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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

प्राचीनकाल से लेकर अद्यतन मनीषियों द्वारा दिये गये
तैथिक क्रमानुसार सन्देश
श्री परमहंस आश्रम जगतानन्द, ग्रा०पो०-बरैनी, कछवा, जिला-मिर्जापुर (उ०प्र०)
में अपने निवास की अवधि में स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी ने प्रवेश-द्वार के पास इस
तालिका को गंगा दशहरा (१९९३ ई०) के पावन पर्व पर बोर्ड पर अंकित कराया।
।। विश्वगुरु भारत ।।
• सृष्टि का आदिशास्त्र-
‘इमं विवस्वते योगम्’ (गीता, ४/१) भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- इस
अविनाशी योग को मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे स्वयंभू आदिमनु
से कहा। जिसके अनुसार एक परमात्मा ही सत्य है, परमतत्त्व है; वह कण-
कण में व्याप्त है। योग-साधना के द्वारा वह परमात्मा दर्शन, स्पर्श और प्रवेश
के लिये सुलभ है। भगवान द्वारा उपदिष्ट वह आदिज्ञान वैदिक ऋषियों से
लेकर अद्यावधि अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित है।
• वैदिक ऋषि (अनादिकाल-नारायण सूक्त)-
कण-कण में व्याप्त ब्रह्म ही सत्य है। उसे विदित करने के अतिरिक्त मुक्ति का
कोई अन्य उपाय नहीं है।
• भगवान श्रीराम (त्रेता-लाखों वर्ष पूर्व-रामायण)-
एक परमात्मा के भजन के बिना जो कल्याण चाहता है, वह मूढ़ है।
• योगेश्वर श्रीकृष्ण (५००० वर्ष पूर्व-गीता)-
परमात्मा ही सत्य है। चिन्तन की पूर्ति में उस सनातन ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव
है। देवी-देवताओं की पूजा मूढ़बुद्धि की देन है।
• महात्मा मूसा (३००० वर्ष पूर्व-यहूदी धर्म)-
तुमने ईश्वर से श्रद्धा हटायी, मूर्ति बनायी- इससे ईश्वर नाराज है। प्रार्थना में
लग जाओ।
• महात्मा जरथुस्त्र (२७०० वर्ष पूर्व-पारसी धर्म)-
अहूर-मज्दा (ईश्वर) की उपासना द्वारा हृदय में स्थित विकारों को नष्ट करो,
जो दुःख के कारण हैं।

• भगवान महावीर ( २६०० वर्ष पूर्व-जैनग्रन्थ )-
आत्मा ही सत्य है। कठोर तपस्या से इसी जन्म में जाना जा सकता है।
• गौतम बुद्ध ( २५०० वर्ष पूर्व-महापरिनिब्बान सुत्त )-
मैंने उस अविनाशी पद को प्राप्त किया है, जिसे पूर्व महर्षियों ने प्राप्त किया
था। यही मोक्ष है।
• मसीह ईसा ( २००० वर्ष पूर्व-ईसाई धर्म )-
ईश्वर प्रार्थना से प्राप्त होता है। मेरे अर्थात् सद्गुरु के पास आओ, इसलिये
कि ईश्वर के पुत्र कहलाओगे।
• हज़रत मुहम्मद सलल्लाहु. ( १४०० वर्ष पूर्व-इस्लाम धर्म )-
‘ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मदुर्र रसूलल्लाह’- जर्रे-जर्रे में व्याप्त खुदा (ईश्वर)
के सिवाय कोई पूजनीय नहीं है। मुहम्मद अल्लाह के सन्देशवाहक हैं।
• आदि शंकराचार्य ( १२०० वर्ष पूर्व )-
जगत् मिथ्या है। इसमें सत्य है केवल हरि और उनका नाम।
• सन्त कबीर ( ६०० वर्ष पूर्व )-
राम नाम अति दुर्लभ, औरे ते नहिं काम।
आदि अन्त औ युग-युग, रामहि ते संग्राम।।
राम से संघर्ष करो, वही कल्याणकारी हैं।
• गुरु नानक ( ५०० वर्ष पूर्व )-
‘एक ओंकार सतगुरु प्रसादि।’ एक ओंकार ही सत्य है; किन्तु वह सद्गुरु की
कृपा का प्रसाद है।
• स्वामी दयानन्द सरस्वती ( २०० वर्ष पूर्व )-
अजर, अमर, अविनाशी एक परमात्मा की उपासना करें। उस ईश्वर का मुख्य
नाम ओम् है।
• स्वामी श्री परमानन्द जी ( सन् १९११-१९६९ ई० )-
भगवान जब कृपा करते हैं तो शत्रु मित्र हो जाते हैं, विपत्ति सम्पत्ति हो जाती
है। भगवान सर्वत्र से देखते हैं।
।। ॐ ।।

अनुक्रमणिका
विषय पृष्ठ संख्या
प्राक्कथन .................................................... क - ङ
प्रथम अध्याय (संशय-विषाद योग) ................................ १-२४
द्वितीय अध्याय (कर्म-जिज्ञासा) .................................... २५-६६
तृतीय अध्याय (शत्रुविनाश-प्रेरणा) ................................. ६७-९४
चतुर्थ अध्याय (यज्ञकर्म स्पष्टीकरण) ............................... ९५-१२८
पञ्चम अध्याय (यज्ञभोक्ता महापुरुषस्थ महेश्वर) ............ १२९-१४२
षष्ठम अध्याय (अभ्यासयोग) .................................... १४३-१६२
सप्तम अध्याय (समग्र जानकारी) .................................. १६३-१७६
अष्टम अध्याय (अक्षर ब्रह्मयोग) ................................. १७७-१९४
नवम अध्याय (राजविद्या-जागृति) .............................. १९५-२१४
दशम अध्याय (विभूति-वर्णन) .................................... २१५-२३२
एकादश अध्याय (विश्वरूप-दर्शन योग) ........................... २३३-२५८
द्वादश अध्याय (भक्तियोग) ....................................... २५९-२६८
त्रयोदश अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) ........................ २६९-२८२
चतुर्दश अध्याय (गुणत्रय विभाग योग) ............................ २८३-२९४
पञ्चदश अध्याय (पुरुषोत्तम योग) ................................ २९५-३०६
षोडश अध्याय (दैवासुर सम्पद विभाग योग) ..................... ३०७-३१६
सप्तदश अध्याय (ॐतत्प्रत्य् व श्रद्धात्रय विभाग योग) ......... ३१७-३३०
अष्टादश अध्याय (संन्यास योग) ................................ ३३१-३६२
उपशम ........................................................... ३६३-३८८
।। ॐ ।।

