यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
सप्तदश अध्याय ३२१
को दुम्बा, चीनियों को मेढक, तो दूसरी ओर ध्रुव-जैसे ठंडे प्रदेशों में मांस
बिना गुजारा नहीं है। रूस और मंगोलिया के आदिवासी खाद्य में घोड़े इस्तेमाल
करते हैं, यूरोपवासी गाय तथा सुअर दोनों खाते हैं; फिर भी विद्या, बुद्धि-
विकास तथा उन्नति में अमेरिका और यूरोपवासी प्रथम श्रेणी में गिने जा रहे हैं।
गीता के अनुसार रसयुक्त, चिकना और स्थिर रहनेवाला भोज्य पदार्थ
सात्त्विक है। लम्बी आयु, अनुकूल, बल-बुद्धि बढ़ानेवाला, आरोग्यवर्द्धक
पदार्थ सात्त्विक है। स्वभाव से हृदय को प्रिय लगनेवाला भोज्य पदार्थ सात्त्विक
है। अतः कहीं किसी खाद्य पदार्थ को घटाना-बढ़ाना नहीं है। परिस्थिति,
परिवेश तथा देशकाल के अनुसार जो भोज्य वस्तु स्वभाव से प्रिय लगे और
जीवनी शक्ति प्रदान करे, वही सात्त्विकी है। वस्तु सात्त्विकी, राजसी या तामसी
नहीं होती, उसका प्रयोग सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी होता है।
इसी अनुकूलन के लिये जो व्यक्ति घर-परिवार त्यागकर केवल ईश्वर-
आराधन में लिप्त हैं, संन्यास आश्रम में हैं, उनके लिये मांस-मदिरा त्याज्य है;
क्योंकि अनुभव से देखा गया है कि ये पदार्थ आध्यात्मिक मार्ग के विपरीत
मनोभाव उत्पन्न करते हैं, अतः इनसे साधन-पथ से भ्रष्ट होने की अधिक
सम्भावना है। जो एकान्त-देश का सेवन करनेवाले विरक्त हैं, उनके लिये
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अध्याय छः में आहार के लिये एक नियम दिया कि
'युक्ताहार विहारस्य' इसी को ध्यान में रखकर आचरण करना चाहिये। जो
भजन में सहायक है उतना (वही) आहार ग्रहण करना चाहिये।
कट्वम्ललवणात्युष्णातीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥
कड़वे, खट्टे, अधिक नमकीन, अत्यन्त गर्म, तीखे, रूखे, दाहकारक
और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करनेवाले आहार राजस पुरुष को प्रिय
होते हैं।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥
३२२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
जो भोजन देर का बना हुआ है, 'गतरसं'– रसरहित, दुर्गन्धयुक्त,
बासी, उच्छिष्ट (जूठा) और अपवित्र भी है, वह तामस पुरुष को प्रिय होता है।
प्रश्न पूरा हुआ। अब प्रस्तुत है 'यज्ञ'–
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥
जो यज्ञ 'विधिदृष्टः'– शास्त्रविधि से निर्धारित किया गया है (जैसा
पीछे अध्याय ३ में यज्ञ का नाम लिया, अध्याय ४ में यज्ञ का स्वरूप बताया
कि बहुत से योगी प्राण को अपान में, अपान को प्राण में हवन करते हैं। प्राण–
अपान की गति निरोध कर प्राणों की गति स्थिर कर लेते हैं, संयमाग्नि में हवन
करते हैं। इस प्रकार यज्ञ के चौदह सोपान बताये, जो सब-के-सब ब्रह्म तक
की दूरी तय करा देनेवाली एक ही क्रिया की ऊँची–नीची अवस्थाएँ हैं। संक्षेप
में यज्ञ चिन्तन की प्रक्रिया का चित्रण है, जिसका परिणाम सनातन ब्रह्म में
प्रवेश है। जिसका विधान इस शास्त्र में किया गया है।) उसी शास्त्र-विधान पर
पुनः बल देते हैं कि अर्जुन ! शास्त्रविधि से नियत किये हुए, जिसे करना ही
कर्त्तव्य है तथा जो मन का निरोध करनेवाला है, जो फल को न चाहनेवाले
पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥
हे अर्जुन ! जो यज्ञ केवल दम्भाचरण के लिये ही हो या फल को उद्देश्य
बनाकर किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जान। यह कर्त्ता यज्ञ की विधि जानता
है; किन्तु दम्भाचरण या फल को उद्देश्य बनाकर करता है कि अमुक वस्तु
मिलेगी तथा लोग देखें कि यज्ञ करता है– प्रशंसा करेंगे, ऐसा यज्ञकर्त्ता वस्तुतः
राजसी है। अब तामस यज्ञ का स्वरूप बताते हैं–
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥
जो यज्ञ शास्त्रविधि से रहित है, जो अन्न (परमात्मा) की सृष्टि कर
सप्तदश अध्याय ३२३
सकने में असमर्थ है, मन के अन्तराल में निरुद्ध करने की क्षमता से रहित है,
दक्षिणा अर्थात् सर्वस्व के समर्पण से रहित है तथा जो श्रद्धारहित है, ऐसा यज्ञ
तामस यज्ञ कहा जाता है। ऐसा पुरुष वास्तविक यज्ञ को जानता ही नहीं। अब
