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
भगवान् के पूर्ण कृपा-प्रसाद 'भगवत्ता' से संयुक्त होने पर उसके सम्पूर्ण
दुःखों का अभाव हो जाता है, 'दुःखालयम् अशाश्वतम्' ।( गीता, ८/१५ )
संसार का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही
अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है। किन्तु जो योगयुक्त नहीं है, उसकी दशा पर
प्रकाश डालते हैं-
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ।।६६।।
योगसाधनरहित पुरुष के अन्तःकरण में निष्काम कर्मयुक्त बुद्धि नहीं
होती। उस अयुक्त के अन्तःकरण में भाव भी नहीं होता। भावनारहित पुरुष को
शान्ति कहाँ और अशान्त पुरुष को सुख कहाँ? योगक्रिया करने से कुछ
दिखायी पड़ने पर ही भाव बनता है- 'जानें बिनु न होइ परतीती।'
( रामचरितमानस, ७/८८ ख/७ ) भावना बिना शान्ति नहीं मिलती और
शान्तिरहित पुरुष को सुख अर्थात् शाश्वत, सनातन की प्राप्ति नहीं होती।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।६७।।
जल में नाव को जिस प्रकार वायु हरण करके गन्तव्य से दूर कर देती
है, ठीक वैसे ही विषयों में विचरण करती हुई इन्द्रियों में जिस इन्द्रिय के साथ
मन रहता है, वह एक ही इन्द्रिय उस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है।
अतः योग का आचरण अनिवार्य है। क्रियात्मक आचरण पर श्रीकृष्ण पुनः
बल देते हैं-
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।६८।।
इससे हे महाबाहो ! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सर्वथा
वश में की हुई होती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर होती है। 'बाहु' कार्यक्षेत्र का प्रतीक
है। भगवान 'महाबाहु' एवं 'आजानुबाहु' कहे जाते हैं। वे बिना हाथ-पैर के
सर्वत्र कार्य करते हैं। उनमें जो प्रवेश पाता है या जो उसी भगवत्ता की ओर

द्वितीय अध्याय ६३
अग्रसर है वह भी महाबाहु है। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों को महाबाहु कहा
गया है।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९॥
सम्पूर्ण भूतप्राणियों के लिये वह परमात्मा रात्रि के तुल्य है; क्योंकि
दिखायी नहीं देता, न विचार ही काम करता है इसलिये रात्रि सदृश है। उस
रात्रि में परमात्मा में संयमी पुरुष भली प्रकार देखता है, चलता है, जागता है;
क्योंकि वहाँ उसकी पकड़ है। योगी इन्द्रियों के संयम द्वारा उसमें प्रवेश पा
जाता है। जिन नाशवान् सांसारिक सुख-भोग के लिये सम्पूर्ण प्राणी रात-दिन
परिश्रम करते हैं, योगी के लिये वही निशा है।
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥
(रामचरितमानस, २/३२३/८)
जो योगी परमार्थ पथ में निरन्तर सजग और भौतिक एषणाओं से
सर्वथा निःस्पृह होता है, वही उस इष्ट में प्रवेश पाता है। वह रहता तो संसार में
ही है; किन्तु संसार का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता। महापुरुष की इस रहनी का
चित्रण देखें-
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥७०॥
जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठावाले समुद्र में नदियों के जल
उसको चलायमान न करते हुए बड़े वेग से उसमें समा जाते हैं, ठीक वैसे ही
परमात्मा में स्थित स्थितप्रज्ञ पुरुष में सम्पूर्ण भोग विकार उत्पन्न किये बिना
समा जाते हैं। ऐसा पुरुष परमशान्ति को प्राप्त होता है, न कि भोगों को चाहनेवाला।
भयंकर वेग से बहनेवाली सहस्रों नदियों के स्रोत फसल को नष्ट करते
हुए, हत्याएँ करते हुए, नगरों को डुबोते हुए, हाहाकार मचाते हुए बड़े वेग से