प्राक्कथन

प्राक्कथन
वस्तुतः गीता पर टीका लिखने की अब कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं
होती; क्योंकि इस पर सहस्रों टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं, जिनमें पचासों तो
केवल संस्कृत में ही हैं। गीता को लेकर पचासों मत हैं, जबकि सबकी
आधारशिला एकमात्र गीता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने तो कोई एक बात कही
होगी, फिर यह मतभेद क्यों? वस्तुतः वक्ता एक ही बात कहता है; किन्तु श्रोता
यदि दस बैठे हों तो दस प्रकार के आशय ग्रहण करते हैं। व्यक्ति की बुद्धि पर
तामसी, राजसी अथवा सात्त्विक गुणों का जितना प्रभाव है, उसी स्तर से उस
वार्त्ता को पकड़ पाता है। इससे आगे वह समझ नहीं पाता। अतः मतभेद
स्वाभाविक है।
विभिन्न मतवादों से, और कभी-कभी एक ही सिद्धान्त को अलग-
अलग काल और भाषाओं में व्यक्त करने से साधारण मनुष्य संशय में पड़
जाता है। बहुत-सी टीकाओं के बीच वह सत्यधारा भी प्रवाहित है; किन्तु शुद्ध
अर्थवाली एक टीका हजारों टीकाओं के बीच रख दी जाय तो उनमें यह
पहचानना कठिन हो जाता है कि यथार्थ कौन है? वर्तमानकाल में गीता की
बहुत-सी टीकाएँ हो गयी हैं, सभी अपनी-अपनी सत्यता का उद्घोष करती
हैं; किन्तु गीता के शुद्ध अर्थ से वे बहुत दूर हैं। निःसन्देह कुछ महापुरुषों ने
सत्य का स्पर्श भी किया; किन्तु कतिपय कारणों से वे उसे समाज के समक्ष
प्रस्तुत न कर सके।
श्रीकृष्ण के आशय को हृदयंगम न कर पाने का मूल कारण है कि वे
एक योगी थे। श्रीकृष्ण जिस स्तर की बात करते हैं, क्रमशः चलकर उसी स्तर
पर खड़ा होनेवाला कोई महापुरुष ही अक्षरशः बता सकेगा कि श्रीकृष्ण ने
जिस समय गीता का उपदेश दिया था, उस समय उनके मनोगत भाव क्या थे?
मनोगत समस्त भाव कहने में नहीं आते। कुछ तो कहने में आ पाते हैं, कुछ
भाव-भंगिमा से व्यक्त होते हैं और शेष पर्याप्त क्रियात्मक हैं, जिन्हें कोई
पथिक चलकर ही जान सकता है। जिस स्तर पर श्रीकृष्ण थे, क्रमशः चलकर

(ख) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
उसी अवस्था को प्राप्त महापुरुष ही जानता है कि गीता क्या कहती है। वह
गीता की पंक्तियाँ ही नहीं दुहराता, बल्कि उनके भावों को भी दर्शा देता है;
क्योंकि जो दृश्य श्रीकृष्ण के सामने था, वही उस वर्तमान महापुरुष के समक्ष
भी है। इसलिये वह देखता है, दिखा देगा; आपमें जागृत भी कर देगा, उस पथ
पर चला भी देगा।
'पूज्य श्री परमहंस जी महाराज' भी उसी स्तर के महापुरुष थे। उनकी
वाणी तथा अन्तःप्रेरणा से मुझे गीता का जो अर्थ मिला, उसी का संकलन
'यथार्थ गीता' है। इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। यह 'क्रियात्मक' है।
साधन अपनानेवाले प्रत्येक पुरुष को इसी परिधि से गुजरना होगा। जब तक
वह इससे अलग है, तब तक स्पष्ट है कि वह साधन नहीं करता, किसी-न-
किसी प्रकार की लकीर अवश्य पीटता है। अतः किसी महापुरुष की शरण लें।
श्रीकृष्ण ने किसी अन्य सत्य को नहीं बताया, बल्कि कहा- ‘ऋषिभिर्बहुधा
गीतम्'- ऋषियों ने अनेकों बार जिसका गायन किया है, वही कहने जा रहा
हूँ। उन्होंने यह नहीं कहा कि उस ज्ञान को केवल मैं ही जानता हूँ या मैं ही
बताऊँगा, बल्कि कहा- “किसी 'तत्त्वदर्शी' के पास जाओ। निष्कपट भाव से
सेवा करके उस ज्ञान को प्राप्त करो।” श्रीकृष्ण ने महापुरुषों द्वारा शोधित सत्य
को ही उद्घाटित किया है।
गीता सुबोध संस्कृत में है। यदि अन्वयार्थ ही लें तो गीता का अधिकांश
आप स्वयं हृदयंगम कर सकेंगे; किन्तु आप ज्यों-का-त्यों अर्थ नहीं लेते।
उदाहरण के लिये; श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि “यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है।”,
फिर भी आप कहते हैं कि खेती करना कर्म है। यज्ञ को स्पष्ट करते हुए उन्होंने
बताया कि यज्ञ में बहुत से योगीजन प्राण में अपान को हवन करते हैं, बहुत
से अपान में प्राण को हवन करते हैं, बहुत से योगी प्राण-अपान दोनों को
रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं। बहुत से योगी इन्द्रियों की सम्पूर्ण
प्रवृत्तियों को संयमाग्नि में हवन करते हैं। इस प्रकार श्वास-प्रश्वास का चिन्तन
यज्ञ है, मनसहित इन्द्रियों का संयम यज्ञ है। शास्त्रकार ने स्वयं यज्ञ बताया,
फिर भी आप कहते हैं कि विष्णु के निमित्त स्वाहा बोलना, अग्नि में जौ-तिल-
घी का हवन करना यज्ञ है। उन योगेश्वर ने ऐसा एक शब्द भी नहीं कहा।

