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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

द्वितीय अध्याय ५१
आदितत्त्व में प्रवेश दिलानेवाली निश्चयात्मक क्रिया से संयुक्त बुद्धि
नहीं होती।
प्रश्न उठता है कि 'वेदवादरताः'- जो वेद के वचनों में अनुरक्त हैं,
क्या वे भी भूल करते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥४५॥
अर्जुन! 'त्रैगुण्यविषया वेदाः'- वेद तीनों गुणों तक ही प्रकाश करते
हैं। इसके आगे का हाल वे नहीं जानते। इसलिये 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।'-
अर्जुन! तू तीनों गुणों से ऊपर उठ अर्थात् वेदों के कार्यक्षेत्र से आगे बढ़। कैसे
बढ़ा जाय? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- 'निर्द्वन्द्वः'- सुख-दुःख के द्वन्द्वों से
रहित, नित्य सत्य वस्तु में स्थित और योगक्षेम को न चाहता हुआ आत्मपरायण
हो। इस प्रकार ऊपर उठ। प्रश्न उठता है कि हम ही उठें या कोई वेदों से ऊपर
उठा भी है? श्रीकृष्ण बताते हैं कि आगे जो भी उठता है, ब्रह्म को जानता है
और जो ब्रह्म को जानता है, वह विप्र है।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥४६॥
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय
से जितना प्रयोजन रहता है, अच्छी प्रकार ब्रह्म को जाननेवाले ब्राह्मण का वेदों
से उतना ही प्रयोजन रहता है। तात्पर्य यह है कि जो वेदों से ऊपर उठता है वह
ब्रह्म को जानता है, वही ब्राह्मण है। अर्थात् तू वेदों से ऊपर उठ, ब्राह्मण बन।
अर्जुन क्षत्रिय था, श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्राह्मण बन। ब्राह्मण, क्षत्रिय
इत्यादि वर्ण स्वभाव की क्षमताओं के नाम हैं। यह कर्मप्रधान है, न कि जन्म
से निर्धारित होनेवाली कोई रूढ़ि। जिसे गंगा की धारा प्राप्त है, उसे क्षुद्र
जलाशय से क्या प्रयोजन? कोई उसमें शौच लेता है, तो कोई पशुओं को
नहला देता है। इसके आगे कोई उपयोग नहीं है। इसी प्रकार ब्रह्म को साक्षात्
जाननेवाले उस विप्र महापुरुष का, उस ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन
रह जाता है। प्रयोजन रहता अवश्य है, वेद रहते हैं; क्योंकि पीछेवालों के लिये