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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 782 में से

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पृष्ठ 91

त्युपेयादेव¹ । अनृतावपि स्त्रीकामानायां सत्यां प्रतिषिद्धवर्जमुपेयादेवेत्यलमत्ति-
प्रसङ्गेनेति ॥ ८१ ॥
भाषा—स्त्रियों के ( इन्द्र द्वारा दिये 'तुम्हारे काम को तृप्त न करने वाला
पातकी होवे' इस ) वर का स्मरण करते हुए उसकी इच्छा देख कर संभोग
करे और अपनी ही स्त्री में रत रहे; क्योंकि स्त्रियों की रक्षा का विधान किया
गया है ॥ ८१ ॥
भर्तृभ्रातृपितृज्ञातिश्वश्रूश्वशुरदेवरैः ।
बन्धुभिश्च स्त्रियः पूज्या भूषणाच्छादनाशनैः ॥ ८२ ॥
किञ्च, भर्तृप्रभृतिभिः पूर्वोक्ताः साध्व्यः स्त्रियो यथाशक्त्यलङ्कारवसनभोजन-
पुष्पादिभिः संमाननीयाः । यस्मात्ताः पूजिता धर्मार्थकामान्संवर्धयन्ति ॥
भाषा—पति, भाई, पिता, जाति के लोग, सास, ससुर, देवर और
बन्धुवर्ग द्वारा स्त्रियां आभूषण, वस्त्र एवं भोजनादि से सम्मान करने योग्य
होती हैं ॥ ८२ ॥
तथा पुनः समर्पितगृहव्यापारया किंभूतया भवितव्यमित्यत आह—
संयतोपस्करा दक्षा हृष्टा व्ययपराङ्मुखी ।
कुर्याच्छ्वशुरयोः पादवन्दनं भर्तृतत्परा ॥ ८३ ॥
संयतः स्वस्थाननिवेशित, उपस्करो गृहोपकरणवर्गो यथा सा तथोक्ता ।
यथोलूखलमुसलशूर्पादेः कण्डनस्थाने, दृषदुपलयोर्वियोगेन पेषणस्थान इत्यादि ।
दक्षा गृहव्यापारकुशला, हृष्टा सदैव प्रहसितानना, व्ययपराङ्मुखी न
व्ययशीला, 'स्यात्' इति सर्वत्र शेषः । किञ्च, श्वश्रूश्च श्वशुरश्च श्वशुरौ । 'श्वशुरः
श्वश्रू वा' ( पा० १।२।७१ ) इत्येकशेषः, तयोः पादवन्दनं नित्यं कुर्यात् ।
'श्वशुर' ग्रहणं मान्यान्तरोपलक्षणार्थम् । भर्तृतत्परा भर्तृवशवर्तिनी सती पूर्वोक्तं
कुर्यात् ॥ ८३ ॥
भाषा—घर की वस्तुओं को यथास्थान संभाल कर रखने ( गृहकार्य में )
कुशल हो, सदैव प्रसन्न रहे, अधिक व्यय न करे, सास-श्वसुर को चरण छूकर
प्रणाम करे एवं पति के वश में रहे ॥ ८३ ॥
भर्तृसन्निधावुक्तम, प्रोषितभर्तरि तया किं कर्तव्यमित्यत आह—
क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् ।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत् प्रोषितभर्तृका ॥ ८४ ॥
देशान्तरगतभर्तृका क्रीडां कन्दुकादिभिः शरीरसंस्कारमुद्वर्तनादिभिः,


१. त्युपेयादेवानृतावपि ।