प्राक्कथन (ग)
क्या कारण है कि आप समझ नहीं पाते? बाल की खाल निकालकर
रटने पर भी क्यों वाक्य-विन्यास ही आपके हाथ लगता है? आप अपने को
यथार्थ जानकारी से शून्य ही क्यों पाते हैं? वस्तुतः मनुष्य जन्म लेकर क्रमशः
बड़ा होता है तो पैतृक सम्पत्ति (घर, दूकान, जमीन-जायदाद, पद-प्रतिष्ठा,
गाय, भैंस, यन्त्र-उपकरण इत्यादि) उसे विरासत में मिलती है। ठीक इसी
प्रकार उसे कुछ रूढ़ियाँ, परम्पराएँ, पूजा-पद्धतियाँ भी विरासत में मिल जाती
हैं। तैंतीस करोड़ देवी-देवता तो भारत में बहुत पहले गिने गये थे, विश्व में
उनके अनगिनत रूप हैं। शिशु ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, अपने माता-पिता,
भाई-बहन, पास-पड़ोस में इनकी पूजा देखता है। परिवार में प्रचलित पूजा-
पद्धतियों की अमिट छाप उसके मस्तिष्क पर पड़ जाती है। देवी की पूजा
मिली तो जीवनभर देवी-देवी रटता है, परिवार में भूत-पूजा मिली तो भूत-
भूत रटता है। कोई शिव तो कोई कृष्ण, तो कोई कुछ पकड़े ही रहता है। उन्हें
वह छोड़ नहीं सकता।
ऐसे भ्रान्तपुरुष को गीता-जैसा कल्याणकारी शास्त्र मिल भी जाय तो
वह उसे नहीं समझ सकता। पैतृक सम्पदा को कदाचित् वह छोड़ भी सकता
है; किन्तु इन रूढ़ियों और मज़हबी पचड़ों को नहीं मिटा सकता। पैतृक
सम्पत्ति को हटाकर आप हजारों मील दूर जा सकते हैं; किन्तु दिल-दिमाग में
अंकित ये रूढ़िगत विचार वहाँ भी आपका पिण्ड नहीं छोड़ते। आप सिर
काटकर अलग तो रख नहीं सकते। अतः आप यथार्थ शास्त्र को भी उन्हीं
रूढ़ियों, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और पूजा-पद्धतियों के अनुरूप ढालकर
देखना चाहते हैं। यदि उनके अनुरूप बात ढलती है, वार्त्ता का क्रम बैठता है
तो आप उसे सही मानते हैं और नहीं ढलती तो गलत मानते हैं। इसीलिये आप
गीता का रहस्य नहीं देख पाते। गीता का रहस्य, रहस्य ही बनकर रह जाता है।
इसके वास्तविक पारखी सन्त अथवा सद्गुरु हैं। वही बता सकते हैं कि गीता
क्या कहती है? सब नहीं जान सकते। सबके लिये सुलभ उपाय यही है कि इसे
किसी महापुरुष के सान्निध्य में समझें, जिसके लिये श्रीकृष्ण ने बल दिया है।
गीता किसी विशिष्ट व्यक्ति, जाति, वर्ग, पंथ, देश-काल या किसी
रूढ़िग्रस्त सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह सार्वलौकिक, सार्वकालिक

(घ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
धर्मग्रन्थ है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति तथा प्रत्येक स्तर के प्रत्येक स्त्री-
पुरुष के लिये, सबके लिये है। केवल दूसरों से सुनकर या किसी से प्रभावित
होकर मनुष्य को ऐसा निर्णय नहीं लेना चाहिये, जिसका प्रभाव सीधे उसके
अपने अस्तित्व पर पड़ता हो। पूर्वाग्रह की भावना से मुक्त होकर सत्यान्वेषियों
के लिये यह आर्षग्रन्थ आलोक-स्तम्भ है। हिन्दुओं का आग्रह है कि वेद ही
प्रमाण है। वेद का अर्थ है ज्ञान, परमात्मा की जानकारी। परमात्मा न संस्कृत
में है न संहिताओं में। पुस्तक तो उसका संकेतमात्र है। वह वस्तुतः हृदय में
जागृत होता है।
विश्वामित्र चिन्तन कर रहे थे। उनकी भक्ति देखकर ब्रह्मा आये, बोले,
“आज से तुम ऋषि हो।” विश्वामित्र को सन्तोष नहीं हुआ, चिन्तन में लगे
रहे। कुछ काल पश्चात् देवताओं सहित ब्रह्मा पुनः आये और बोले- “आज
से तुम राजर्षि हो”; किन्तु विश्वामित्र का समाधान न हुआ। वे अनवरत
चिन्तन में लगे रहे। ब्रह्मा दैवी सम्पदाओं के साथ पुनः आये और बताया कि
आज से तुम महर्षि हुए। विश्वामित्र ने कहा, “नहीं, मुझे जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि
कहें।” ब्रह्मा ने कहा, “अभी तुम जितेन्द्रिय नहीं हो।” विश्वामित्र पुनः तपस्या
में लग गये। उनके मस्तिष्क से तपस्या की आभा निकलने लगी, तब देवताओं
ने ब्रह्मा से निवेदन किया। ब्रह्मा उसी प्रकार विश्वामित्र से बोले, “अब तुम
ब्रह्मर्षि हो।” विश्वामित्र ने कहा, “यदि मैं ब्रह्मर्षि हूँ तो वेद हमारा वरण करे।”
वेद विश्वामित्र के हृदय में उतर आया। जो तत्त्व विदित नहीं था, विदित हो
गया। यही वेद है, न कि पोथी। जहाँ विश्वामित्र रहते थे, वहाँ वेद रहता था।
यही श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि “संसार अविनाशी पीपल का वृक्ष है।
ऊपर परमात्मा जिसका मूल और नीचे प्रकृतिपर्यन्त शाखाएँ हैं। जो इस प्रकृति
का अन्त करके परमात्मा को विदित कर लेता है, वह वेदवित् है। अर्जुन! मैं
भी वेदवित् हूँ।” अतः प्रकृति के प्रसार और अन्त के साथ परमात्मा की
अनुभूति का नाम ‘वेद’ है। यह अनुभूति ईश्वरप्रदत्त है, इसलिये वेद को
अपौरुषेय कहा जाता है। महापुरुष अपौरुषेय होते हैं। उनके माध्यम से परमात्मा
ही बोलता है। वे परमात्मा के सन्देश-प्रसारक (ट्रांसमीटर) हो जाते हैं।
केवल शब्द-ज्ञान के आधार पर उनकी वाणी में निहित यथार्थ को परखा नहीं