प्रस्तुत है तप-
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते।।१४।।
परमदेव परमात्मा, द्वैत पर जय प्राप्त करनेवाले द्विज, सद्गुरु और
ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य तथा अहिंसा शरीर-सम्बन्धी
तप कहा जाता है। शरीर सदैव वासनाओं की ओर बहकता है, इसे अन्तःकरण
की उपर्युक्त वृत्तियों के अनुरूप तपाना शारीरिक तप है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।।
उद्वेग न पैदा करनेवाला, प्रिय, हितकारक और सत्य भाषण तथा परमात्मा
में प्रवेश दिलानेवाले शास्त्रों के चिन्तन का अभ्यास, नाम-जप- यह वाणी-
सम्बन्धी तप कहा जाता है। वाणी विषयोन्मुख विचारों को भी व्यक्त करती
रहती है, इसे उस ओर से समेटकर परमसत्य परमात्मा की दिशा में लगाना
वाणी-सम्बन्धी तप है। अब मन-सम्बन्धी तप देखें-
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।।
मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन अर्थात् इष्ट के अतिरिक्त अन्य विषयों
का स्मरण भी न हो, मन का निरोध, अन्तःकरण की सर्वथा पवित्रता- यह
मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है। उपर्युक्त तीनों शरीर, वाणी और मन का तप
मिलाकर एक सात्त्विक तप है।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते।।१७।।
३२४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
फल को न चाहते हुए अर्थात् निष्काम कर्म से युक्त पुरुषों द्वारा परम
श्रद्धा से किये हुए उपर्युक्त तीनों तपों को मिलाकर सात्त्विक तप कहते हैं। अब
प्रस्तुत है राजस तप-
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये अथवा केवल पाखण्ड से ही
किया जाता है, वह अनिश्चित एवं चंचल फलवाला तप राजस कहा गया है।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥
जो तप मूर्खतापूर्वक हठ से; मन, वाणी और शरीर के पीडासहित
अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये बदले की भावना से किया जाता है, वह
तप तामस कहा गया है।
इस प्रकार सात्त्विक तप में शरीर, मन और वाणी को मात्र इष्ट के
अनुरूप ढालना है। राजस तप में तप की क्रिया वही है; किन्तु दम्भमान
सम्मान की इच्छा से तपते हैं। प्रायः महात्मा लोग घर-बार छोड़ने के बाद भी
इस विकार के शिकार हो जाते हैं और तीसरा तामस तप अविधिपूर्वक होता है,
दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के दृष्टिकोण से होता है। अब प्रस्तुत है दान-
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥
दान देना ही कर्त्तव्य है- इस भाव से जो दान देश (स्थान), काल
(समयानुकूल) और सत्यपात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार की भावना
से रहित होकर दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥
जो दान क्लेशपूर्वक (जो देते नहीं बनता लेकिन देना पड़ रहा है) तथा
प्रत्युपकार की भावना से कि यह करूँगा तो यह मिलेगा अथवा फल को
सप्तदश अध्याय ३२५
उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।
जो दान बिना सत्कार किये अथवा तिरस्कारपूर्वक झिड़ककर अयोग्य
देश-काल में अनधिकारियों को दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।
'पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- "हो, कुपात्र को दान देने से दाता नष्ट हो
जाता है।" ठीक इसी प्रकार श्रीकृष्ण का कहना है कि दान देना ही कर्त्तव्य है।
देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर बदले में उपकार न चाहने की भावना
से उदारता के साथ दिया जानेवाला दान सात्त्विक है। कठिनाई से निकलनेवाला,
बदले में फल की भावना से दिया जानेवाला दान राजस है और बिना सत्कार
के, झिड़कियों के साथ प्रतिकूल देश-काल में कुपात्र को दिया जानेवाला दान
तामस है, लेकिन है दान ही; किन्तु जो देह, गेह इत्यादि सबके ममत्व को
त्यागकर एकमात्र इष्ट पर ही निर्भर है, उसके लिये दान का विधान इससे और
उन्नत है- वह है सर्वस्व का समर्पण, सम्पूर्ण वासनाओं से हटकर मन का
समर्पण; जैसा कि श्रीकृष्ण ने कहा है- 'मय्येव मन आधत्स्व।' अतः दान
नितान्त आवश्यक है। अब प्रस्तुत है ॐ, तत् और सत् का स्वरूप-
