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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

(ज) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
१८. अवतार- व्यक्ति के हृदय में होता है, बाहर नहीं।
१९. विराट् दर्शन- योगी के हृदय में ईश्वर के द्वारा दी गयी अनुभूति है।
भगवान साधक में दृष्टि बनकर खड़े हों, तभी दिखायी पड़ते हैं।
२०. पूजनीय देव ‘इष्ट’- एकमात्र परात्पर ब्रह्म ही ‘पूजनीय देव’ है। उसे
खोजने का स्थान हृदय-देश है। उसकी प्राप्ति का स्रोत उसी अव्यक्त
स्वरूप में स्थित ‘प्राप्तिवाले महापुरुष’ के द्वारा है।
अब इनमें से योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्वरूप समझने के लिये अध्याय
तीन तक आपको पढ़ना होगा, और अध्याय तेरह तक आप स्पष्ट समझने
लगेंगे कि श्रीकृष्ण योगी थे। अध्याय दो से ही सत्य निखर जायेगा। सनातन
और सत्य एक दूसरे के पूरक हैं, यह अध्याय दो से ही स्पष्ट होगा, वैसे
पूर्तिपर्यन्त चलेगा। युद्ध अध्याय चार तक स्पष्ट होने लगेगा, ग्यारह तक संशय
निर्मूल हो जायेगा; वैसे अध्याय सोलह तक देखना चाहिये। ‘युद्धस्थल’ के
लिए अध्याय तेरह बार- बार देखें।
‘ज्ञान’ अध्याय चार से स्पष्ट होगा तथा अध्याय तेरह में भली प्रकार
समझ में आयेगा कि प्रत्यक्ष दर्शन का नाम ‘ज्ञान’ है। ‘योग’ अध्याय छः तक
आप समझ सकेंगे, वैसे पूर्तिपर्यन्त योग के विभिन्न अंशों की परिभाषा है।
‘ज्ञानयोग’ अध्याय तीन से छः तक स्पष्ट हो जायेगा, आगे देखने की कोई
विशेष आवश्यकता नहीं है। ‘निष्काम कर्मयोग’ अध्याय दो से आरम्भ होकर
पूर्तिपर्यन्त है। ‘यज्ञ’ आप अध्याय तीन से चार तक पढ़ें, स्पष्ट हो जायेगा।
‘कर्म’ का नाम अध्याय २/३९ में प्रथम बार लिया गया है। इसी श्लोक
से अध्याय चार तक पढ़ लें तो स्पष्ट हो जायेगा कि कर्म का अर्थ आराधना,
भजन क्यों है? अध्याय सोलह और सत्रह यह विचार स्थिर कर देता है कि
यही सत्य है। ‘वर्णसंकर’ अध्याय तीन में और ‘अवतार’ अध्याय चार में स्पष्ट
हो जायेगा। ‘वर्ण-व्यवस्था’ के लिये अध्याय अठारह देखना होगा, वैसे संकेत
अध्याय तीन और चार में भी है। मनुष्य की देवासुर जातियों के लिये अध्याय
सोलह द्रष्टव्य है। ‘विराट् दर्शन’ अध्याय दस से ग्यारह तक स्पष्ट हो गया है।
अध्याय सात, नौ और पन्द्रह में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय

प्राक्कथन (झ)
सात, नौ और सत्रह में बाह्य देवताओं की अस्तित्वहीनता स्पष्ट हो जाती है।
परमात्मा के पूजन की स्थली हृदय-देश ही है, जिसमें ध्यान, श्वास-प्रश्वास
के चिन्तन इत्यादि की क्रियाएँ, जो एकान्त में बैठकर (मन्दिर-मूर्ति के सामने
नहीं) की जाती हैं-अध्याय तीन, चार, छः और अठारह में स्पष्ट है। बहुत
सोचने-विचारने से क्या प्रयोजन है, यदि अध्याय छः तक ही अध्ययन कर लें
तो भी ‘यथार्थ गीता’ का मूल आशय आपकी समझ में आ जायेगा।
गीता जीविका-संग्राम का साधन नहीं अपितु जीवन-संग्राम में शाश्वत
विजय का क्रियात्मक प्रशिक्षण है इसलिये युद्ध-ग्रन्थ है, जो वास्तविक विजय
दिलाता है; किन्तु गीतोक्त युद्ध तलवार, धनुष, बाण, गदा और फरसे से लड़ा
जानेवाला सांसारिक युद्ध नहीं है और न इन युद्धों में शाश्वत विजय निहित है।
यह सदसत् प्रवृत्तियों का संघर्ष है, जिनके रूपकात्मक वर्णन की परम्परा रही
है। वेद में इन्द्र और वृत्र, विद्या और अविद्या, पुराणों में देवासुर संग्राम,
महाकाव्यों में राम और रावण, कौरव एवं पाण्डवों के संघर्ष को ही गीता में
धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र, दैवी सम्पद् एवं आसुरी सम्पद्, सजातीय एवं विजातीय,
सद्गुण एवं दुर्गुणों का संघर्ष कहा गया है।
यह संघर्ष जहाँ होता है, वह स्थान कहाँ है? गीता का धर्मक्षेत्र और
कुरुक्षेत्र भारत का कोई भू-खण्ड नहीं, बल्कि स्वयं गीताकार के शब्दों में-
‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’- कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र
है, जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्काररूप से सदैव उगता है।
दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पाँचों विकार और तीनों गुणों का
विकार इस क्षेत्र का विस्तार है। प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से विवश
होकर मनुष्य को कर्म करना पड़ता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना
नहीं रह सकता। ‘पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननी जठरे
शयनम्’ जन्म-जन्मान्तरों से करते ही तो बीत रहा है। यही कुरुक्षेत्र है।
सद्गुरु के माध्यम से साधना के सही दौर में पड़कर साधक जब परमधर्म
परमात्मा की ओर अग्रसर होता है, तब यह क्षेत्र धर्मक्षेत्र बन जाता है। यह
शरीर ही क्षेत्र है।