प्राक्कथन (ङ)
जा सकता। उन्हें वही जान पाता है जिसने क्रियात्मक पथ से चलकर इस
अपौरुषेय (Non-Person) स्थिति को पाया हो, जिसका पुरुष (अहं) परमात्मा
में विलीन हो चुका हो।
वस्तुतः वेद अपौरुषेय है; किन्तु बोलनेवाले सौ-डेढ़ सौ महापुरुष ही
थे। उन्हीं की वाणी का संकलन 'वेद' कहलाता है। किन्तु जब शास्त्र लिखने में
आ जाता है तो सामाजिक व्यवस्था के नियम भी उसके साथ लिख दिये जाते
हैं। महापुरुष के नाम पर जनता उनका भी पालन करने लगती है, यद्यपि धर्म
से उनका दूर का भी सम्बन्ध नहीं रहता। आधुनिक युग में मन्त्रियों के आगे-
पीछे घूमकर साधारण नेता भी अधिकारियों से अपना काम करा लेते हैं,
जबकि मन्त्री ऐसे नेताओं को जानते भी नहीं। इसी प्रकार सामाजिक व्यवस्थाकार
महापुरुष की ओट में जीने-खाने की व्यवस्था भी ग्रन्थों में लिपिबद्ध कर देते
हैं। उनका सामाजिक उपयोग तत्सामयिक ही होता है। वेदों के सम्बन्ध में भी
यही है। वेद के दो भाग हैं- कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। कर्मकाण्ड समाजशास्त्र
है, जैसे- वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद इत्यादि। ज्ञानकाण्ड उपनिषद्
हैं, उनका भी मूल योगेश्वर श्रीकृष्ण की प्रथम वाणी 'गीता' है। सारांशत
'गीता' अपौरुषेय परमात्मा से समुद्भूत उपनिषद्-सुधा का सार-सर्वस्व है।
इसी प्रकार प्रत्येक महापुरुष, जो परमतत्त्व को प्राप्त कर लेता है, स्वयं
में धर्मग्रन्थ है। उसकी वाणी का संकलन विश्व में कहीं भी हो, शास्त्र कहलाता
है; किन्तु कतिपय धर्मावलम्बियों का यह कथन है कि- "जितना कुरान में
लिखा है उतना ही सच है। अब कुरान नहीं उतरेगा।", "ईसा मसीह पर
विश्वास किये बिना स्वर्ग नहीं मिल सकता। वह ईश्वर का इकलौता बेटा
था।", "अब ऐसा महापुरुष नहीं हो सकता।" - उनकी रूढ़िवादिता है। यदि
उसी तत्त्व को साक्षात् कर लिया जाय तो वही बात फिर होगी।
गीता सार्वभौम है। धर्म के नाम पर प्रचलित विश्व के समस्त धर्मग्रन्थों
में गीता का स्थान अद्वितीय है। यह स्वयं में धर्मशास्त्र ही नहीं, बल्कि अन्य
धर्मग्रन्थों में निहित सत्य का मानदण्ड भी है। गीता वह कसौटी है, जिस पर
प्रत्येक धर्मग्रन्थ में अनुस्यूत सत्य अनावृत्त हो उठता है, परस्पर विरोधी

(च) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
कथनों का समाधान निकल आता है। प्रत्येक धर्मग्रन्थ में संसार में जीने-खाने
की कला और कर्मकाण्डों का बाहुल्य है। जीवन को आकर्षक बनाने के लिये
उन्हें करने तथा न करने के रोचक और भयानक वर्णनों से धर्मग्रन्थ भरे पड़े
हैं। कर्मकाण्डों की इसी परम्परा को जनता धर्म समझने लगती है। जीवन-
निर्वाह की कला के लिये निर्मित पूजा-पद्धतियों में देश-काल और परिस्थितियों
के अनुसार परिवर्तन स्वाभाविक है। धर्म के नाम पर समाज में कलह का यही
एकमात्र कारण है। 'गीता' इन क्षणिक व्यवस्थाओं से ऊपर उठकर आत्मिकपूर्णता
में प्रतिष्ठित करने का क्रियात्मक अनुशीलन है, जिसका एक भी श्लोक भौतिक
जीवनयापन के लिये नहीं है। इसका प्रत्येक श्लोक आपसे आन्तरिक युद्ध
‘आराधना’ की माँग करता है। तथाकथित धर्मग्रन्थों की भाँति यह आपको
स्वर्ग या नरक के द्वन्द्व में फँसाकर नहीं छोड़ता, बल्कि उस अमरत्व की
उपलब्धि कराता है जिसके पीछे जन्म-मृत्यु का बन्धन नहीं रह जाता।
प्रत्येक महापुरुष की अपनी शैली और कुछ अपने विशिष्ट शब्द होते हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी गीता में 'कर्म', 'यज्ञ', 'वर्ण', 'वर्णसंकर', 'युद्ध',
'क्षेत्र', 'ज्ञान' इत्यादि शब्दों पर बार-बार बल दिया है। इन शब्दों का अपना
आशय है और पुनरावृत्ति में भी इनका अपना सौन्दर्य है। हिन्दी रूपान्तरण में
इन शब्दों को उसी आशय में लिया गया है तथा आवश्यक स्थलों की व्याख्या
भी की गयी है। गीता के आकर्षण निम्नलिखित प्रश्न हैं, जिनका आशय
आधुनिक समाज खो चुका है। वे इस प्रकार हैं, जिन्हें 'यथार्थ गीता' में आप
पायेंगे-
१. श्रीकृष्ण- एक योगेश्वर थे।
२. सत्य- आत्मा ही 'सत्य' है।
३. सनातन- आत्मा सनातन है, परमात्मा 'सनातन' है।
४. सनातन-धर्म- परमात्मा से मिलानेवाली क्रिया है।
५. युद्ध- दैवी एवं आसुरी सम्पदाओं का संघर्ष 'युद्ध' है। ये अन्तःकरण
की दो प्रवृत्तियाँ हैं। इन दोनों का मिटना परिणाम है।

प्राक्कथन (छ)
६. युद्ध-स्थान- यह मानव-शरीर और मनसहित इन्द्रियों का समूह
'युद्धस्थल' है।
७. ज्ञान- परमात्मा की प्रत्यक्ष जानकारी 'ज्ञान' है।
८. योग- संसार के संयोग-वियोग से रहित अव्यक्त ब्रह्म के मिलन का
नाम 'योग' है।
९. ज्ञानयोग- आराधना ही कर्म है। अपने पर निर्भर होकर कर्म में प्रवृत्त
होना 'ज्ञानयोग' है।
१०. निष्काम कर्मयोग- इष्ट पर निर्भर होकर समर्पण के साथ कर्म में प्रवृत्त
होना 'निष्काम कर्मयोग' है।
११. श्रीकृष्ण ने किस सत्य को बताया?- श्रीकृष्ण ने उसी सत्य को
बताया, जिसको तत्त्वदर्शियों ने पहले देख लिया था और आगे भी
देखेंगे।
१२. यज्ञ- साधना की विधि-विशेष का नाम 'यज्ञ' है।
१३. कर्म- यज्ञ को कार्यरूप देना ही 'कर्म' है।
१४. वर्ण- आराधना की एक ही विधि, जिसका नाम कर्म है। जिसको चार
श्रेणियों में बाँटा है, वही चार वर्ण हैं। यह एक ही साधक का ऊँचा-
नीचा स्तर है, न कि जाति।
१५. वर्णसंकर- परमात्म-पथ से च्युत होना, साधन में भ्रम उत्पन्न हो जाना
'वर्णसंकर' है।
१६. मनुष्य की श्रेणी- अन्तःकरण के स्वभाव के अनुसार मनुष्य दो प्रकार
का होता है- एक देवताओं-जैसा, दूसरा असुरों-जैसा। यही मनुष्य की
दो जातियाँ हैं, जो स्वभाव द्वारा निर्धारित हैं और यह स्वभाव घटता-
बढ़ता रहता है।
१७. देवता- हृदय-देश में परमदेव का देवत्व अर्जित करानेवाले गुणों का
समूह है। बाह्य देवताओं की पूजा मूढ़बुद्धि की देन है।