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।२३।।
अर्जुन! ॐ, तत् और सत्- ऐसा तीन प्रकार का नाम 'ब्रह्मणः निर्देशः
स्मृतः'- ब्रह्म का निर्देश करता है, स्मृति दिलाता है, संकेत करता है और ब्रह्म
का परिचायक है। उसी से 'पुरा'- पूर्व में (आरम्भ में) ब्राह्मण, वेद और
यज्ञादि रचे गये हैं। अर्थात् ब्राह्मण, यज्ञ और वेद ओम् से पैदा होते हैं। ये
योगजन्य हैं। ओम् के सतत चिन्तन से ही इनकी उत्पत्ति है, और कोई तरीका
नहीं है।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्।।२४।।
३२६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इसलिये ब्रह्म का कथन करनेवाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत की
हुई यज्ञ, दान और तप-क्रियाएँ निरन्तर ‘ओम्’ इस नाम का उच्चारण करके
ही की जाती हैं, जिससे उस ब्रह्म का स्मरण हो जाय। अब तत् शब्द का प्रयोग
बताते हैं-
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।२५।।
‘तत्’ अर्थात् वह (परमात्मा) ही सर्वत्र है, इस भाव से फल को न
चाहकर शास्त्र द्वारा निर्दिष्ट नाना प्रकार की यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ परम
कल्याण की इच्छा करनेवाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं। तत् शब्द परमात्मा के
प्रति समर्पणसूचक है। अर्थात् जप तो ओम् का करें तथा यज्ञ, दान और तप
की क्रियाएँ उस पर निर्भर होकर करें। अब सत् के प्रयोग का स्थल बताते हैं-
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।२६।।
और सत्; योगेश्वर ने बताया कि सत् है क्या? गीता के आरम्भ में ही
अर्जुन ने प्रश्न खड़ा किया कि कुलधर्म ही शाश्वत है, सत्य है, तो श्रीकृष्ण ने
कहा- अर्जुन! तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पन्न हुआ? सत् वस्तु का तीनों कालों
में कभी अभाव नहीं होता, उसे मिटाया नहीं जा सकता और असत् वस्तु का
तीनों कालों में अस्तित्व नहीं है, उसे रोका नहीं जा सकता। वस्तुतः वह कौन-
सी वस्तु है, जिसका तीनों कालों में अभाव नहीं है? और वह असत् वस्तु है
क्या, जिसका अस्तित्व नहीं है? तो बताया- यह आत्मा ही सत्य है और
भूतादिकों के समस्त शरीर नाशवान् हैं। आत्मा सनातन है, अव्यक्त है, शाश्वत
और अमृतस्वरूप है- यही परमसत्य है।
यहाँ कहते हैं, ‘सत्’ ऐसे परमात्मा का यह नाम ‘सद्भावे’- सत्य के
प्रति भाव में और साधुभाव में प्रयोग किया जाता है और हे पार्थ! जब नियत
कर्म सांगोपांग भली प्रकार होने लगे, तब सत् शब्द का प्रयोग किया जाता है।
सत् का अर्थ यह नहीं है कि यह वस्तुएँ हमारी हैं। जब शरीर ही हमारा नहीं है,
सप्तदश अध्याय ३२७
तो इसके उपभोग में आनेवाली वस्तुएँ हमारी कब हैं। यह सत् नहीं है। सत् का
प्रयोग केवल एक दिशा में किया जाता है- सद्भाव में। आत्मा ही परम सत्य
है- इस सत्य के प्रति भाव हो, उसे साधने के लिये साधुभाव हो और उसकी
प्राप्ति करानेवाला कर्म प्रशस्त ढंग से होने लगे, वहीं सत् शब्द का प्रयोग
किया जाता है। इसी पर योगेश्वर अग्रेतर कहते हैं-
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।२७।।
यज्ञ, तप और दान को करने में जो स्थिति मिलती है, वह भी सत् है-
ऐसा कहा जाता है। 'तदर्थीयम्'- उस परमात्मा की प्राप्ति के लिये किया
हुआ कर्म ही सत् है, ऐसा कहा जाता है। अर्थात् उस परमात्मा की प्राप्तिवाला
कर्म ही सत् है। यज्ञ, दान, तप तो इस कर्म के पूरक हैं। अन्त में निर्णय देते हुए
कहते हैं कि इन सबके लिये श्रद्धा आवश्यक है।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।
हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तपा हुआ
तप और जो कुछ भी किया हुआ कर्म है, वह सब असत् है- ऐसा कहा जाता
है। वह न तो इस लोक में और न परलोक में ही लाभदायक है। अतः समर्पण
के साथ श्रद्धा नितान्त आवश्यक है।
निष्कर्ष-
अध्याय के आरम्भ में ही अर्जुन ने प्रश्न किया कि- भगवन्! जो
शास्त्रविधि को त्यागकर और श्रद्धा से युक्त होकर यजन करते हैं (लोग भूत,
भवानी अन्यान्य पूजते ही रहते हैं) तो उनकी श्रद्धा कैसी है? सात्त्विकी है,
राजसी है अथवा तामसी? इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! यह