(ञ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इसी शरीर के अन्तराल में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी
सम्पद् और आसुरी सम्पद्। दैवी सम्पद् में हैं- पुण्यरूपी पाण्डु और कर्त्तव्यरूपी
कुन्ती। पुण्य जागृत होने से पहले मनुष्य जो कुछ भी कर्त्तव्य समझकर करता
है, अपनी समझ से वह कर्त्तव्य ही करता है; किन्तु उससे कर्त्तव्य होता नहीं-
क्योंकि पुण्य के बिना कर्त्तव्य को समझा ही नहीं जा सकता। कुन्ती ने पाण्डु
से सम्बन्ध होने से पूर्व जो कुछ भी अर्जित किया, वह था 'कर्ण'। आजीवन
कुन्ती के पुत्रों से लड़ता रह गया। पाण्डवों का दुर्धर्ष शत्रु यदि कोई था, तो वह
था 'कर्ण'। विजातीय कर्म ही कर्ण है जो बन्धनकारी है, जिससे परम्परागत
रूढ़ियों का चित्रण होता है- पूजा-पद्धतियाँ पिण्ड नहीं छोड़तीं। पुण्य जागृत
होने पर धर्मरूपी 'युधिष्ठिर', अनुरागरूपी 'अर्जुन', भावरूपी 'भीम', नियमरूपी
'नकुल', सत्संगरूपी 'सहदेव', सात्त्विकतारूपी 'सात्यकि', काया में सामर्थ्यरूपी
'काशिराज', कर्त्तव्य के द्वारा भव पर विजय 'कुन्तिभोज' इत्यादि इष्टोन्मुखी
मानसिक प्रवृत्तियों का उत्कर्ष होता है, जिनकी गणना सात अक्षौहिणी है।
'अक्ष' दृष्टि को कहते हैं। सत्यमयी दृष्टिकोण से जिसका गठन है, वह है दैवी
सम्पद्। परमधर्म परमात्मा तक की दूरी तय करानेवाली ये सात सीढ़ियाँ 'सात
भूमिकाएँ' हैं, न कि कोई गणना-विशेष। वस्तुतः ये प्रवृत्तियाँ अनन्त हैं।
दूसरी ओर है 'कुरुक्षेत्र', जिसमें दस इन्द्रियाँ और एक मन ग्यारह
अक्षौहिणी सेना है। मनसहित इन्द्रियमयी दृष्टिकोण से जिसका गठन है, वह है
आसुरी सम्पद्। जिसमें हैं अज्ञानरूपी 'धृतराष्ट्र' जो सत्य जानते हुए भी अन्धा
बना रहता है, उसकी सहचारिणी है 'गान्धारी'- इन्द्रिय आधारवाली प्रवृत्ति।
इनके साथ हैं- मोहरूपी 'दुर्योधन', दुर्बुद्धिरूपी 'दुःशासन', विजातीय कर्मरूपी
'कर्ण', भ्रमरूपी 'भीष्म', द्वैत के आचरणरूपी 'द्रोणाचार्य', आसक्तिरूपी
'अश्वत्थामा', विकल्परूपी 'विकर्ण', अधूरी साधना में कृपा के आचरणरूपी
'कृपाचार्य' और इन सबके बीच जीवरूपी विदुर है, जो रहता है अज्ञान में
किन्तु दृष्टि सदैव पाण्डवों पर है, पुण्य से प्रवाहित प्रवृत्ति पर है; क्योंकि आत्मा
परमात्मा का शुद्ध अंश है। इस प्रकार आसुरी सम्पद् भी अनन्त है। क्षेत्र एक
ही है- यह शरीर, इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं। एक प्रकृति में विश्वास
दिलाती है, नीच-अधम योनियों का कारण बनती है, तो दूसरी परमपुरुष

प्राक्कथन (ट)
परमात्मा में विश्वास और प्रवेश दिलाती है। तत्त्वदर्शी महापुरुष के संरक्षण में
क्रमशः साधन करने पर दैवी सम्पद् का उत्कर्ष और आसुरी सम्पद् का सर्वथा
शमन हो जाता है। जब कोई विकार ही नहीं रहा, मन का सर्वथा निरोध और
निरुद्ध मन का भी विलय हो जाता है तो दैवी सम्पद् की आवश्यकता समाप्त
हो जाती है। अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष के अनन्तर पाण्डव-पक्ष के योद्धा
भी योगेश्वर में समाहित हो रहे हैं। पूर्ति के साथ दैवी सम्पद् भी विलीन हो
जाती है, अन्तिम शाश्वत परिणाम निकल आता है। इसके पश्चात् महापुरुष
यदि कुछ करता है तो केवल अनुयायियों के मार्गदर्शन के लिये ही करता है।
लोकसंग्रह की इसी भावना से महापुरुषों ने सूक्ष्म मनोभावों का वर्णन
उन्हें ठोस स्थूलरूप देकर किया है। 'गीता' छन्दोबद्व है, व्याकरणसम्मत है;
किन्तु इसके पात्र प्रतीकात्मक हैं, अमूर्त योग्यताओं के मूर्तरूप मात्र हैं। गीता
के आरम्भ में तीस-चालीस पात्रों का नाम लिया गया है जिनमें आधे सजातीय
हैं, आधे विजातीय; कुछ पाण्डव-पक्ष के हैं, कुछ कौरव-पक्ष के। 'विश्वरूप
दर्शन' के समय इनमें से चार-छः नाम पुनः आये हैं, अन्यथा सम्पूर्ण गीता में
इन नामों की चर्चा तक नहीं है। एकमात्र अर्जुन ही ऐसा पात्र है, जो आरम्भ
से अन्त तक योगेश्वर के समक्ष है। वह अर्जुन भी केवल योग्यता का प्रतीक
है, न कि व्यक्ति-विशेष। गीता के आरम्भ में अर्जुन सनातन कुलधर्म के लिए
विकल है; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान बताया और निर्देश दिया कि
आत्मा ही सनातन है, शरीर नाशवान् है, इसलिये युद्ध कर। इस आदेश से यह
स्पष्ट नहीं होता कि अर्जुन कौरवों को ही मारे। पाण्डव-पक्ष के भी शरीरधारी
ही तो थे, दोनों ओर सम्बन्धी ही तो थे। संस्कारों पर आधारित शरीर क्या
तलवार से काटने पर समाप्त हो सकेगा? जब शरीर नाशवान् है, जिसका
अस्तित्व है ही नहीं, तो अर्जुन कौन था? श्रीकृष्ण किसकी रक्षा में खड़े थे?
क्या किसी शरीरधारी की रक्षा में खड़े थे? श्रीकृष्ण ने कहा, "जो शरीर के
लिये परिश्रम करता है, वह पापायु मूढ़बुद्धि पुरुष व्यर्थ ही जीता है।" यदि
श्रीकृष्ण किसी शरीरधारी की रक्षा में खड़े हैं, तब तो वे भी मूढ़बुद्धि हैं, व्यर्थ
ही जीनेवाले हैं। वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है।