(ज) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
१८. अवतार- व्यक्ति के हृदय में होता है, बाहर नहीं।
१९. विराट् दर्शन- योगी के हृदय में ईश्वर के द्वारा दी गयी अनुभूति है।
भगवान साधक में दृष्टि बनकर खड़े हों, तभी दिखायी पड़ते हैं।
२०. पूजनीय देव ‘इष्ट’- एकमात्र परात्पर ब्रह्म ही ‘पूजनीय देव’ है। उसे
खोजने का स्थान हृदय-देश है। उसकी प्राप्ति का स्रोत उसी अव्यक्त
स्वरूप में स्थित ‘प्राप्तिवाले महापुरुष’ के द्वारा है।
अब इनमें से योगेश्वर श्रीकृष्ण का स्वरूप समझने के लिये अध्याय
तीन तक आपको पढ़ना होगा, और अध्याय तेरह तक आप स्पष्ट समझने
लगेंगे कि श्रीकृष्ण योगी थे। अध्याय दो से ही सत्य निखर जायेगा। सनातन
और सत्य एक दूसरे के पूरक हैं, यह अध्याय दो से ही स्पष्ट होगा, वैसे
पूर्तिपर्यन्त चलेगा। युद्ध अध्याय चार तक स्पष्ट होने लगेगा, ग्यारह तक संशय
निर्मूल हो जायेगा; वैसे अध्याय सोलह तक देखना चाहिये। ‘युद्धस्थल’ के
लिए अध्याय तेरह बार- बार देखें।
‘ज्ञान’ अध्याय चार से स्पष्ट होगा तथा अध्याय तेरह में भली प्रकार
समझ में आयेगा कि प्रत्यक्ष दर्शन का नाम ‘ज्ञान’ है। ‘योग’ अध्याय छः तक
आप समझ सकेंगे, वैसे पूर्तिपर्यन्त योग के विभिन्न अंशों की परिभाषा है।
‘ज्ञानयोग’ अध्याय तीन से छः तक स्पष्ट हो जायेगा, आगे देखने की कोई
विशेष आवश्यकता नहीं है। ‘निष्काम कर्मयोग’ अध्याय दो से आरम्भ होकर
पूर्तिपर्यन्त है। ‘यज्ञ’ आप अध्याय तीन से चार तक पढ़ें, स्पष्ट हो जायेगा।
‘कर्म’ का नाम अध्याय २/३९ में प्रथम बार लिया गया है। इसी श्लोक
से अध्याय चार तक पढ़ लें तो स्पष्ट हो जायेगा कि कर्म का अर्थ आराधना,
भजन क्यों है? अध्याय सोलह और सत्रह यह विचार स्थिर कर देता है कि
यही सत्य है। ‘वर्णसंकर’ अध्याय तीन में और ‘अवतार’ अध्याय चार में स्पष्ट
हो जायेगा। ‘वर्ण-व्यवस्था’ के लिये अध्याय अठारह देखना होगा, वैसे संकेत
अध्याय तीन और चार में भी है। मनुष्य की देवासुर जातियों के लिये अध्याय
सोलह द्रष्टव्य है। ‘विराट् दर्शन’ अध्याय दस से ग्यारह तक स्पष्ट हो गया है।
अध्याय सात, नौ और पन्द्रह में भी इस पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय

प्राक्कथन (झ)
सात, नौ और सत्रह में बाह्य देवताओं की अस्तित्वहीनता स्पष्ट हो जाती है।
परमात्मा के पूजन की स्थली हृदय-देश ही है, जिसमें ध्यान, श्वास-प्रश्वास
के चिन्तन इत्यादि की क्रियाएँ, जो एकान्त में बैठकर (मन्दिर-मूर्ति के सामने
नहीं) की जाती हैं-अध्याय तीन, चार, छः और अठारह में स्पष्ट है। बहुत
सोचने-विचारने से क्या प्रयोजन है, यदि अध्याय छः तक ही अध्ययन कर लें
तो भी ‘यथार्थ गीता’ का मूल आशय आपकी समझ में आ जायेगा।
गीता जीविका-संग्राम का साधन नहीं अपितु जीवन-संग्राम में शाश्वत
विजय का क्रियात्मक प्रशिक्षण है इसलिये युद्ध-ग्रन्थ है, जो वास्तविक विजय
दिलाता है; किन्तु गीतोक्त युद्ध तलवार, धनुष, बाण, गदा और फरसे से लड़ा
जानेवाला सांसारिक युद्ध नहीं है और न इन युद्धों में शाश्वत विजय निहित है।
यह सदसत् प्रवृत्तियों का संघर्ष है, जिनके रूपकात्मक वर्णन की परम्परा रही
है। वेद में इन्द्र और वृत्र, विद्या और अविद्या, पुराणों में देवासुर संग्राम,
महाकाव्यों में राम और रावण, कौरव एवं पाण्डवों के संघर्ष को ही गीता में
धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र, दैवी सम्पद् एवं आसुरी सम्पद्, सजातीय एवं विजातीय,
सद्गुण एवं दुर्गुणों का संघर्ष कहा गया है।
यह संघर्ष जहाँ होता है, वह स्थान कहाँ है? गीता का धर्मक्षेत्र और
कुरुक्षेत्र भारत का कोई भू-खण्ड नहीं, बल्कि स्वयं गीताकार के शब्दों में-
‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’- कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र
है, जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्काररूप से सदैव उगता है।
दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पाँचों विकार और तीनों गुणों का
विकार इस क्षेत्र का विस्तार है। प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से विवश
होकर मनुष्य को कर्म करना पड़ता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना
नहीं रह सकता। ‘पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननी जठरे
शयनम्’ जन्म-जन्मान्तरों से करते ही तो बीत रहा है। यही कुरुक्षेत्र है।
सद्गुरु के माध्यम से साधना के सही दौर में पड़कर साधक जब परमधर्म
परमात्मा की ओर अग्रसर होता है, तब यह क्षेत्र धर्मक्षेत्र बन जाता है। यह
शरीर ही क्षेत्र है।

