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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

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पृष्ठ 88

द्वितीय अध्याय ५३
उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, उनकी भी बुद्धि नष्ट हो
जाती है। अतः निश्चयात्मक क्रिया एक ही है; लेकिन यह नहीं बताया कि वह
क्रिया कौन-सी है?
सैंतालीसवें श्लोक में उन्होंने कहा- अर्जुन ! कर्म करने में ही तेरा
अधिकार है, फल में कभी नहीं। फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म
करने में तेरी अश्रद्धा भी न हो अर्थात् निरन्तर करने के लिये उसी में लीन
होकर करें; किन्तु यह नहीं बताया कि वह कर्म है क्या? प्रायः इस श्लोक का
उद्धरण देकर लोग कहते हैं कि कुछ भी करो, केवल फल की कामना मत
करो, हो गया निष्काम कर्मयोग। किन्तु अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया ही नहीं
कि वह कर्म है कौन-सा, जिसे करें? यहाँ पर केवल कर्म की विशेषताओं पर
प्रकाश डाला कि कर्म देता क्या है और कर्म करते समय बरती जानेवाली
सावधानियाँ क्या हैं? प्रश्न ज्यों-का-त्यों बना हुआ है, जिसे योगेश्वर आगे
अध्याय तीन-चार में स्पष्ट करेंगे।
पुनः इसी पर बल देते हैं-
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।४८।।
धनंजय ! आसक्ति और संगदोष को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में
समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म कर। कौन-सा कर्म? निष्काम
कर्म कर। 'समत्वं योग उच्यते'- यह समत्व भाव ही योग कहलाता है।
विषमता जिसमें न हो, ऐसा भाव समत्व कहलाता है। ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ
विषम बनाती हैं, आसक्ति हमें विषम बनाती है, फल की इच्छा विषमता पैदा
करती है, इसीलिये फल की वासना न हो; फिर भी कर्म करने में अश्रद्धा न
हो। देखी-सुनी सभी वस्तुओं में आसक्ति का त्याग करके, प्राप्ति और अप्राप्ति
के विषय में न सोचकर केवल योग में स्थित रहते हुए कर्म कर। योग से चित्त
चलायमान न हो।
योग एक पराकाष्ठा की स्थिति है और एक प्रारम्भ की स्थिति भी होती
है। प्रारम्भ में भी हमारी दृष्टि लक्ष्य पर ही रहनी चाहिये। अतः योग पर दृष्टि