६४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
समुद्र में गिरते हैं; किन्तु समुद्र को न एक इंच ऊपर उठा पाते हैं और न गिरा
ही पाते हैं, बल्कि उसी में समाहित हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ
महापुरुष के प्रति सम्पूर्ण भोग उतने ही वेग से आते हैं, किन्तु समाहित हो जाते
हैं। उन महापुरुषों में न शुभ संस्कार डाल पाते हैं, न अशुभ। योगी के कर्म
'अशुक्ल' और 'अकृष्ण' होते हैं। क्योंकि जिस चित्त पर संस्कार पड़ते हैं,
उसका निरोध और विलीनीकरण हो गया। इसके साथ ही भगवत्ता की स्थिति
आ गयी। अब संस्कार पड़े भी तो कहाँ? इस एक ही श्लोक में श्रीकृष्ण ने
अर्जुन के कई प्रश्नों का समाधान कर दिया। उसकी जिज्ञासा थी कि स्थितप्रज्ञ
महापुरुष के लक्षण क्या हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता
है? श्रीकृष्ण ने एक ही शब्द में उत्तर दिया कि वे समुद्रवत् होते हैं। उनके लिये
विधि-निषेध नहीं होता कि ऐसे बैठो और ऐसे चलो। वे ही परमशान्ति को
प्राप्त होते हैं; क्योंकि वे संयमी हैं। भोगों की कामनावाला शान्ति नहीं पाता।
इसी पर पुनः बल देते हैं-
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।।७१।।
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर 'निर्ममः'- मैं और मेरे के
भाव तथा अहंकार और स्पृहा से रहित हुआ बरतता है, वह उस परमशान्ति को
प्राप्त होता है जिसके बाद कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।७२।।
पार्थ! उपर्युक्त स्थिति ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है। समुद्रवत्
उन महापुरुष में विषय नदियों की तरह समा जाते हैं। वे पूर्ण संयमी और
प्रत्यक्षतः परमात्मदर्शी हैं। केवल 'अहं ब्रह्मास्मि' पढ़ लेने या रट लेने से यह
स्थिति नहीं मिलती। साधन करके ही इस ब्रह्म की स्थिति को पाया जाता है।
ऐसा महापुरुष ब्रह्मनिष्ठा में स्थित रहते हुए शरीर के अन्तकाल में भी ब्रह्मानन्द
को ही प्राप्त होता है।

द्वितीय अध्याय ६५
निष्कर्ष-
प्रायः कुछ लोग कहते हैं कि दूसरे अध्याय में गीता पूर्ण हो गयी; किन्तु
यदि केवल कर्म का नाम मात्र लेने से कर्म पूरा हो जाता हो, तब तो गीता का
समापन माना जा सकता है। इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यही बताया
कि- अर्जुन! निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिसे जानकर तू संसार-
बन्धन से छूट जायेगा। कर्म करने में तेरा अधिकार है, फल में कभी नहीं। कर्म
करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो। निरन्तर करने के लिये तत्पर हो जा। इसके
परिणाम में तू 'परं दृष्ट्वा' (२/५९)- परमपुरुष का दर्शन कर स्थितप्रज्ञ
बनेगा, परमशान्ति पायेगा। किन्तु यह नहीं बताया कि 'कर्म' है क्या?
यह 'सांख्ययोग' नामक अध्याय नहीं है। यह नाम शास्त्रकार का नहीं,
अपितु टीकाकारों की देन है। वे अपनी बुद्धि के अनुसार ही ग्रहण करते हैं तो
आश्चर्य क्या है?
इस अध्याय में कर्म की गरिमा, उसे करने में बरती जानेवाली सावधानी
और स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मन में कर्म के प्रति
उत्कण्ठा जागृत की है, उसे कुछ प्रश्न दिये हैं। आत्मा शाश्वत है, सनातन है,
उसे जानकर तत्त्वदर्शी बनो। उसकी प्राप्ति के दो साधन हैं-ज्ञानयोग और
निष्काम कर्मयोग।
अपनी शक्ति को समझकर, हानि-लाभ का स्वयं निर्णय लेकर कर्म में
प्रवृत्त होना ज्ञानमार्ग है तथा इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ उसी कर्म में
प्रवृत्त होना निष्काम कर्ममार्ग या भक्तिमार्ग है। गोस्वामी तुलसीदास ने दोनों
का चित्रण इस प्रकार किया है-
मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
(रामचरितमानस, ३/४२/८-९)
मेरे दो प्रकार के भजनेवाले हैं- एक ज्ञानमार्गी, दूसरा भक्तिमार्गी।
निष्काम कर्ममार्गी या भक्तिमार्गी शरणागत होकर मेरा आश्रय लेकर चलता

