यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
है कि भीष्म कौन-सी सत्ता है, जिस पर कौरव निर्भर करते हैं तथा भीम
कौन-सी सत्ता है, जिस पर (दैवी सम्पद्) सम्पूर्ण पाण्डव निर्भर हैं। दुर्योधन
अपनी व्यवस्था देता है कि-
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।।११।।
इसलिये सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग
सब-के-सब भीष्म की ही सब ओर से रक्षा करें। यदि भीष्म जीवित हैं तो हम
अजेय हैं। इसलिये आप पाण्डवों से न लड़कर केवल भीष्म की ही रक्षा करें।
कैसा योद्धा है भीष्म, जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर पा रहा है, कौरवों
को उसकी रक्षा-व्यवस्था करनी पड़ रही है? यह कोई बाह्य योद्धा नहीं, भ्रम
ही भीष्म है। जब तक भ्रम जीवित है, तब तक विजातीय प्रवृत्तियाँ (कौरव)
अजेय हैं। अजेय का यह अर्थ नहीं कि जिसे जीता ही न जा सके; बल्कि
अजेय का अर्थ दुर्जय है, जिसे कठिनाई से जीता जा सकता हो।
महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।।
(रामचरितमानस, ६/८० क)
यदि भ्रम समाप्त हो जाय तो अविद्या अस्तित्वहीन हो जाय। मोह
इत्यादि जो आंशिक रूप से बचे भी हैं, शीघ्र ही समाप्त हो जायेंगे। भीष्म की
इच्छा-मृत्यु थी। इच्छा ही भ्रम है। इच्छा का अन्त और भ्रम का मिटना एक
ही बात है। इसी को सन्त कबीर ने सरलता से कहा-
इच्छा काया इच्छा माया, इच्छा जग उपजाया।
कह कबीर जे इच्छा विवर्जित, ताका पार न पाया।।
जहाँ भ्रम नहीं होता, वह अपार और अव्यक्त है। इस शरीर के जन्म का
कारण इच्छा है। इच्छा ही माया है और इच्छा ही जगत् की उत्पत्ति का कारण
है। [‘सोऽकामयत।’ (तैत्तिरीय उप०, ब्रह्मानन्द बल्ली अनुवाक् ६ ),
‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति।’ (छान्दोग्य उप०, ६/२/३)] कबीर
कहते हैं- जो इच्छाओं से सर्वथा रहित हैं, ‘ताका पार न पाया’- वे अपार,
अनन्त, असीम तत्त्व में प्रवेश पा जाते हैं। [‘योऽकामो निष्काम आप्तकाम