(ञ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इसी शरीर के अन्तराल में अन्तःकरण की दो प्रवृत्तियाँ पुरातन हैं- दैवी
सम्पद् और आसुरी सम्पद्। दैवी सम्पद् में हैं- पुण्यरूपी पाण्डु और कर्त्तव्यरूपी
कुन्ती। पुण्य जागृत होने से पहले मनुष्य जो कुछ भी कर्त्तव्य समझकर करता
है, अपनी समझ से वह कर्त्तव्य ही करता है; किन्तु उससे कर्त्तव्य होता नहीं-
क्योंकि पुण्य के बिना कर्त्तव्य को समझा ही नहीं जा सकता। कुन्ती ने पाण्डु
से सम्बन्ध होने से पूर्व जो कुछ भी अर्जित किया, वह था 'कर्ण'। आजीवन
कुन्ती के पुत्रों से लड़ता रह गया। पाण्डवों का दुर्धर्ष शत्रु यदि कोई था, तो वह
था 'कर्ण'। विजातीय कर्म ही कर्ण है जो बन्धनकारी है, जिससे परम्परागत
रूढ़ियों का चित्रण होता है- पूजा-पद्धतियाँ पिण्ड नहीं छोड़तीं। पुण्य जागृत
होने पर धर्मरूपी 'युधिष्ठिर', अनुरागरूपी 'अर्जुन', भावरूपी 'भीम', नियमरूपी
'नकुल', सत्संगरूपी 'सहदेव', सात्त्विकतारूपी 'सात्यकि', काया में सामर्थ्यरूपी
'काशिराज', कर्त्तव्य के द्वारा भव पर विजय 'कुन्तिभोज' इत्यादि इष्टोन्मुखी
मानसिक प्रवृत्तियों का उत्कर्ष होता है, जिनकी गणना सात अक्षौहिणी है।
'अक्ष' दृष्टि को कहते हैं। सत्यमयी दृष्टिकोण से जिसका गठन है, वह है दैवी
सम्पद्। परमधर्म परमात्मा तक की दूरी तय करानेवाली ये सात सीढ़ियाँ 'सात
भूमिकाएँ' हैं, न कि कोई गणना-विशेष। वस्तुतः ये प्रवृत्तियाँ अनन्त हैं।
दूसरी ओर है 'कुरुक्षेत्र', जिसमें दस इन्द्रियाँ और एक मन ग्यारह
अक्षौहिणी सेना है। मनसहित इन्द्रियमयी दृष्टिकोण से जिसका गठन है, वह है
आसुरी सम्पद्। जिसमें हैं अज्ञानरूपी 'धृतराष्ट्र' जो सत्य जानते हुए भी अन्धा
बना रहता है, उसकी सहचारिणी है 'गान्धारी'- इन्द्रिय आधारवाली प्रवृत्ति।
इनके साथ हैं- मोहरूपी 'दुर्योधन', दुर्बुद्धिरूपी 'दुःशासन', विजातीय कर्मरूपी
'कर्ण', भ्रमरूपी 'भीष्म', द्वैत के आचरणरूपी 'द्रोणाचार्य', आसक्तिरूपी
'अश्वत्थामा', विकल्परूपी 'विकर्ण', अधूरी साधना में कृपा के आचरणरूपी
'कृपाचार्य' और इन सबके बीच जीवरूपी विदुर है, जो रहता है अज्ञान में
किन्तु दृष्टि सदैव पाण्डवों पर है, पुण्य से प्रवाहित प्रवृत्ति पर है; क्योंकि आत्मा
परमात्मा का शुद्ध अंश है। इस प्रकार आसुरी सम्पद् भी अनन्त है। क्षेत्र एक
ही है- यह शरीर, इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं। एक प्रकृति में विश्वास
दिलाती है, नीच-अधम योनियों का कारण बनती है, तो दूसरी परमपुरुष

प्राक्कथन (ट)
परमात्मा में विश्वास और प्रवेश दिलाती है। तत्त्वदर्शी महापुरुष के संरक्षण में
क्रमशः साधन करने पर दैवी सम्पद् का उत्कर्ष और आसुरी सम्पद् का सर्वथा
शमन हो जाता है। जब कोई विकार ही नहीं रहा, मन का सर्वथा निरोध और
निरुद्ध मन का भी विलय हो जाता है तो दैवी सम्पद् की आवश्यकता समाप्त
हो जाती है। अर्जुन ने देखा कि कौरव-पक्ष के अनन्तर पाण्डव-पक्ष के योद्धा
भी योगेश्वर में समाहित हो रहे हैं। पूर्ति के साथ दैवी सम्पद् भी विलीन हो
जाती है, अन्तिम शाश्वत परिणाम निकल आता है। इसके पश्चात् महापुरुष
यदि कुछ करता है तो केवल अनुयायियों के मार्गदर्शन के लिये ही करता है।
लोकसंग्रह की इसी भावना से महापुरुषों ने सूक्ष्म मनोभावों का वर्णन
उन्हें ठोस स्थूलरूप देकर किया है। 'गीता' छन्दोबद्व है, व्याकरणसम्मत है;
किन्तु इसके पात्र प्रतीकात्मक हैं, अमूर्त योग्यताओं के मूर्तरूप मात्र हैं। गीता
के आरम्भ में तीस-चालीस पात्रों का नाम लिया गया है जिनमें आधे सजातीय
हैं, आधे विजातीय; कुछ पाण्डव-पक्ष के हैं, कुछ कौरव-पक्ष के। 'विश्वरूप
दर्शन' के समय इनमें से चार-छः नाम पुनः आये हैं, अन्यथा सम्पूर्ण गीता में
इन नामों की चर्चा तक नहीं है। एकमात्र अर्जुन ही ऐसा पात्र है, जो आरम्भ
से अन्त तक योगेश्वर के समक्ष है। वह अर्जुन भी केवल योग्यता का प्रतीक
है, न कि व्यक्ति-विशेष। गीता के आरम्भ में अर्जुन सनातन कुलधर्म के लिए
विकल है; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इसे अज्ञान बताया और निर्देश दिया कि
आत्मा ही सनातन है, शरीर नाशवान् है, इसलिये युद्ध कर। इस आदेश से यह
स्पष्ट नहीं होता कि अर्जुन कौरवों को ही मारे। पाण्डव-पक्ष के भी शरीरधारी
ही तो थे, दोनों ओर सम्बन्धी ही तो थे। संस्कारों पर आधारित शरीर क्या
तलवार से काटने पर समाप्त हो सकेगा? जब शरीर नाशवान् है, जिसका
अस्तित्व है ही नहीं, तो अर्जुन कौन था? श्रीकृष्ण किसकी रक्षा में खड़े थे?
क्या किसी शरीरधारी की रक्षा में खड़े थे? श्रीकृष्ण ने कहा, "जो शरीर के
लिये परिश्रम करता है, वह पापायु मूढ़बुद्धि पुरुष व्यर्थ ही जीता है।" यदि
श्रीकृष्ण किसी शरीरधारी की रक्षा में खड़े हैं, तब तो वे भी मूढ़बुद्धि हैं, व्यर्थ
ही जीनेवाले हैं। वस्तुतः अनुराग ही अर्जुन है।