६६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
है। ज्ञानयोगी अपनी शक्ति सामने रखकर, अपने हानि-लाभ का विचार कर
अपने भरोसे चलता है, जबकि दोनों के शत्रु एक ही हैं। ज्ञानमार्गी को काम,
क्रोधादि शत्रुओं पर विजय पाना है और निष्काम कर्मयोगी को भी इन्हीं से युद्ध
करना है। कामनाओं का त्याग दोनों करते हैं और दोनों मार्गों में किया जानेवाला
कर्म भी एक ही है। “इस कर्म के परिणाम में परमशान्ति को प्राप्त हो जाओगे।”-
लेकिन यह नहीं बताया कि कर्म है क्या? अब आपके भी समक्ष ‘कर्म’ एक
प्रश्न है। अर्जुन के मन में भी कर्म के प्रति जिज्ञासा हुई। तीसरे अध्याय के
आरम्भ में ही उसने कर्मविषयक प्रश्न प्रस्तुत किया। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘कर्मजिज्ञासा’ नाम द्वितीयोऽध्यायः।।२।।
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में ‘कर्म-जिज्ञासा’ नामक दूसरा
अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः ‘यथार्थगीता’ भाष्ये ‘कर्मजिज्ञासा’ नाम
द्वितीयोऽध्यायः।।२।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्द जी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के भाष्य ‘यथार्थ गीता’ में ‘कर्म-जिज्ञासा’ नामक दूसरा
अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।

तृतीयोऽध्यायः शत्रुविनाश-प्रेरणा

।। ॐ श्री परमात्मने नमः ।।
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
अध्याय दो में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यह बुद्धि तेरे लिये
ज्ञानमार्ग के विषय में कही गयी। कौन-सी बुद्धि? यही कि युद्ध कर। जीतोगे
तो महामहिम की स्थिति प्राप्त कर लोगे और हारोगे तो देवत्व है। जीत में
सर्वस्व है और हार में भी देवत्व है, कुछ मिलता ही है। अतः इस दृष्टि से लाभ
और हानि दोनों में कुछ-न-कुछ मिलता ही है, किञ्चित् भी क्षति नहीं है। फिर
कहा- अब इसी को तू निष्काम कर्मयोग के विषय में सुन, जिस बुद्धि से युक्त
होकर तू कर्मों के बन्धन से अच्छी प्रकार छूट जायेगा। फिर उसकी विशेषताओं
पर प्रकाश डाला। कर्म करते समय आवश्यक सावधानियों पर बल दिया कि
फल की वासनावाला न हो, कामनाओं से रहित होकर कर्म में प्रवृत्त हो और
कर्म करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो, जिससे तू कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा।
मुक्त तो होगा; किन्तु रास्ते में अपनी स्थिति नहीं दिखायी पड़ी।
अतः अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानमार्ग सरल और
प्राप्तिवाला प्रतीत हुआ। उसने प्रश्न किया- जनार्दन ! निष्काम कर्म की अपेक्षा
ज्ञानमार्ग आपकी दृष्टि में श्रेष्ठ है तो मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? प्रश्न
स्वाभाविक था। मान लें, एक ही स्थान पर जाने के दो रास्ते हैं। यदि आपको
वास्तव में जाना है तो आप अवश्य प्रश्न करेंगे कि इनमें सुगम कौन है? यदि
नहीं करते तो आप पथिक नहीं। ठीक इसी प्रकार अर्जुन ने भी प्रश्न रखा-
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