पुरुष श्रद्धा का स्वरूप (पुतला) है, कहीं-न-कहीं उनकी श्रद्धा होगी ही।
जैसी श्रद्धा वैसा पुरुष, जैसी वृत्ति वैसा पुरुष। उनकी वह श्रद्धा सात्त्विकी,
३२८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
राजसी और तामसी तीन प्रकार की होती है। सात्त्विकी श्रद्धावाले देवताओं
को, राजसी श्रद्धावाले यक्ष (जो यश, शौर्य प्रदान करे), राक्षसों (जो सुरक्षा दे
सके) का पीछा करते हैं और तामसी श्रद्धावाले भूत-प्रेतों को पूजते हैं।
शास्त्रविधि से रहित इन पूजाओं द्वारा ये तीनों प्रकार के श्रद्धालु शरीर में स्थित
भूतसमुदाय अर्थात् अपने संकल्पों और हृदय-देश में स्थित मुझ अन्तर्यामी
को भी कृश करते हैं, न कि पूजते हैं। उन सबको निश्चय ही तू असुर जान
अर्थात् भूत, प्रेत, यक्ष, राक्षस तथा देवताओं को पूजनेवाले असुर हैं।
देवता-प्रसंग को श्रीकृष्ण ने यहाँ तीसरी बार उठाया है। पहले अध्याय
सात में उन्होंने कहा कि- अर्जुन ! कामनाओं ने जिनका ज्ञान हर लिया है, वही
मूढ़बुद्धि अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। दूसरी बार अध्याय नौ में उसी प्रश्न
को दुहराते हुए कहा- जो अन्यान्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी मुझे ही
पूजते हैं; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् शास्त्र में निर्धारित विधि
से भिन्न है, अतः वह नष्ट हो जाता है। यहाँ अध्याय सत्रह में उन्हें आसुरी
स्वभाववाला कहकर सम्बोधित किया। श्रीकृष्ण के शब्दों में एक परमात्मा की
ही पूजा का विधान है।
तदनन्तर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने चार प्रश्न लिये- आहार, यज्ञ, तप और
दान। आहार तीन प्रकार के होते हैं। सात्त्विक पुरुष को तो आरोग्य प्रदान
करनेवाले, स्वाभाविक प्रिय लगनेवाले, स्निग्ध आहार प्रिय होते हैं। राजस
पुरुष को कड़वे, तीक्ष्ण, उष्ण, चटपटे, मसालेदार, रोगवर्द्धक आहार प्रिय होते
हैं। तामस पुरुष को जूठा, बासी और अपवित्र आहार प्रिय होता है।
शास्त्रविधि से निर्दिष्ट यज्ञ (जो आराधना की अन्तःक्रियाएँ हैं) जो मन
का निरोध करता है, फलाकांक्षा से रहित वह यज्ञ सात्त्विक है। दम्भ-प्रदर्शन
तथा फल के लिये किया जानेवाला वही यज्ञ राजस है और शास्त्रविधि से
रहित, मन्त्र, दान तथा बगैर श्रद्धा से किया हुआ यज्ञ तामस है।
परमदेव परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली सारी योग्यताएँ जिनमें हैं, उन
प्राज्ञ सद्गुरु की अर्चना, सेवा और अन्तःकरण से अहिंसा, ब्रह्मचर्य और
सप्तदश अध्याय ३२९
पवित्रता के अनुरूप शरीर को तपाना शरीर का तप है। सत्य, प्रिय और
हितकर बोलना वाणी का तप है और मन को कर्म में प्रवृत्त रखना, इष्ट के
अतिरिक्त विषयों के चिन्तन में मन को मौन रखना मन-सम्बन्धी तप है। मन,
वाणी और शरीर तीनों मिलाकर इस ओर तपाना सात्त्विक तप है। राजस तप
में कामनाओं के साथ उसी को किया जाता है, जबकि तामस तप शास्त्रविधि
से रहित स्वेच्छाचार है।
कर्त्तव्य मानकर देश, काल और पात्र का विचार करके श्रद्धापूर्वक
दिया गया दान सात्त्विक है। किसी लाभ के लोभ में कठिनाई से दिया जानेवाला
दान राजस है और झिड़ककर कुपात्र को दिया जानेवाला दान तामस है।
ॐ, तत् और सत् का स्वरूप बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि
ये नाम परमात्मा की स्मृति दिलाते हैं। शास्त्रविधि से निर्धारित तप, दान और
यज्ञ आरम्भ करने में ओम् का प्रयोग होता है और पूर्ति में ही ओम् पिण्ड
छोड़ता है। तत् का अर्थ है वह परमात्मा, उसके प्रति समर्पित होकर ही वह
कर्म होता है और जब कर्म धारावाही होने लगे, तब सत् का प्रयोग होता है।
भजन ही सत् है। सत् के प्रति भाव और साधुभाव में ही सत् का प्रयोग किया
जाता हैं। परमात्मा की प्राप्ति करा देनेवाले कर्म यज्ञ, दान और तप के परिणाम
में भी सत् का प्रयोग है और परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाला कर्म निश्चयपूर्वक
सत् है; किन्तु इन सबके साथ श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धा से रहित होकर किया
हुआ कर्म, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप न इस जन्म में लाभकारी है, न
