यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश अध्याय ३३९
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥२६॥
जो कर्त्ता संगदोष से रहित होकर, अहंकार के वचन न बोलनेवाला,
धैर्य और उत्साह से युक्त होकर, कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष,
शोक इत्यादि विकारों से सर्वथा रहित होकर कर्म में (अहर्निश) प्रवृत्त है, वह
कर्त्ता सात्त्विक कहा जाता है। यही उत्तम साधक के लक्षण हैं। कर्म वही है-
नियत कर्म।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७॥
आसक्तियुक्त, कर्मों के फल को चाहनेवाला, लोलुप, आत्माओं को
कष्ट देनेवाला, अपवित्र और हर्ष-शोक से जो लिप्त है, वह कर्त्ता राजस कहा
गया है।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८॥
जो चंचल चित्तवाला, असभ्य, घमण्डी, धूर्त, दूसरे के कार्यों में बाधा
पहुँचानेवाला, शोक करने के स्वभाववाला, आलसी और दीर्घसूत्री है कि फिर
कर लेंगे, वह कर्त्ता तामस कहा जाता है। दीर्घसूत्री कर्म को कल पर टालनेवाला
है, यद्यपि करने की इच्छा उसे भी रहती है। इस प्रकार कर्त्ता के लक्षण पूरे
हुए। अब योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नवीन प्रश्न उठाया- बुद्धि, धारणा और सुख
के लक्षण-
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९॥
धनंजय! बुद्धि और धारणा शक्ति का भी गुणों के कारण तीन प्रकार का
भेद सम्पूर्णता से विभागपूर्वक मुझसे सुन।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३०॥