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सर्वकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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पृष्ठ 47

१२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
होती है, आत्मा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इससे परे स्थिर आत्मिक
सम्पत्ति ही निज सम्पत्ति है। बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को
यही समझाया कि धन से सम्पन्न पृथ्वी के स्वामित्व से भी अमृतत्व की प्राप्ति
नहीं हो सकती। उसका उपाय आत्मिक सम्पत्ति है।
भयानक कर्मवाले भीमसेन ने ‘पौण्ड्र’ अर्थात् प्रीति नामक महाशंख
बजाया। भाव का उद्गम और निवास-स्थान हृदय है, इसलिये इसका नाम
वृकोदर है। आपका भाव, लगाव बच्चे में होता है; किन्तु वस्तुतः वह लगाव
आपके हृदय में है जो बच्चे में जाकर मूर्त होता है। यह भाव अथाह और
महान् बलशाली है। उसने प्रीति नामक महाशंख बजाया। भाव में ही प्रीति
निहित है, इसीलिये भीम ने ‘पौण्ड्र’ (प्रीति) नामक महाशंख बजाया। भाव
महान् बलवान् है; किन्तु प्रीति-संचार के माध्यम से।
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
( रामचरितमानस, १/१८४/५)
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने ‘अनन्तविजय’ नामक शंख बजाया। कर्त्तव्यरूपी
कुन्ती और धर्मरूपी युधिष्ठिर। धर्म पर स्थिरता रहेगी तो ‘अनन्तविजयम्’-
अनन्त परमात्मा में स्थिति दिलायेगा। युद्धे स्थिरः सः युधिष्ठिरः। प्रकृति-पुरुष
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संघर्ष में स्थिर रहता है, महान् दुःख से भी विचलित नहीं होता
तो एक दिन जो अनन्त है, जिसका अन्त नहीं है वह है परमतत्त्व परमात्मा,
उस पर विजय दिला देता है।
नियमरूपी नकुल ने ‘सुघोष’ नामक शंख बजाया। ज्यों-ज्यों नियम
उन्नत होगा, अशुभ का शमन होता जायेगा, शुभ घोषित होता जायेगा। सत्संगरूपी
सहदेव ने ‘मणिपुष्पक’ नामक शंख बजाया। मनीषियों ने प्रत्येक श्वास को
बहुमूल्य मणि की संज्ञा दी है- ‘हीरा जैसी स्वाँस बातों में बीती जाय।’
(‘बिन्दु’) एक सत्संग तो वह है जो आप सत्पुरुषों की वाणी से सुनते हैं;
किन्तु यथार्थ सत्संग आन्तरिक है। श्रीकृष्ण के अनुसार आत्मा ही सत्य है,
सनातन है। चित्त सब ओर से सिमटकर आत्मा की संगत करने लगे, यही