अगले जन्मों में ही। अतः श्रद्धा अपरिहार्य है।
सम्पूर्ण अध्याय में श्रद्धा पर प्रकाश डाला गया और अन्त में ॐ, तत्
और सत् की विशद व्याख्या प्रस्तुत की गयी, जो गीता के श्लोकों में पहली
बार आया है। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘ॐ तत्सत् श्रद्धात्रयविभागयोगो’ नाम
सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।
३३० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र
विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में 'ॐ तत्सत् श्रद्धात्रय विभाग योग'
नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते
श्रीमद्भगवद्गीतायाः 'यथार्थगीता' भाष्ये 'ॐ तत्सत्
श्रद्धात्रयविभागयोगो' नाम सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।
इस प्रकार श्रीमत् परमहंस परमानन्दजी के शिष्य स्वामी अड़गड़ानन्दकृत
'श्रीमद्भगवद्गीता' के भाष्य 'यथार्थ गीता' में 'ॐ तत्सत् श्रद्धात्रय विभाग योग'
नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।
।। हरिः ॐ तत्सत् ।।
अष्टादशोऽध्यायः संन्यास योग
॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥
॥ अथाष्टादशोऽध्यायः ॥
यह गीता का अन्तिम अध्याय है, जिसके पूर्वार्द्ध में योगेश्वर श्रीकृष्ण
द्वारा प्रस्तुत अनेक प्रश्नों का समाधान है तथा उत्तरार्द्ध गीता का उपसंहार है कि
गीता से लाभ क्या है? सत्रहवें अध्याय में आहार, तप, यज्ञ, दान तथा श्रद्धा
का विभागसहित स्वरूप बताया गया, उसी सन्दर्भ में त्याग के प्रकार शेष हैं।
मनुष्य जो कुछ करता है, उसमें कारण कौन है? कौन कराता है? भगवान
कराते हैं या प्रकृति? यह प्रश्न पहले से आरम्भ है, जिस पर इस अध्याय में
पुनः प्रकाश डाला गया। इसी प्रकार वर्ण-व्यवस्था की चर्चा हो चुकी है। सृष्टि
में व्याप्त उसके स्वरूप का विश्लेषण इस अध्याय में प्रस्तुत है। अन्त में गीता
से मिलनेवाली विभूतियों पर प्रकाश डाला गया है।
गत अध्याय में अनेक प्रकरणों का विभाजन सुनकर अर्जुन ने स्वयं
एक प्रश्न रखा कि त्याग और संन्यास को भी विभागसहित बतायें-
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१॥
अर्जुन बोला- हे महाबाहो! हे हृदय के सर्वस्व! हे केशिनिषूदन! मैं
संन्यास और त्याग के यथार्थ स्वरूप को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।
पूर्ण त्याग संन्यास है, जहाँ संकल्प और संस्कारों का भी समापन है
और इससे पहले साधना की पूर्ति के लिये उत्तरोत्तर आसक्ति का त्याग ही
त्याग है। यहाँ दो प्रश्न हैं कि संन्यास के तत्त्व को जानना चाहता हूँ और दूसरा
है कि त्याग के तत्त्व को जानना चाहता हूँ। इस पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा-
३३२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२॥
अर्जुन! कितने ही पण्डितजन काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास कहते
हैं और कितने ही विचार-कुशल पुरुष सम्पूर्ण कर्मफलों के त्याग को त्याग
कहते हैं।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३॥
कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त हैं, अतः त्याग
देने योग्य हैं और दूसरे विद्वान् ऐसा कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप त्यागने
योग्य नहीं हैं। इस प्रकार अनेक मत प्रस्तुत करके योगेश्वर अपना भी निश्चित
मत देते हैं-
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४॥
हे अर्जुन! उस त्याग के विषय में तू मेरे निश्चय को सुन। हे पुरुषश्रेष्ठ!
वह त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥
यज्ञ, दान और तप- ये तीन प्रकार के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, इन्हें
तो करना ही चाहिये; क्योंकि यज्ञ, दान और तप तीनों ही पुरुषों को पवित्र
करने वाले हैं।
श्रीकृष्ण ने चार प्रचलित मतों का उल्लेख किया। पहला- काम्य कर्मों
का त्याग, दूसरा- सम्पूर्ण कर्मफलों का त्याग, तीसरा- दोषयुक्त होने के
कारण सभी कर्मों का त्याग और चौथा मत- यज्ञ, दान और तप त्यागने योग्य
नहीं हैं। उनमें से एक मत में अपनी सहमति प्रकट करते हुए कहा- अर्जुन!
