यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय ३२९
पवित्रता के अनुरूप शरीर को तपाना शरीर का तप है। सत्य, प्रिय और
हितकर बोलना वाणी का तप है और मन को कर्म में प्रवृत्त रखना, इष्ट के
अतिरिक्त विषयों के चिन्तन में मन को मौन रखना मन-सम्बन्धी तप है। मन,
वाणी और शरीर तीनों मिलाकर इस ओर तपाना सात्त्विक तप है। राजस तप
में कामनाओं के साथ उसी को किया जाता है, जबकि तामस तप शास्त्रविधि
से रहित स्वेच्छाचार है।
कर्त्तव्य मानकर देश, काल और पात्र का विचार करके श्रद्धापूर्वक
दिया गया दान सात्त्विक है। किसी लाभ के लोभ में कठिनाई से दिया जानेवाला
दान राजस है और झिड़ककर कुपात्र को दिया जानेवाला दान तामस है।
ॐ, तत् और सत् का स्वरूप बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा कि
ये नाम परमात्मा की स्मृति दिलाते हैं। शास्त्रविधि से निर्धारित तप, दान और
यज्ञ आरम्भ करने में ओम् का प्रयोग होता है और पूर्ति में ही ओम् पिण्ड
छोड़ता है। तत् का अर्थ है वह परमात्मा, उसके प्रति समर्पित होकर ही वह
कर्म होता है और जब कर्म धारावाही होने लगे, तब सत् का प्रयोग होता है।
भजन ही सत् है। सत् के प्रति भाव और साधुभाव में ही सत् का प्रयोग किया
जाता हैं। परमात्मा की प्राप्ति करा देनेवाले कर्म यज्ञ, दान और तप के परिणाम
में भी सत् का प्रयोग है और परमात्मा में प्रवेश दिला देनेवाला कर्म निश्चयपूर्वक
सत् है; किन्तु इन सबके साथ श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धा से रहित होकर किया
हुआ कर्म, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप न इस जन्म में लाभकारी है, न
अगले जन्मों में ही। अतः श्रद्धा अपरिहार्य है।
सम्पूर्ण अध्याय में श्रद्धा पर प्रकाश डाला गया और अन्त में ॐ, तत्
और सत् की विशद व्याख्या प्रस्तुत की गयी, जो गीता के श्लोकों में पहली
बार आया है। अतः-
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसम्वादे ‘ॐ तत्सत् श्रद्धात्रयविभागयोगो’ नाम
सप्तदशोऽध्यायः।।१७।।