(ठ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
अनुरागी के लिये महापुरुष सदैव खड़े हैं। अर्जुन शिष्य था और श्रीकृष्ण
एक सद्गुरु थे। विनयावनत होकर उसने कहा- धर्म के मार्ग में मोहितचित्त मैं
आपसे पूछता हूँ, जो श्रेय (परम कल्याणकारी) हो, वह उपदेश मेरे प्रति
कहिये। अर्जुन श्रेय चाहता था, प्रेय (भौतिक पदार्थ) नहीं। केवल कहिये ही
नहीं, साधिये-सँभालिये। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ। इसी प्रकार
गीता में स्थान-स्थान पर स्पष्ट है कि अर्जुन आर्त अधिकारी है और योगेश्वर
श्रीकृष्ण एक सद्गुरु हैं। वे सद्गुरु अनुरागी के साथ सदैव रहते हैं, उनका
मार्गदर्शन करते हैं।
जब भावुकतावश कोई व्यक्ति 'पूज्य महाराज जी' के पास रहने का
आग्रह करने लगता था, तब वे कहा करते थे- "जाओ, शरीर से कहीं रहो,
मन से मेरे पास आते रहो। प्रातः-सायं राम, शिव, ॐ किसी एक दो-ढाई
अक्षर के नाम का जाप करो और मेरे स्वरूप का हृदय में ध्यान धरो। एक
मिनट भी स्वरूप पकड़ लोगे तो जिसका नाम भजन है वह मैं तुम्हें दूँगा।
इससे अधिक पकड़ने लगोगे तो हृदय से रथी बनकर सदैव तुम्हारे साथ
रहूँगा।" जब सुरत पकड़ में आ जाती है तो इसके बाद महापुरुष इतना ही पास
में रहते हैं जितना हाथ-पाँव, नाक-कान इत्यादि आपके पास हैं। आप हजारों
किलोमीटर दूर क्यों न हों, वह सदैव समीप हैं। मन में विचारों के उठने से भी
पहले वे मार्गदर्शन करने लग जाते हैं। अनुरागी के हृदय में वह महापुरुष सदैव
आत्मा से अभिन्न होकर जाग्रत रहते हैं। अर्जुन अनुराग का प्रतीक है।
गीता के ग्यारहवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ऐश्वर्य देखने पर
अर्जुन अपनी क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमायाचना करने लगा। श्रीकृष्ण ने क्षमा
किया और याचना के अनुरूप सौम्य स्वरूप में आकर कहा, "अर्जुन! मेरे इस
स्वरूप को न पहले किसी ने देखा है और न भविष्य में कोई देख सकेगा।"
तब तो गीता हमलोगों के लिए व्यर्थ है; क्योंकि उस दर्शन की योग्यताएँ अर्जुन
तक सीमित रह गयीं, जबकि उसी समय संजय देख रहा था। पहले भी उन्होंने
कहा, "बहुत से योगीजन ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे साक्षात् स्वरूप को
प्राप्त हो चुके हैं।" अन्ततः वे महापुरुष कहना क्या चाहते हैं? वस्तुतः अनुराग

प्राक्कथन (ड)
ही 'अर्जुन' है, जो आपके हृदय की भावना-विशेष है। अनुरागविहीन पुरुष न
कभी पूर्व में देख सका है और न अनुरागविहीन पुरुष भविष्य में कभी देख
सकेगा- 'मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।'
(रामचरितमानस, ७/६१/१) अतः अर्जुन एक प्रतीक है। यदि प्रतीक
नहीं है तो गीता का पीछा छोड़ दें, गीता आपके लिये नहीं है; क्योंकि उस दर्शन
की योग्यता अर्जुन तक ही सीमित रह गयी।
अध्याय के अन्त में योगेश्वर निर्णय देते हैं- "अर्जुन ! अनन्य भक्ति
और श्रद्धा द्वारा मैं इस प्रकार प्रत्यक्ष देखने के लिये (जैसा तूने देखा), तत्त्व
से स्पष्ट जानने के लिये और प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ।" अनन्य भक्ति
अनुराग का ही दूसरा रूप है और यही अर्जुन का स्वरूप भी है। अर्जुन पथिक
का प्रतीक है। इस प्रकार गीता के पात्र प्रतीकात्मक हैं। यथास्थान उनका
संकेत है।
रहे हों कोई ऐतिहासिक श्रीकृष्ण और अर्जुन, निश्चय ही हुआ हो कोई
विश्वयुद्ध; किन्तु गीता में भौतिक युद्ध का चित्रण कदापि नहीं है। उस ऐतिहासिक
युद्ध के मुहाने पर घबड़ाया तो था अर्जुन, न कि सेना; सेना तो लड़ने को तैयार
खड़ी थी।
क्या गीता का उपदेश देकर श्रीकृष्ण ने सव्यसाची अर्जुन को सेना की
योग्यता का बनाया? वस्तुतः साधन लिखने में नहीं आता। सब कुछ पढ़ लेने
के बाद भी चलना शेष ही रहता है। यही प्रेरणा 'यथार्थ गीता' है।
श्री गुरु पूर्णिमा सद्गुरु कृपाश्रयी, जगद्बन्धु
२४ जुलाई, १९८३ ई० स्वामी अड़गड़ानन्द

प्रथमोऽध्यायः संशय-विषाद योग

॥ ॐ श्री परमात्मने नमः ॥
॥ अथ श्रीमद्भगवद्गीता ॥
॥ यथार्थ गीता ॥
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१॥
धृतराष्ट्र ने पूछा- “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में एकत्र युद्ध की
इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?”
अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र और संयमरूपी संजय। अज्ञान मन के अन्तराल में
रहता है। अज्ञान से आवृत्त मन धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के
माध्यम से वह देखता है, सुनता है और समझता है कि परमात्मा ही सत्य है,
फिर भी जब तक इससे उत्पन्न मोहरूपी दुर्योधन जीवित है इसकी दृष्टि सदैव
कौरवों पर रहती है, विकारों पर ही रहती है।
शरीर एक क्षेत्र है। जब हृदय-देश में दैवी सम्पत्ति का बाहुल्य होता है
तो यह शरीर धर्मक्षेत्र बन जाता है और जब इसमें आसुरी सम्पत्ति का बाहुल्य
होता है तो यह शरीर कुरुक्षेत्र बन जाता है। ‘कुरु’ अर्थात् करो- यह शब्द
आदेशात्मक है। श्रीकृष्ण कहते हैं- प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों द्वारा परवश
होकर मनुष्य कर्म करता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता।
गुण उससे करा लेते हैं। सो जाने पर भी कर्म बन्द नहीं होता, वह भी स्वस्थ