मेरा भी यह निश्चित किया हुआ मत है कि यज्ञ, दान और तपरूप क्रिया
अष्टादश अध्याय ३३३
त्यागने योग्य नहीं है। इससे सिद्ध है कि कृष्णकाल में भी कई मत प्रचलित थे,
जिनमें एक यथार्थ था। उस काल में भी कई मत थे, आज भी हैं। महापुरुष
जब दुनिया में आता है तो कई मत-मतान्तरों में से कल्याणकारी मत को
निकालकर सामने खड़ा कर देता है। प्रत्येक महापुरुष ने यही किया है,
श्रीकृष्ण ने भी यही किया। उन्होंने कोई नया मार्ग नहीं बताया, बल्कि प्रचलित
कई मतों के बीच सत्य को समर्थन देकर उसे स्पष्ट कर दिया।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६॥
योगेश्वर श्रीकृष्ण बल देकर कहते हैं- पार्थ! यज्ञ, दान और तपरूप
कर्म आसक्ति और फल को त्यागकर अवश्य करना चाहिये। यह मेरा निश्चय
किया हुआ उत्तम मत है। अब अर्जुन के प्रश्न के अनुसार वे त्याग का
विश्लेषण करते हैं-
नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥
हे अर्जुन! नियत कर्म (श्रीकृष्ण के शब्दों में नियत कर्म एक ही है, यज्ञ
की प्रक्रिया। इस नियत शब्द को आठ-दस बार योगेश्वर ने कहा। इस पर
बार-बार बल दिया कि कहीं साधक भटककर दूसरा न करने लगे), इस
शास्त्रविधि से निर्धारित कर्म का त्याग करना उचित नहीं है। मोह से उसका
त्याग करना तामस त्याग कहा गया है। सांसारिक विषय-वस्तुओं की आसक्ति
में फँसकर कार्यम् कर्म (कार्यम् कर्म, नियत कर्म एक दूसरे के पूरक हैं) का
त्याग तामसी है। ऐसा पुरुष ‘अधः गच्छति’- कीट-पतंगपर्यन्त अधम योनियों
में जाता है; क्योंकि उसने भजन की प्रवृत्तियों का त्याग कर दिया। अब राजस
त्याग के विषय में बताते हैं-
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥
कर्म को दुःखमय समझकर शारीरिक क्लेश के भय से उसका त्याग
करनेवाला व्यक्ति राजस त्याग को करके भी त्याग के फल को प्राप्त नहीं
३३४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
होता। जिससे भजन पार न लगे और 'कायक्लेशभयात्'– इस भय से कर्म
को त्याग दे कि शरीर को कष्ट होगा, उस मनुष्य का त्याग राजस है। उसे त्याग
का फल परमशान्ति नहीं प्राप्त होती। तथा-
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।।
हे अर्जुन! करना कर्तव्य है- ऐसा समझकर जो 'नियतम्'– शास्त्र-
विधि से निर्धारित किया हुआ कर्म संगदोष और फल को त्यागकर किया जाता
है, वही सात्त्विक त्याग है। अतः नियत कर्म करें और इसके सिवाय जो कुछ
है, उसका त्याग कर दें। यह नियत कर्म भी क्या करते ही रहेंगे या कभी इसका
भी त्याग होगा? इस पर कहते हैं (अब अन्तिम त्याग का रूप देखें)-
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ।।१०।।
हे अर्जुन! जो पुरुष 'अकुशलं कर्म' अर्थात् अकल्याणकारी कर्म से
(शास्त्र नियत कर्म ही कल्याणकारी है। इसके विरोध में जो कुछ है, इसी लोक
का बन्धन है इसलिये अकल्याणकारी है, ऐसे कर्मों से) द्वेष नहीं करता और
कल्याणकारी कर्म में आसक्त नहीं होता, जो करना था वह भी शेष नहीं है-
ऐसा सत्त्व से संयुक्त पुरुष संशयरहित, ज्ञानवान् और त्यागी है। उसने सब
कुछ त्यागा है, लेकिन प्राप्ति के साथ वह पूर्ण त्याग ही संन्यास है। हो सकता
है और कोई सरल रास्ता हो? इस पर कहते हैं-नहीं। देखें-
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ।।११।।
देहधारी पुरुषों के द्वारा (केवल शरीर ही नहीं, जिसे आप देखते हैं।
श्रीकृष्ण के अनुसार प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रज, तम तीनों गुण ही इस
जीवात्मा को शरीरों में बाँधते हैं। जब तक गुण जीवित हैं तब तक वह
जीवधारी है। किसी-न-किसी रूप में शरीर परिवर्तित होता रहेगा। अतः देह
के कारण जब तक जीवित है।) सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग संभव नहीं
है, इसलिये जो पुरुष कर्म के फल का त्यागी है, वही त्यागी है- ऐसा कहा
अष्टादश अध्याय ३३५
जाता है। अतः जब तक शरीर के कारण जीवित हैं, तब तक नियत कर्म करें
और उसके फल का त्याग करें। बदले में किसी फल की कामना न करें। वैसे
सकामी पुरुषों के कर्मों का फल भी होता है-
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्।।१२।।
सकामी पुरुषों के कर्मों का अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसा तीन
प्रकार का फल मरने का पश्चात् भी होता है, जन्म-जन्मान्तरों तक मिलता है;
किन्तु 'सन्न्यासिनाम्'- सर्वस्व का न्यास (अन्त) करनेवाले पूर्ण त्यागी
पुरुषों के कर्मों का फल किसी भी काल में नहीं होता। यही शुद्ध संन्यास है।
संन्यास चरमोत्कृष्ट अवस्था है। भले-बुरे कर्मों का फल तथा पूर्ण न्यासकाल
में उनके अन्त का प्रश्न पूरा हुआ। अब पुरुष के द्वारा शुभ अथवा अशुभ कर्म
होने में क्या कारण हैं? इस पर देखें-
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये पाँच कारण सांख्य-
सिद्धान्त में कहे गये हैं, उन्हें तू मुझसे भली प्रकार जान।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।