(ठ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अनुरागी के लिये महापुरुष सदैव खड़े हैं। अर्जुन शिष्य था और श्रीकृष्ण
एक सद्गुरु थे। विनयावनत होकर उसने कहा- धर्म के मार्ग में मोहितचित्त मैं
आपसे पूछता हूँ, जो श्रेय (परम कल्याणकारी) हो, वह उपदेश मेरे प्रति
कहिये। अर्जुन श्रेय चाहता था, प्रेय (भौतिक पदार्थ) नहीं। केवल कहिये ही
नहीं, साधिये-सँभालिये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। इसी प्रकार
गीता में स्थान-स्थान पर स्पष्ट है कि अर्जुन आर्त अधिकारी है और योगेश्वर
श्रीकृष्ण एक सद्गुरु हैं। वे सद्गुरु अनुरागी के साथ सदैव रहते हैं, उनका
मार्गदर्शन करते हैं।
जब भावुकतावश कोई व्यक्ति 'पूज्य महाराज जी' के पास रहने का
आग्रह करने लगता था, तब वे कहा करते थे- "जाओ, शरीर से कहीं रहो,
मन से मेरे पास आते रहो। प्रातः-सायं राम, शिव, ॐ किसी एक दो-ढाई
अक्षर के नाम का जाप करो और मेरे स्वरूप का हृदय में ध्यान धरो। एक
मिनट भी स्वरूप पकड़ लोगे तो जिसका नाम भजन है वह मैं तुम्हें दूँगा।
इससे अधिक पकड़ने लगोगे तो हृदय से रथी बनकर सदैव तुम्हारे साथ
रहूँगा।" जब सुरत पकड़ में आ जाती है तो इसके बाद महापुरुष इतना ही पास
में रहते हैं जितना हाथ-पाँव, नाक-कान इत्यादि आपके पास हैं। आप हजारों
किलोमीटर दूर क्यों न हों, वह सदैव समीप हैं। मन में विचारों के उठने से भी
पहले वे मार्गदर्शन करने लग जाते हैं। अनुरागी के हृदय में वह महापुरुष सदैव
आत्मा से अभिन्न होकर जाग्रत रहते हैं। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है।
गीता के ग्यारहवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य देखने पर
अर्जुन अपनी क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमायाचना करने लगा। श्रीकृष्ण ने क्षमा
किया और याचना के अनुरूप सौम्य स्वरूप में आकर कहा, "अर्जुन! मेरे इस
स्वरूप को न पहले किसी ने देखा है और न भविष्य में कोई देख सकेगा।"
तब तो गीता हमलोगों के लिए व्यर्थ है; क्योंकि उस दर्शन की योग्यताएँ अर्जुन
तक सीमित रह गयीं, जबकि उसी समय संजय देख रहा था। पहले भी उन्होंने
कहा, "बहुत से योगीजन ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे साक्षात् स्वरूप को
प्राप्त हो चुके हैं।" अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः अनुराग

प्राक्कथन (ड)
ही 'अर्जुन' है, जो आपके हृदय की भावना-विशेष है। अनुरागविहीन पुरुष न
कभी पूर्व में देख सका है और न अनुरागविहीन पुरुष भविष्य में कभी देख
सकेगा- 'मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।'
(रामचरितमानस, ७/६१/१) अतः अर्जुन एक प्रतीक है। यदि प्रतीक
नहीं है तो गीता का पीछा छोड़ दें, गीता आपके लिये नहीं है; क्योंकि उस दर्शन
की योग्यता अर्जुन तक ही सीमित रह गयी।
अध्याय के अन्त में योगेश्वर निर्णय देते हैं- "अर्जुन ! अनन्य भक्ति
और श्रद्धा द्वारा मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखने के लिये (जैसा तूने देखा), तत्त्व
से स्पष्ट जानने के लिये और प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ।" अनन्य भक्ति
अनुराग का ही दूसरा रूप है और यही अर्जुन का स्वरूप भी है। अर्जुन पथिक
का प्रतीक है। इस प्रकार गीता के पात्र प्रतीकात्मक हैं। यथास्थान उनका
संकेत है।
रहे हों कोई ऐतिहासिक श्रीकृष्ण और अर्जुन, निश्चय ही हुआ हो कोई
विश्वयुद्ध; किन्तु गीता में भौतिक युद्ध का चित्रण कदापि नहीं है। उस ऐतिहासिक
युद्ध के मुहाने पर घबड़ाया तो था अर्जुन, न कि सेना; सेना तो लड़ने को तैयार
खड़ी थी।
क्या गीता का उपदेश देकर श्रीकृष्ण ने सव्यसाची अर्जुन को सेना की
योग्यता का बनाया? वस्तुतः साधन लिखने में नहीं आता। सब कुछ पढ़ लेने
के बाद भी चलना शेष ही रहता है। यही प्रेरणा 'यथार्थ गीता' है।
श्री गुरु पूर्णिमा सद्गुरु कृपाश्रयी, जगद्बन्धु
२४ जुलाई, १९८३ ई० स्वामी अड़गड़ानन्द

प्रथमोऽध्यायः संशय-विषाद योग

॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥
॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता ॥
॥ यथार्थ गीता ॥
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१॥
धृतराष्ट्र ने पूछा- “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में एकत्र युद्ध की
इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?”
अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र और संयमरूपी संजय। अज्ञान मन के अन्तराल में
रहता है। अज्ञान से आवृत्त मन धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के
माध्यम से वह देखता है, सुनता है और समझता है कि परमात्मा ही सत्य है,
फिर भी जब तक इससे उत्पन्न मोहरूपी दुर्योधन जीवित है इसकी दृष्टि सदैव
कौरवों पर रहती है, विकारों पर ही रहती है।
शरीर एक क्षेत्र है। जब हृदय-देश में दैवी सम्पत्ति का बाहुल्य होता है
तो यह शरीर धर्मक्षेत्र बन जाता है और जब इसमें आसुरी सम्पत्ति का बाहुल्य
होता है तो यह शरीर कुरुक्षेत्र बन जाता है। ‘कुरु’ अर्थात् करो- यह शब्द
आदेशात्मक है। श्रीकृष्ण कहते हैं- प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों द्वारा परवश
होकर मनुष्य कर्म करता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता।
गुण उससे करा लेते हैं। सो जाने पर भी कर्म बन्द नहीं होता, वह भी स्वस्थ