२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
शरीर की आवश्यक खुराक मात्र है। तीनों गुण मनुष्य को देवता से कीटपर्यन्त
शरीरों में ही बाँधते हैं। जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं,
तब तक ‘कुरु’ लगा रहेगा। अतः जन्म-मृत्युवाला क्षेत्र, विकारोंवाला क्षेत्र
कुरुक्षेत्र है और परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्तियों
(पाण्डवों) का क्षेत्र धर्मक्षेत्र है।
पुरातत्त्वविद् पंजाब में, काशी-प्रयाग के मध्य तथा अनेकानेक स्थलों
पर कुरुक्षेत्र की शोध में लगे हैं; किन्तु गीताकार ने स्वयं बताया है कि जिस
क्षेत्र में यह युद्ध हुआ, वह कहाँ है। ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।’
(अ० १३/१) “अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है और जो इसको जानता है,
इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है।” आगे उन्होंने क्षेत्र का विस्तार बताया,
जिसमें दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों विकार और तीनों गुणों का
वर्णन है। शरीर ही क्षेत्र है, एक अखाड़ा है। इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं-
‘दैवी सम्पद’ और ‘आसुरी सम्पद’, ‘पाण्डु की सन्तान’ और ‘धृतराष्ट्र की
सन्तान’, ‘सजातीय और विजातीय प्रवृत्तियाँ’।
अनुभवी महापुरुष की शरण जाने पर इन दोनों प्रवृत्तियों में संघर्ष का
सूत्रपात होता है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है और यही वास्तविक युद्ध है।
विश्वयुद्धों से इतिहास भरा पड़ा है; किन्तु उनमें जीतनेवालों को भी शाश्वत
विजय नहीं मिलती। ये तो आपसी बदले हैं। प्रकृति का सर्वथा शमन करके
प्रकृति से परे की सत्ता का दिग्दर्शन करना और उसमें प्रवेश पाना ही वास्तविक
विजय है। यही एक ऐसी विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। यही मुक्ति है,
जिसके पीछे जन्म-मृत्यु का बन्धन नहीं है।
इस प्रकार अज्ञान से आच्छादित प्रत्येक मन संयम के द्वारा जानता है
कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के युद्ध में क्या हुआ? अब जैसा जिसके संयम का उत्थान है,
वैसे-वैसे उसे दृष्टि आती जायेगी।
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।।

प्रथम अध्याय ३
उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर
द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा-
द्वैत का आचरण ही 'द्रोणाचार्य' है। जब जानकारी हो जाती है कि हम
परमात्मा से अलग हो गये हैं (यही द्वैत का भान है), वहाँ उसकी प्राप्ति के
लिये तड़प पैदा हो जाती है, तभी हम गुरु की तलाश में निकलते हैं। दोनों
प्रवृत्तियों के बीच यही प्राथमिक गुरु है; यद्यपि बाद के सद्गुरु योगेश्वर
श्रीकृष्ण होंगे, जो योग की स्थितिवाले होंगे।
राजा दुर्योधन आचार्य के पास जाता है। मोहरूपी दुर्योधन। मोह सम्पूर्ण
व्याधियों का मूल है, राजा है। दुर्योधन- दुर् अर्थात् दूषित, यो धन अर्थात् वह
धन। आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। उसमें जो दोष उत्पन्न करता है, वह
है मोह। यही प्रकृति की ओर खींचता है और वास्तविक जानकारी के लिये
प्रेरणा भी प्रदान करता है। मोह है तभी तक पूछने का प्रश्न भी है, अन्यथा
सभी पूर्ण ही हैं।
अतः व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर अर्थात् पुण्य से
प्रवाहित सजातीय वृत्तियों को संगठित देखकर मोहरूपी दुर्योधन ने प्रथम गुरु
द्रोण के पास जाकर यह कहा-
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता।।३।।
हे आचार्य! अपने बुद्धिमान् शिष्य द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार
खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस भारी सेना को देखिये।
शाश्वत अचल पद में आस्था रखनेवाला दृढ़ मन ही 'धृष्टद्युम्न' है।
यही पुण्यमयी प्रवृत्तियों का नायक है। 'साधन कठिन न मन कहुँ टेका।'
(रामचरितमानस, ७/४४/३)- साधन कठिन नहीं, मन की दृढ़ता कठिन
होनी चाहिये।
अब देखें सेना का विस्तार-
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ।।४।।

४ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
इस सेना में 'महेष्वासाः'- महान् ईश में वास दिलानेवाले, भावरूपी
'भीम', अनुरागरूपी 'अर्जुन' के समान बहुत से शूरवीर, जैसे- सात्त्विकतारूपी
'सात्यकि', 'विराटः'- सर्वत्र ईश्वरीय प्रवाह की धारणा, महारथी राजा द्रुपद
अर्थात् अचल स्थिति तथा-
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥
'धृष्टकेतुः'- दृढ़कर्तव्य, 'चेकितानः'- जहाँ भी जाय, वहाँ से चित्त
को खींचकर इष्ट में स्थिर करना, 'काशिराजः'- कायारूपी काशी में ही वह
साम्राज्य है, 'पुरुजित्'- स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों पर विजय दिलानेवाला
पुरुजित्, 'कुन्तिभोजः'- कर्तव्य से भव पर विजय, नरों में श्रेष्ठ 'शैब्य'
अर्थात् सत्य व्यवहार-
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥
और पराक्रमी 'युधामन्युः'- युद्ध के अनुरूप मन की धारणा,
'उत्तमौजाः'- शुभ की मस्ती, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु- जब शुभ आधार आ
जाता है तो मन भय से रहित हो जाता है- ऐसा शुभ आधार से उत्पन्न अभय
मन, ध्यानरूपी द्रौपदी के पाँचों पुत्र- वात्सल्य, लावण्य, सहृदयता, सौम्यता,
स्थिरता सब-के-सब महारथी हैं। साधन-पथ पर सम्पूर्ण योग्यता के साथ
चलने की क्षमताएँ हैं।
इस प्रकार दुर्योधन ने पाण्डव-पक्ष के पन्द्रह-बीस नाम गिनाये, जो
दैवी सम्पद् के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। विजातीय प्रवृत्तियों का राजा होते हुए भी
'मोह' ही सजातीय प्रवृत्तियों को समझने के लिये बाध्य करता है।
दुर्योधन अपना पक्ष संक्षेप में कहता है। यदि कोई बाह्य युद्ध होता तो
अपनी फौज बढ़ा-चढ़ाकर गिनाता। विकार कम गिनाये गये; क्योंकि उन पर
विजय पाना है, वे नाशवान् हैं। केवल पाँच-सात विकार बताये गये, जिनके
अन्तराल में सम्पूर्ण बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं। जैसे-
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥७॥