इस विषय में कर्त्ता (यह मन), पृथक्-पृथक् करण (जिनके द्वारा
किया जाता है। यदि शुभ पार लगता है तो विवेक, वैराग्य, शम, दम, त्याग,
अनवरत चिन्तन की प्रवृत्तियाँ इत्यादि करण होंगी। यदि अशुभ पार लगता है
तो काम, क्रोध, राग, द्वेष, लिप्सा इत्यादि करण होंगे। इनके द्वारा प्रेरित होंगे।),
नाना प्रकार की न्यारी-न्यारी चेष्टाएँ (अनन्त इच्छाएँ), आधार अर्थात् साधन
(जिस इच्छा के साथ साधन मिला वही इच्छा पूरी होने लगती है।) और
पाँचवाँ हेतु है दैव अथवा संस्कार। इसकी पुष्टि करते हैं-
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।
३३६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्र के अनुसार अथवा विपरीत जो कुछ
कर्म आरम्भ करता है, उसके ये पाँचों ही कारण हैं। परन्तु ऐसा होने पर भी-
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६॥
जो पुरुष अशुद्ध बुद्धि के कारण उस विषय में कैवल्यस्वरूप आत्मा
को कर्त्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि यथार्थ नहीं देखता अर्थात् भगवान् नहीं करते।
इस प्रश्न पर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दूसरी बार बल दिया। अध्याय ५ में
उन्होंने कहा कि वह प्रभु न करता है, न कराता है, न क्रिया के संयोग को
जोड़ता है। तो लोग कहते क्यों हैं? मोह से लोगों की बुद्धि आवृत्त है, इसलिये
कुछ भी कह सकते हैं। यहाँ भी कहते हैं- कर्म होने में पाँच कारण हैं। उसके
बावजूद भी जो कैवल्य स्वरूप परमात्मा को कर्त्ता देखता है, वह मूढ़बुद्धि
(दुर्बुद्धि) यथार्थ नहीं देखता अर्थात् भगवान् नहीं करते, जबकि अर्जुन के लिये
वे ताल ठोंककर खड़े हो जाते हैं, 'निमित्तमात्रं भव' कि कर्त्ता-धर्त्ता तो मैं हूँ,
तू निमित्त बनकर खड़ा भर रह। अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं?
वस्तुतः भगवान और प्रकृति के बीच एक आकर्षण रेखा है। जब तक
साधक प्रकृति की सीमा में है, भगवान् नहीं करते। बहुत समीप रहकर भी
द्रष्टा-रूप में ही रहते हैं। अनन्य भाव से इष्ट को पकड़ने पर वे हृदय-देश से
संचालक बन जाते हैं। साधक प्रकृति की आकर्षण सीमा से निकलकर उनके
क्षेत्र में आ जाता है। ऐसे अनुरागी के लिये वे ताल ठोंककर सदैव खड़े रहते
हैं। केवल उसी के लिये भगवान् करते हैं। अतः चिन्तन करें। प्रश्न पूरा हुआ।
आगे देखें-
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७॥
जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्त्ता हूँ'-ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी
बुद्धि लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव
में न तो मारता है और न बँधता है। लोक-सम्बन्धी संस्कारों का विलय ही
लोक-संहार है। अब उस नियत कर्म की प्रेरणा कैसे होती है? इस पर देखें-
अष्टादश अध्याय ३३७
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८॥
अर्जुन ! परिज्ञाता अर्थात् पूर्णज्ञाता महापुरुषों से, 'ज्ञानम्'- उसको जानने
की विधि से और 'ज्ञेयम्' - जानने योग्य वस्तु ( श्रीकृष्ण ने पीछे कहा कि मैं
ही ज्ञेय, जानने योग्य पदार्थ हूँ) से कर्म करने की प्रेरणा मिलती है। पहले तो
पूर्णज्ञाता कोई महापुरुष हो, उनके द्वारा उस ज्ञान को जानने की विधि प्राप्त हो,
लक्ष्य- ज्ञेय पर दृष्टि हो तभी कर्म की प्रेरणा मिलती है और कर्त्ता (मन की
लगन), करण (विवेक, वैराग्य, शम, दम इत्यादि) तथा कर्म की जानकारी से
कर्म का संग्रह होता है, कर्म इकट्ठा होने लगता है। पीछे कहा गया कि प्राप्ति
के पश्चात् उस पुरुष का कर्म किये जाने से कोई प्रयोजन नहीं होता और न
छोड़ने से हानि ही होती है; फिर भी लोकसंग्रह अर्थात् पीछेवालों के हृदय में
कल्याणकारी साधनों के संग्रह के लिये वह कर्म में बरतता है। कर्त्ता, करण
और कर्म के द्वारा इनका संग्रह होता है। ज्ञान, कर्म और कर्त्ता के भी तीन-तीन
भेद हैं-
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९॥
ज्ञान, कर्म तथा कर्त्ता भी गुणों के भेद से सांख्यशास्त्र में तीन- तीन
प्रकार के कहे गये हैं, उन्हें भी तू यथावत् सुन। प्रस्तुत है पहले ज्ञान का भेद-
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२०॥
अर्जुन ! जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतों में एक अविनाशी
परमात्मभाव को विभागरहित एकरस देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक
जान। ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभूति है, जिसके साथ ही गुणों का अन्त होना है। यह
ज्ञान की परिपक्व अवस्था है। अब राजस ज्ञान देखें-
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१॥
जो ज्ञान सम्पूर्ण भूतों में भिन्न प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग
३३८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
करके जानता है कि यह अच्छा है, ये बुरे हैं- उस ज्ञान को तू राजस जान।
ऐसी स्थिति है तो राजसी स्तर पर तुम्हारा ज्ञान है। अब देखें तामस ज्ञान-