६८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जनों पर दया करनेवाले जनार्दन! यदि निष्काम कर्मयोग की अपेक्षा
ज्ञानयोग आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो हे केशव! आप मुझे भयंकर कर्मयोग में
क्यों लगाते हैं?
निष्काम कर्मयोग में अर्जुन को भयंकरता दिखायी पड़ी; क्योंकि इसमें
कर्म करने में ही अधिकार है, फल में कभी नहीं। कर्म करने में अश्रद्धा भी न
हो और निरन्तर समर्पण के साथ योग पर दृष्टि रखते हुए कर्म में लगा रह।
जबकि ज्ञानमार्ग में हारोगे तो देवत्व है, जीतने पर महामहिम स्थिति है। अपनी
लाभ-हानि स्वयं देखते हुए आगे बढ़ना है। इस प्रकार अर्जुन को निष्काम
कर्मयोग की अपेक्षा ज्ञानमार्ग सरल प्रतीत हुआ। इसलिये उसने निवेदन किया-
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥२॥
आप इन मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि मोहित-सी करते हैं। आप
तो मेरी बुद्धि का मोह दूर करने में प्रवृत्त हुए हैं। अतः इनमें से एक निश्चय
करके कहिये, जिससे मैं 'श्रेय'- परमकल्याण मोक्ष को प्राप्त हो जाऊँ। इस
पर श्रीकृष्ण ने कहा-
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥३॥
निष्पाप अर्जुन! इस संसार में सत्य-शोध की दो धाराएँ मेरे द्वारा पहले
कही गयी हैं। पहले का तात्पर्य कभी सत्ययुग या त्रेता में नहीं, बल्कि अभी
जिसे दूसरे अध्याय में कह आये हैं। ज्ञानियों के लिये ज्ञानमार्ग और योगियों के
लिये निष्काम कर्ममार्ग बताया गया। दोनों ही मार्गों के अनुसार कर्म तो करना
ही पड़ेगा। कर्म अनिवार्य है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥४॥

तृतीय अध्याय ६९
अर्जुन! मनुष्य न तो कर्मों को न आरम्भ करने से निष्कर्मता की
अन्तिम स्थिति को प्राप्त होता है और न आरम्भ की हुई क्रिया को त्यागने मात्र
से भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को ही प्राप्त होता है। अब तुझे ज्ञानमार्ग अच्छा
लगे या निष्काम कर्ममार्ग, दोनों में कर्म तो करना ही पड़ेगा।
प्रायः इस स्थल पर लोग भगवत्पथ में संक्षिप्त मार्ग और बचाव ढूँढ़ने
लगते हैं। “कर्म आरम्भ ही न करें, हो गये निष्कर्मी”- कहीं ऐसी भ्रान्ति न रह
जाय, इसलिये श्रीकृष्ण बल देते हैं कि कर्मों को न आरम्भ करने से कोई
निष्कर्म-भाव को नहीं प्राप्त होता। शुभाशुभ कर्मों का जहाँ अन्त है, परम
निष्कर्मता की उस स्थिति को कर्म करके ही पाया जा सकता है। इसी प्रकार
बहुत से लोग कहते हैं, “हम तो ज्ञानमार्गी हैं, ज्ञानमार्ग में कर्म है ही नहीं।”-
ऐसा मानकर कर्मों को त्यागनेवाले ज्ञानी नहीं होते। आरम्भ की हुई क्रिया को
त्यागने मात्र से कोई भगवत्साक्षात्काररूपी परमसिद्धि को प्राप्त नहीं होता है;
क्योंकि-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५॥
कोई भी पुरुष किसी भी काल में क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं
रहता; क्योंकि सभी पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों द्वारा विवश होकर कर्म
करते हैं। प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जब तक जीवित हैं, तब तक कोई
भी पुरुष कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता।
अध्याय चार के तैंतीसवें और सैंतीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि
यावन्मात्र कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को
भस्म कर देती है। यहाँ वे कहते हैं कि कर्म किये बिना कोई रहता ही नहीं।
अन्ततः वे महापुरुष कहते क्या हैं? उनका आशय है कि यज्ञ करते-करते
तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर मन के विलय और साक्षात्कार के साथ यज्ञ
का परिणाम निकल आने पर कर्म शेष हो जाते हैं। उस निर्धारित क्रिया की
पूर्णता से पहले कर्म मिटते नहीं, प्रकृति पिण्ड नहीं छोड़ती।