२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
शरीर की आवश्यक खुराक मात्र है। तीनों गुण मनुष्य को देवता से कीटपर्यन्त
शरीरों में ही बाँधते हैं। जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं,
तब तक ‘कुरु’ लगा रहेगा। अतः जन्म-मृत्युवाला क्षेत्र, विकारोंवाला क्षेत्र
कुरुक्षेत्र है और परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्तियों
(पाण्डवों) का क्षेत्र धर्मक्षेत्र है।
पुरातत्त्वविद् पंजाब में, काशी-प्रयाग के मध्य तथा अनेकानेक स्थलों
पर कुरुक्षेत्र की शोध में लगे हैं; किन्तु गीताकार ने स्वयं बताया है कि जिस
क्षेत्र में यह युद्ध हुआ, वह कहाँ है। ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’
(अ० १३/१) “अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है और जो इसको जानता है,
इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है।” आगे उन्होंने क्षेत्र का विस्तार बताया,
जिसमें दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों विकार और तीनों गुणों का
वर्णन है। शरीर ही क्षेत्र है, एक अखाड़ा है। इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं-
‘दैवी सम्पद’ और ‘आसुरी सम्पद’, ‘पाण्डु की सन्तान’ और ‘धृतराष्ट्र की
सन्तान’, ‘सजातीय और विजातीय प्रवृत्तियाँ’।
अनुभवी महापुरुष की शरण जाने पर इन दोनों प्रवृत्तियों में संघर्ष का
सूत्रपात होता है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है और यही वास्तविक युद्ध है।
विश्वयुद्धों से इतिहास भरा पड़ा है; किन्तु उनमें जीतनेवालों को भी शाश्वत
विजय नहीं मिलती। ये तो आपसी बदले हैं। प्रकृति का सर्वथा शमन करके
प्रकृति से परे की सत्ता का दिग्दर्शन करना और उसमें प्रवेश पाना ही वास्तविक
विजय है। यही एक ऐसी विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। यही मुक्ति है,
जिसके पीछे जन्म-मृत्यु का बन्धन नहीं है।
इस प्रकार अज्ञान से आच्छादित प्रत्येक मन संयम के द्वारा जानता है
कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के युद्ध में क्या हुआ? अब जैसा जिसके संयम का उत्थान है,
वैसे-वैसे उसे दृष्टि आती जायेगी।
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।।

प्रथम अध्याय ३
उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर
द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा-
द्वैत का आचरण ही 'द्रोणाचार्य' है। जब जानकारी हो जाती है कि हम
परमात्मा से अलग हो गये हैं (यही द्वैत का भान है), वहाँ उसकी प्राप्ति के
लिये तड़प पैदा हो जाती है, तभी हम गुरु की तलाश में निकलते हैं। दोनों
प्रवृत्तियों के बीच यही प्राथमिक गुरु है; यद्यपि बाद के सद्गुरु योगेश्वर
श्रीकृष्ण होंगे, जो योग की स्थितिवाले होंगे।
राजा दुर्योधन आचार्य के पास जाता है। मोहरूपी दुर्योधन। मोह सम्पूर्ण
व्याधियों का मूल है, राजा है। दुर्योधन- दुर् अर्थात् दूषित, यो धन अर्थात् वह
धन। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। उसमें जो दोष उत्पन्न करता है, वह
है मोह। यही प्रकृति की ओर खींचता है और वास्तविक जानकारी के लिये
प्रेरणा भी प्रदान करता है। मोह है तभी तक पूछने का प्रश्न भी है, अन्यथा
सभी पूर्ण ही हैं।
अतः व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर अर्थात् पुण्य से
प्रवाहित सजातीय वृत्तियों को संगठित देखकर मोहरूपी दुर्योधन ने प्रथम गुरु
द्रोण के पास जाकर यह कहा-
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।।३।।
हे आचार्य! अपने बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार
खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस भारी सेना को देखिये।
शाश्वत अचल पद में आस्था रखनेवाला दृढ़ मन ही 'धृष्टद्युम्न' है।
यही पुण्यमयी प्रवृत्तियों का नायक है। 'साधन कठिन न मन कहुँ टेका।'
(रामचरितमानस, ७/४४/३)- साधन कठिन नहीं, मन की दृढ़ता कठिन
होनी चाहिये।
अब देखें सेना का विस्तार-
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ।।४।।

४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस सेना में 'महेष्वासाः'- महान् ईश में वास दिलानेवाले, भावरूपी
'भीम', अनुरागरूपी 'अर्जुन' के समान बहुत से शूरवीर, जैसे- सात्त्विकतारूपी
'सात्यकि', 'विराटः'- सर्वत्र ईश्वरीय प्रवाह की धारणा, महारथी राजा द्रुपद
अर्थात् अचल स्थिति तथा-
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥
'धृष्टकेतुः'- दृढ़कर्तव्य, 'चेकितानः'- जहाँ भी जाय, वहाँ से चित्त
को खींचकर इष्ट में स्थिर करना, 'काशिराजः'- कायारूपी काशी में ही वह
साम्राज्य है, 'पुरुजित्'- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों पर विजय दिलानेवाला
पुरुजित्, 'कुन्तिभोजः'- कर्तव्य से भव पर विजय, नरों में श्रेष्ठ 'शैब्य'
अर्थात् सत्य व्यवहार-
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥
और पराक्रमी 'युधामन्युः'- युद्ध के अनुरूप मन की धारणा,
'उत्तमौजाः'- शुभ की मस्ती, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु- जब शुभ आधार आ
जाता है तो मन भय से रहित हो जाता है- ऐसा शुभ आधार से उत्पन्न अभय
मन, ध्यानरूपी द्रौपदी के पाँचों पुत्र- वात्सल्य, लावण्य, सहृदयता, सौम्यता,
स्थिरता सब-के-सब महारथी हैं। साधन-पथ पर सम्पूर्ण योग्यता के साथ
चलने की क्षमताएँ हैं।
इस प्रकार दुर्योधन ने पाण्डव-पक्ष के पन्द्रह-बीस नाम गिनाये, जो
दैवी सम्पद् के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। विजातीय प्रवृत्तियों का राजा होते हुए भी
'मोह' ही सजातीय प्रवृत्तियों को समझने के लिये बाध्य करता है।
दुर्योधन अपना पक्ष संक्षेप में कहता है। यदि कोई बाह्य युद्ध होता तो
अपनी फौज बढ़ा-चढ़ाकर गिनाता। विकार कम गिनाये गये; क्योंकि उन पर
विजय पाना है, वे नाशवान् हैं। केवल पाँच-सात विकार बताये गये, जिनके
अन्तराल में सम्पूर्ण बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। जैसे-
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥७॥