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।
जो ज्ञान एकमात्र शरीर में ही सम्पूर्णता के सदृश आसक्त है, युक्तिरहित
अर्थात् जिसके पीछे कोई क्रिया नहीं है, तत्त्व के अर्थस्वरूप परमात्मा की
जानकारी से अलग करनेवाला और तुच्छ है, वह ज्ञान तामस कहा जाता है।
अब प्रस्तुत है कर्म के तीन भेद-
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।२३।।
जो कर्म ‘नियतम्’- शास्त्रविधि से निर्धारित है (अन्य नहीं), संगदोष
और फल को न चाहनेवाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया जाता है, वह
कर्म सात्त्विक कहा जाता है। [नियत कर्म (आराधना) चिन्तन है, जो परम में
प्रवेश दिलाता है।]
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।।
जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है, फल को चाहनेवाले और अहंकारयुक्त
पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा जाता है। यह पुरुष भी वही
नियत कर्म करता है; किन्तु अन्तर मात्र इतना ही है कि फल की इच्छा और
अहंकार से युक्त है इसलिये उसके द्वारा होनेवाले कर्म राजस हैं। अब देखें
तामस-
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।।
जो कर्म अन्ततः नष्ट होनेवाला है, हिंसा-सामर्थ्य को न विचार कर
केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह कर्म तामस कहा जाता है। स्पष्ट है
कि यह कर्म शास्त्र का नियत कर्म नहीं है, उसके स्थान पर भ्रान्ति है। अब देखें
कर्त्ता के लक्षण-
अष्टादश अध्याय ३३९
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥२६॥
जो कर्त्ता संगदोष से रहित होकर, अहंकार के वचन न बोलनेवाला,
धैर्य और उत्साह से युक्त होकर, कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष,
शोक इत्यादि विकारों से सर्वथा रहित होकर कर्म में (अहर्निश) प्रवृत्त है, वह
कर्त्ता सात्त्विक कहा जाता है। यही उत्तम साधक के लक्षण हैं। कर्म वही है-
नियत कर्म।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७॥
आसक्तियुक्त, कर्मों के फल को चाहनेवाला, लोलुप, आत्माओं को
कष्ट देनेवाला, अपवित्र और हर्ष-शोक से जो लिप्त है, वह कर्त्ता राजस कहा
गया है।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८॥
जो चंचल चित्तवाला, असभ्य, घमण्डी, धूर्त, दूसरे के कार्यों में बाधा
पहुँचानेवाला, शोक करने के स्वभाववाला, आलसी और दीर्घसूत्री है कि फिर
कर लेंगे, वह कर्त्ता तामस कहा जाता है। दीर्घसूत्री कर्म को कल पर टालनेवाला
है, यद्यपि करने की इच्छा उसे भी रहती है। इस प्रकार कर्त्ता के लक्षण पूरे
हुए। अब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नवीन प्रश्न उठाया- बुद्धि, धारणा और सुख
के लक्षण-
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९॥
धनंजय! बुद्धि और धारणा शक्ति का भी गुणों के कारण तीन प्रकार का
भेद सम्पूर्णता से विभागपूर्वक मुझसे सुन।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३०॥
३४० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
पार्थ! प्रवृत्ति और निवृत्ति को, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य को, भय और
अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को जो बुद्धि यथार्थ जानती है, वह बुद्धि
सात्त्विकी है। अर्थात् परमात्म-पथ, आवागमन-पथ दोनों की भली प्रकार
जानकारीवाली बुद्धि सात्त्विकी है। तथा-
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।३१।।
पार्थ! जिस बुद्धि द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा कर्त्तव्य और
अकर्त्तव्य को भी यथावत् नहीं जानता, अधूरा जानता है, वह बुद्धि राजसी है।
अब तामसी बुद्धि का स्वरूप देखें-
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।३२।।
पार्थ! तमोगुण से ढँकी हुई जो बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है तथा
सम्पूर्ण हितों को विपरीत ही देखती है, वह बुद्धि तामसी है।
यहाँ श्लोक तीस से बत्तीस तक बुद्धि के तीन भेद बताये गये। जो बुद्धि
किस कार्य से निवृत्त होना है और किसमें प्रवृत्त होना है, कौन कर्त्तव्य है और
कौन अकर्त्तव्य है- इसकी भली प्रकार जानकारी रखती है, वह बुद्धि सात्त्विकी
है। जो कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य को धूमिल ढंग से जानती है, यथार्थ नहीं जानती-
वह राजसी बुद्धि है और अधर्म को धर्म, नश्वर को शाश्वत तथा हित को
अहित- इस प्रकार विपरीत जानकारीवाली बुद्धि तामसी है। इस प्रकार बुद्धि
के भेद समाप्त हुए। अब प्रस्तुत है दूसरा प्रश्न, 'धृति'- धारणा के तीन भेद-
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी।।३३।।
'योगेन'- यौगिक प्रक्रिया के द्वारा 'अव्यभिचारिणी'- योग-चिन्तन
के अलावा दूसरे किसी स्फुरण का आना व्यभिचार है, चित्त का बहक
जाना व्यभिचार है; इसके विपरीत अव्यभिचारिणी धारणा से मनुष्य मन, प्राण
और इन्द्रियों की क्रिया को जो धारण करता है, वह धारणा सात्त्विकी है।