प्रथम अध्याय ५
द्विजोत्तम! हमारे पक्ष में जो-जो प्रधान हैं, उन्हें भी आप समझ लें।
आपको जानने के लिये मेरी सेना के जो-जो नायक हैं, उनको कहता हूँ।
बाह्य युद्ध में सेनापति के लिये 'द्विजोत्तम' सम्बोधन असामयिक है।
वस्तुतः 'गीता' में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियों का संघर्ष है। जिसमें द्वैत का
आचरण ही 'द्रोण' है। जब तक हम लेशमात्र भी आराध्य से अलग हैं, तब
तक प्रकृति विद्यमान है, द्वैत बना है। इस 'द्वि' पर जय पाने की प्रेरणा प्रथम गुरु
द्रोणाचार्य से मिलती है। अधूरी शिक्षा ही पूर्ण जानकारी के लिये प्रेरणा प्रदान
करती है। वह पूजास्थली नहीं, वहाँ शौर्यसूचक सम्बोधन होना चाहिये।
विजातीय प्रवृत्ति के नायक कौन-कौन हैं?-
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च।।८।।
एक तो स्वयं आप (द्वैत के आचरणरूपी द्रोणाचार्य) हैं, भ्रमरूपी
पितामह 'भीष्म' हैं। भ्रम इन विकारों का उद्गम है। अन्त तक जीवित रहता है,
इसलिये पितामह है। समूची सेना मर गयी, यह जीवित था। शरशय्या पर
अचेत था, फिर भी जीवित था। यह है भ्रमरूपी 'भीष्म'। भ्रम अन्त तक रहता
है। इसी प्रकार विजातीय कर्मरूपी 'कर्ण' तथा संग्रामविजयी 'कृपाचार्य' हैं।
साधनावस्था में साधक द्वारा कृपा का आचरण ही 'कृपाचार्य' है। भगवान
कृपाधाम हैं और प्राप्ति के पश्चात् सन्त का भी वही स्वरूप है। किन्तु साधनकाल
में जब तक हम अलग हैं, परमात्मा अलग है, विजातीय प्रवृत्ति जीवित है,
मोहमयी घिराव है- ऐसी परिस्थिति में साधक यदि कृपा का आचरण करता
है तो वह नष्ट हो जाता है। सीता ने दया की तो कुछ काल लंका में प्रायश्चित
करना पड़ा। विश्वामित्र दयार्द्र हुए तो पतित होना पड़ा। योगसूत्रकार महर्षि
पतंजलि भी यही कहते हैं- 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः।'
(योगदर्शन, ३/३७) व्युत्थानकाल में सिद्धियाँ प्रकट होती हैं। वे वास्तव
में सिद्धियाँ हैं; किन्तु कैवल्यप्राप्ति के लिये उतनी ही बड़ी विघ्न हैं जितने
काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि। गोस्वामी तुलसीदास का भी यही निर्णय है-

६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
छोरत ग्रन्थि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।।
( रामचरितमानस, ७/११७/६-७ )
माया अनेक विघ्न करती है, ऋद्धियाँ प्रदान करती है, यहाँ तक कि
सिद्ध बना देती है। ऐसी अवस्थावाला साधक बगल से निकल भर जाय,
मरणासन्न रोगी भी जी उठेगा। वह भले ठीक हो जाय, किन्तु साधक उसे
अपनी देन मान बैठे तो नष्ट हो जायेगा। एक रोगी के स्थान पर हजारों रोगी घेर
लेंगे, भजन-चिन्तन का क्रम अवरुद्ध हो जायेगा और उधर बहकते-बहकते
प्रकृति का बाहुल्य हो जायेगा। यदि लक्ष्य दूर है और साधक कृपा करता है तो
कृपा का अकेला आचरण ही ‘समितिञ्जय:’– समूची सेना को जीत लेगा।
इसलिये साधक को पूर्तिपर्यन्त इससे सतर्क रहना चाहिये। ‘दया बिनु सन्त
कसाई, दया करी तो आफत आई।’ लेकिन अधूरी अवस्था में यह विजातीय
प्रवृत्ति का दुर्धर्ष योद्धा है।
इसी प्रकार आसक्तिरूपी अश्वत्थामा। सृष्टि में कहीं भी वस्तुओं में
लगाव ही आसक्ति है। द्वैत का आचरण द्रोणाचार्य है। द्वैत ही आसक्ति का
जन्मदाता है। शस्त्र हाथ में रहते आचार्य द्रोण की मृत्यु नहीं हो सकती थी, वह
अजेय थे। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “कौरव-पक्ष में एक हाथी का नाम
अश्वत्थामा है। भीम उस हाथी को मारकर ‘अश्वत्थामा मारा गया’–ऐसा
उद्घोष करें। इस अप्रिय सूचना से आचार्य मर्माहत हो शिथिल पड़ जायेंगे।
उसी समय उनका अन्त कर दिया जाय।” भीम ने हाथी को मार डाला, प्रचार
किया कि अश्वत्थामा मारा गया। आचार्य द्रोण ने समझा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा
मारा गया। वे शिथिल पड़ गये, धनुष हाथ से गिर गया। वह हताश निश्चेष्ट
होकर युद्धभूमि में बैठ गये। उनका गला कट गया। पुत्र में अत्यधिक आसक्ति
उनकी मृत्यु का कारण बनी। अश्वत्थामा दीर्घजीवी था। निवृत्ति के अन्तिम
क्षणों तक यह बाधा के रूप में विद्यमान रहता है, इसीलिये अमर कहलाया।
विकल्परूपी विकर्ण। साधना की उन्नत अवस्था में विशिष्ट कल्पनाएँ
उठने लगती हैं। मन में संकल्प-विकल्प होने लगता है कि स्वरूप-प्राप्ति के
साथ भगवान की ओर से कौन-सी सिद्धियाँ, अलौकिक शक्तियाँ प्रदान की

प्रथम अध्याय ७
जायेंगी? भगवान के चिन्तन के स्थान पर विभूतियों का चिन्तन होने लगता है।
साधक की दृष्टि केवल कर्म पर होनी चाहिये, उसे फल की वासनावाला नहीं
होना चाहिये; किन्तु जब वह ऋद्धियों-सिद्धियों का चिन्तन करने लगता है,
यह विकल्प ही विकर्ण है। ये कल्पनाएँ विशिष्ट हैं, किन्तु साधना में भयंकर
बाधक हैं।
भ्रममयी श्वास ही भूरिश्रवा है। साधन का स्तर उन्नत होने पर उसकी
प्रशंसा होने लगती है कि वह महात्मा है, सिद्ध है, उसमें दिव्य शक्तियाँ हैं,
उसके समक्ष लोकपाल भी नतमस्तक हो जाते हैं। इस आवभाव, प्रशस्ति से
साधक प्रसन्न होने लगे, गद्गद होकर बहकने लगे- यह भ्रममयी श्वास ही
भूरिश्रवा है। पूज्य गुरुदेव का कथन था- “संसार पुष्पवृष्टि करे, प्रशंसा करे,
विश्व जगद्गुरु कहे- तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, रोने को आँसू नहीं मिलेगा !
यदि भगवान तुम्हें साधु कह दें तो सब कुछ पा जाओगे। दुनिया कहे चाहे
कभी न कहे, फिर भी तुम सर्वस्व प्राप्त कर लोगे।” इस प्रकार सांसारिक
प्रशंसा में बह जाना भ्रममयी श्वास है, यही भूरिश्रवा है। प्रशंसा भूरि-भूरि है,
अत्यधिक है, अतिरंजित है; इससे साधना में स्राव (घटाव, क्षय) होने लगता
है। अस्तु, भ्रममयी श्वास भूरिश्रवा है। संयम का स्तर उन्नत होने पर आयी हुई
विकृतियों के ये नाम हैं, बाह्य प्रवृत्ति के अंग-उपांग हैं।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥
और भी बहुत से शूरवीर अनेक शस्त्रों से युक्त मेरे लिये जीवन की
आशा को त्यागकर युद्ध में डटे हैं। सभी मेरे लिये प्राण त्यागनेवाले हैं; किन्तु
उनकी कोई ठोस गणना नहीं है। अब कौन-सी सेना किन भावों द्वारा सुरक्षित
है? इस पर कहते हैं-
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१०॥
भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा
रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सुगम है। 'पर्याप्त' और 'अपर्याप्त' जैसे
श्लिष्ट शब्द का प्रयोग दुर्योधन की आशंका को व्यक्त करता है। अतः देखना

८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
है कि भीष्म कौन-सी सत्ता है, जिस पर कौरव निर्भर करते हैं तथा भीम
कौन-सी सत्ता है, जिस पर (दैवी सम्पद्) सम्पूर्ण पाण्डव निर्भर हैं। दुर्योधन
अपनी व्यवस्था देता है कि-
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।११।।
इसलिये सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग
सब-के-सब भीष्म की ही सब ओर से रक्षा करें। यदि भीष्म जीवित हैं तो हम
अजेय हैं। इसलिये आप पाण्डवों से न लड़कर केवल भीष्म की ही रक्षा करें।
कैसा योद्धा है भीष्म, जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है, कौरवों
को उसकी रक्षा-व्यवस्था करनी पड़ रही है? यह कोई बाह्य योद्धा नहीं, भ्रम
ही भीष्म है। जब तक भ्रम जीवित है, तब तक विजातीय प्रवृत्तियाँ (कौरव)
अजेय हैं। अजेय का यह अर्थ नहीं कि जिसे जीता ही न जा सके; बल्कि
अजेय का अर्थ दुर्जय है, जिसे कठिनाई से जीता जा सकता हो।
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।।
(रामचरितमानस, ६/८० क)
यदि भ्रम समाप्त हो जाय तो अविद्या अस्तित्वहीन हो जाय। मोह
इत्यादि जो आंशिक रूप से बचे भी हैं, शीघ्र ही समाप्त हो जायेंगे। भीष्म की
इच्छा-मृत्यु थी। इच्छा ही भ्रम है। इच्छा का अन्त और भ्रम का मिटना एक
ही बात है। इसी को सन्त कबीर ने सरलता से कहा-
इच्छा काया इच्छा माया, इच्छा जग उपजाया।
कह कबीर जे इच्छा विवर्जित, ताका पार न पाया।।
जहाँ भ्रम नहीं होता, वह अपार और अव्यक्त है। इस शरीर के जन्म का
कारण इच्छा है। इच्छा ही माया है और इच्छा ही जगत् की उत्पत्ति का कारण
है। [‘सोऽकामयत।’ (तैत्तिरीय उप०, ब्रह्मानन्द बल्ली अनुवाक् ६ ),
‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।’ (छान्दोग्य उप०, ६/२/३)] कबीर
कहते हैं- जो इच्छाओं से सर्वथा रहित हैं, ‘ताका पार न पाया’- वे अपार,
अनन्त, असीम तत्त्व में प्रवेश पा जाते हैं। [‘योऽकामो निष्काम आप्तकाम

प्रथम अध्याय ९
आत्मकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।'
(बृहदारण्यक उप०, ४/४/६)-जो कामनाओं से रहित आत्मा में स्थिर
आत्मस्वरूप है, उसका कभी पतन नहीं होता। वह ब्रह्म के साथ एक हो जाता
है।] आरम्भ में इच्छाएँ अनन्त होती हैं और अन्ततोगत्वा परमात्म-प्राप्ति की
इच्छा शेष रहती है। जब यह इच्छा भी पूरी हो जाती है, तब इच्छा भी मिट
जाती है। यदि उससे भी बड़ी कोई वस्तु होती तो आप उसकी इच्छा अवश्य
करते। जब उससे आगे कोई वस्तु है ही नहीं तो इच्छा किसकी होगी? जब
प्राप्त होने योग्य कोई वस्तु अप्राप्य न रह जाय तो इच्छा भी समूल नष्ट हो
जाती है और इच्छा के मिटते ही भ्रम का सर्वथा अन्त हो जाता है। यही भीष्म
की इच्छा-मृत्यु है। इस प्रकार भीष्म द्वारा रक्षित हमलोगों की सेना सब प्रकार
से अजेय है। जब तक भ्रम है, तभी तक अविद्या का भी अस्तित्व है। भ्रम
शान्त हुआ तो अविद्या भी समाप्त हो जाती है।
भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सुगम है। भावरूपी भीम।
'भावे विद्यते देव:'- भाव में वह क्षमता है कि अविदित परमात्मा भी विदित
हो जाता है। 'भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन।'
(रामचरितमानस, ७/९२ख) श्रीकृष्ण ने इसे श्रद्धा कहकर सम्बोधित
किया है। भाव में वह क्षमता है कि भगवान को भी वश में कर लेता है। भाव
से ही सम्पूर्ण पुण्यमयी प्रवृत्तियों का विकास है। यह पुण्य का संरक्षक है। है
तो इतना बलवान् कि परमदेव परमात्मा को संभव बनाता है; किन्तु साथ ही
इतना कोमल भी है कि आज भाव है तो कल अभाव में बदलते देर नहीं
लगती। आज आप कहते हैं कि महाराज बहुत अच्छे हैं, कल कह सकते हैं
कि नहीं, हमने तो देखा महाराज खीर खाते हैं।
घास पात जो खात हैं, तिनहि सतावे काम।
दूध मलाई खात जे, तिनकी जाने राम।।
इष्ट में लेशमात्र भी त्रुटि प्रतीत होने पर भाव डगमगा जाता है, पुण्यमयी
प्रवृत्तियाँ विचलित हो उठती हैं, इष्ट से सम्बन्ध टूट जाता है। इसलिये भीम
द्वारा रक्षित इन लोगों की सेना जीतने में सुगम है। महर्षि पतंजलि का भी यही
निर्णय है- 'स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः।'

१० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
(योगदर्शन, १/१४)- दीर्घकाल तक निरन्तर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक किया
हुआ साधन ही दृढ़ हो पाता है।
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्।।१२।।
इस प्रकार अपने बलाबल का निर्णय लेकर शंखध्वनि हुई। शंखध्वनि
पात्रों के पराक्रम की घोषणा है कि जीतने पर कौन-सा पात्र आपको क्या
देगा? कौरवों में वृद्ध प्रतापवान् पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष
उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंहनाद के समान भयप्रद शंख बजाया। सिंह
प्रकृति के भयावह पहलू का प्रतीक है। घोर जंगल के नीरव एकान्त में शेर की
दहाड़ कान में पड़ जाय तो रोंगटे खड़े हो जायेंगे, हृदय काँपने लगेगा, यद्यपि
शेर आपसे मीलों दूर है। भय प्रकृति में होता है, परमात्मा में नहीं; वह तो
अभय सत्ता है। भ्रमरूपी भीष्म यदि विजयी होता है तो प्रकृति के जिस भयारण्य
में आप हैं उससे भी अधिक भय के आवरण में बाँध देगा। भय की एक परत
और बढ़ जायेगी, भय का आवरण घना हो उठेगा। यह भ्रम इसके अतिरिक्त
और कुछ नहीं दे सकेगा। अतः प्रकृति से निवृत्ति ही गन्तव्य का मार्ग है। संसार
में प्रवृत्ति तो भवाटवी है, घोर अन्धकार की छाया है। इसके आगे कौरवों की
कोई घोषणा नहीं है। कौरवों की ओर से कई बाजे एक साथ बजे; किन्तु कुल
मिलाकर वे भी भय ही प्रदान करते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं। प्रत्येक
विकार कुछ-न-कुछ भय तो देता ही है, इसलिये उन्होंने भी घोषणा की-
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।१३।।
तदनन्तर अनेक शंख, नगाड़े, ढोल और नरसिंघादि बाजे एक साथ ही
बजे। उनका शब्द भी बड़ा भयंकर हुआ। भय का संचार करने के अतिरिक्त
कौरवों की कोई घोषणा नहीं है। बहिर्मुखी विजातीय प्रवृत्ति सफल होने पर
मोहमयी बन्धन और घना कर देती है।
अब पुण्यमयी प्रवृत्तियों की ओर से घोषणाएँ हुईं, जिनमें पहली घोषणा
योगेश्वर श्रीकृष्ण की है-

प्रथम अध्याय ११
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥१४॥
इसके उपरान्त श्वेत घोड़ों से युक्त (जिनमें लेशमात्र कालिमा, दोष नहीं
है- श्वेत सात्त्विक, निर्मलता का प्रतीक है) ‘महति स्यन्दने’- महान् रथ पर
बैठे हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाये। अलौकिक
का अर्थ है, लोकों से परे। मृत्युलोक, देवलोक, ब्रह्मलोक, जहाँ तक जन्म-
मरण का भय है उन समस्त लोकों से परे पारलौकिक, पारमार्थिक स्थिति
प्रदान करने की घोषणा योगेश्वर श्रीकृष्ण की है। सोने, चाँदी या काठ का रथ
नहीं; रथ अलौकिक, शंख अलौकिक, अतः घोषणा भी अलौकिक ही है।
लोकों से परे एकमात्र ब्रह्म है, सीधा उससे सम्पर्क स्थापित कराने की घोषणा
है। वे कैसे यह स्थिति प्रदान करेंगे?-
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥१५॥
‘हृषीकेशः’- जो हृदय के सर्वज्ञाता हैं, उन श्रीकृष्ण ने ‘पाञ्चजन्य
शंख’ बजाया। पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को पंच तन्मात्राओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस,
गन्ध) के रसों से समेटकर अपने जन (भक्त) की श्रेणी में ढालने की घोषणा
की। विकराल रूप से बहकती हुई इन्द्रियों को समेटकर उन्हें अपने सेवक की
श्रेणी में खड़ा कर देना हृदय से प्रेरक सद्गुरु की देन है। श्रीकृष्ण एक योगेश्वर,
सद्गुरु थे। ‘शिष्यस्तेऽहम्’- भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ। बाह्य विषय-
वस्तुओं को छोड़कर ध्यान में इष्ट के अतिरिक्त दूसरा न देखें, दूसरा न सुनें, न
दूसरे का स्पर्श करें, यह सद्गुरु के अनुभव-संचार पर निर्भर करता है।
‘देवदत्तं धनञ्जयः’- दैवी सम्पत्ति को अधीन करनेवाला अनुराग ही
अर्जुन है। इष्ट के अनुरूप लगाव- जिसमें विरह, वैराग्य, अश्रुपात हो, ‘गदगद
गिरा नयन बह नीरा।’ (रामचरितमानस, ३/१५/११)- रोमांच हो, इष्ट
के अतिरिक्त अन्य विषय-वस्तु का लेशमात्र टकराव न होने पाये, उसी को
‘अनुराग’ कहते हैं। यदि यह सफल होता है तो परमदेव परमात्मा में प्रवेश
दिलानेवाली दैवी सम्पद् पर आधिपत्य प्राप्त कर लेता है। इसी का दूसरा नाम
धनंजय भी है। एक धन तो बाहरी सम्पत्ति है जिससे शरीर-निर्वाह की व्यवस्था

१२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
होती है, आत्मा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इससे परे स्थिर आत्मिक
सम्पत्ति ही निज सम्पत्ति है। बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को
यही समझाया कि धन से सम्पन्न पृथ्वी के स्वामित्व से भी अमृतत्व की प्राप्ति
नहीं हो सकती। उसका उपाय आत्मिक सम्पत्ति है।
भयानक कर्मवाले भीमसेन ने ‘पौण्ड्र’ अर्थात् प्रीति नामक महाशंख
बजाया। भाव का उद्गम और निवास-स्थान हृदय है, इसलिये इसका नाम
वृकोदर है। आपका भाव, लगाव बच्चे में होता है; किन्तु वस्तुतः वह लगाव
आपके हृदय में है जो बच्चे में जाकर मूर्त होता है। यह भाव अथाह और
महान् बलशाली है। उसने प्रीति नामक महाशंख बजाया। भाव में ही प्रीति
निहित है, इसीलिये भीम ने ‘पौण्ड्र’ (प्रीति) नामक महाशंख बजाया। भाव
महान् बलवान् है; किन्तु प्रीति-संचार के माध्यम से।
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
( रामचरितमानस, १/१८४/५)
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने ‘अनन्तविजय’ नामक शंख बजाया। कर्त्तव्यरूपी
कुन्ती और धर्मरूपी युधिष्ठिर। धर्म पर स्थिरता रहेगी तो ‘अनन्तविजयम्’-
अनन्त परमात्मा में स्थिति दिलायेगा। युद्धे स्थिरः सः युधिष्ठिरः। प्रकृति-पुरुष
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष में स्थिर रहता है, महान् दुःख से भी विचलित नहीं होता
तो एक दिन जो अनन्त है, जिसका अन्त नहीं है वह है परमतत्त्व परमात्मा,
उस पर विजय दिला देता है।
नियमरूपी नकुल ने ‘सुघोष’ नामक शंख बजाया। ज्यों-ज्यों नियम
उन्नत होगा, अशुभ का शमन होता जायेगा, शुभ घोषित होता जायेगा। सत्संगरूपी
सहदेव ने ‘मणिपुष्पक’ नामक शंख बजाया। मनीषियों ने प्रत्येक श्वास को
बहुमूल्य मणि की संज्ञा दी है- ‘हीरा जैसी स्वाँस बातों में बीती जाय।’
(‘बिन्दु’) एक सत्संग तो वह है जो आप सत्पुरुषों की वाणी से सुनते हैं;
किन्तु यथार्थ सत्संग आन्तरिक है। श्रीकृष्ण के अनुसार आत्मा ही सत्य है,
सनातन है। चित्त सब ओर से सिमटकर आत्मा की संगत करने लगे, यही

प्रथम अध्याय १३
वास्तविक सत्संग है। यह सत्संग चिन्तन, ध्यान और समाधि के अभ्यास से
सम्पन्न होता है। ज्यों-ज्यों सत्य के सान्निध्य में सुरत टिकती जायेगी, त्यों-त्यों
एक-एक श्वास पर नियंत्रण मिलता जायेगा, मनसहित इन्द्रियों का निरोध होता
जायेगा। जिस दिन सर्वथा निरोध होगा, वस्तु प्राप्त हो जायेगी। वाद्ययन्त्रों की
तरह चित्त का आत्मा के स्वर-में-स्वर मिलाकर संगत करना ही सत्संग है।
बाह्यमणि कठोर है, किन्तु श्वासमणि पुष्प से भी कोमल है। पुष्प तो
विकसित होने या टूटने पर कुम्हलाता है; किन्तु आप अगले श्वास तक
जीवित रहने की गारण्टी नहीं दे सकते। किन्तु सत्संग सफल होने पर प्रत्येक
श्वास पर नियंत्रण दिलाकर परम लक्ष्य की प्राप्ति करा देता है। इसके आगे
पाण्डवों की कोई घोषणा नहीं है; किन्तु प्रत्येक साधन कुछ-न-कुछ निर्मलता
के पथ में दूरी तय कराता है। आगे कहते हैं-
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।१७।।
कायारूपी काशी। पुरुष जब सब ओर से मनसहित इन्द्रियों को समेटकर
काया में ही केन्द्रित करता है, तो ‘परमेष्वासः’- परम ईश में वास का
अधिकारी हो जाता है। परम ईश में वास दिलाने में सक्षम काया ही काशी है।
काया में ही परम ईश का निवास है। ‘परमेष्वास’ का अर्थ श्रेष्ठ धनुषवाला नहीं
बल्कि परम+ईश+वास है।
शिखा-सूत्र का त्याग ही ‘शिखण्डी’ है। आजकल लोग सिर के बाल
कटा लेते हैं और सूत्र के नाम पर गले की जनेऊ हटा लेते हैं, अग्नि जलाना
छोड़ देते हैं, हो गया संन्यास उनका। नहीं, वस्तुतः शिखा लक्ष्य का प्रतीक है,
जिसे आपको पाना है और सूत्र है संस्कारों का। जब तक आगे परमात्मा को
पाना शेष है, पीछे संस्कारों का सूत्रपात लगा हुआ है, तब तक त्याग कैसा?
संन्यास कैसा? अभी तो चलनेवाले पथिक हैं। जब प्राप्तव्य प्राप्त हो जाय,
पीछे लगे हुए संस्कारों की डोर कट जाय, ऐसी अवस्था में भ्रम सर्वथा शान्त
हो जाता है। इसलिये शिखण्डी ही भ्रमरूपी भीष्म का विनाश करता है।
शिखण्डी चिन्तन-पथ की विशिष्ट योग्यता है, महारथी है।

१४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
‘धृष्टद्युम्नः’– दृढ़ और अचल मन तथा ‘विराटः’– सर्वत्र विराट् ईश्वर
का प्रसार देखने की क्षमता इत्यादि दैवी सम्पद् के प्रमुख गुण हैं। सात्त्विकता
ही सात्यकि है। सत्य के चिन्तन की प्रवृत्ति अर्थात् सात्त्विकता यदि बनी है तो
कभी गिरावट नहीं आने पायेगी। इस संघर्ष में पराजित नहीं होने देगी।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।१८।।
अचल पददायक द्रुपद और ध्यानरूपी द्रौपदी के पाँचों पुत्र– सहृदयता,
वात्सल्य, लावण्य, सौम्यता, स्थिरता इत्यादि साधन में महान् सहायक महारथी
हैं तथा बड़ी भुजावाला अभिमन्यु– इन सबने पृथक्-पृथक् शंख बजाये। भुजा
कार्य-क्षेत्र का प्रतीक है। जब मन भय से रहित हो जाता है तो उसकी पहुँच
दूर तक हो जाती है।
हे राजन्! इन सबने अलग-अलग शंख बजाये। कुछ-न-कुछ दूरी
सभी तय कराते हैं। इनका पालन आवश्यक है, इसलिये इनके नाम गिनाये।
इसके अतिरिक्त कुछ दूरी ऐसी भी है जो मन-बुद्धि से परे है, भगवान स्वयं ही
अन्तःकरण में विराजकर तय कराते हैं। इधर दृष्टि बनकर आत्मा से खड़े हो
जाते हैं और सामने स्वयं खड़े होकर अपना परिचय करा लेते हैं।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।।१९।।
उस घोर शब्द ने आकाश और पृथिवी को भी शब्दायमान करते हुए
धृतराष्ट्र-पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिये। सेना तो पाण्डवों की ओर भी थी,
किन्तु हृदय विदीर्ण हुए धृतराष्ट्र-पुत्रों के। वस्तुतः पाञ्चजन्य, दैवी शक्ति पर
आधिपत्य, अनन्त पर विजय, अशुभ का शमन और शुभ की घोषणा धारावाही
होने लगे तो कुरुक्षेत्र, आसुरी सम्पद्, बहिर्मुखी प्रवृत्तियों का हृदय विदीर्ण हो
जायेगा। उनका बल शनैः-शनैः क्षीण होने लगता है। सर्वथा सफलता मिलने
पर मोहमयी प्रवृत्तियाँ सर्वथा शान्त हो जाती हैं।
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।२०।।
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।