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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 782 में से

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पृष्ठ 733

दण्डशुक्लावशेषं च न पुत्रो दातुमर्हति ॥
दर्शनप्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात् पूर्वचोदितः ।
क्रोधकृत ऋण का निर्देश नारद ने किया है :—
न पुत्रर्णं पिता दद्याद् दद्यात् पुत्रस्तु पैतृकम् ।
काम-क्रोध-सुरा-द्यूत-प्रातिभाव्यकृतं विना ॥
क्रोधकृत ऋण की परिभाषा कात्यायन ने की है :—
यत्र हिंसां समुत्पाद्य क्रोधाद् द्रव्यं विनाशय वा ।
उक्तं तुष्टिकारं यत्तु विद्यात् क्रोधकृतं हि तत् ॥
परस्य हिंसां धनविनाशं वा क्रोधात् कृत्वा तत्तुष्टये यद्द्रव्यं दातव्य-
स्वेन अङ्गीकृतं तत् क्रोधकृतम्—( अपरार्कः )
श्लो० ४९—प्रतिपन्नम्—कभी कभी अप्रतिपन्न ऋण को भी चुकाना
पड़ता है, जैसा कात्यायन ने कहा है :—
मर्तुकामेन या भर्त्रा प्रोक्ता देयमृणं त्वया ।
अप्रपन्नाऽपि सा दाप्या ऋणं पत्याश्रितं स्त्रियाः ॥
श्लो० ५२—अत एव नारद का भी कथन है :—
साक्षित्वं प्रातिभाव्यं वा दानं ग्रहणमेव च ।
विभक्ताः भ्रातरः कुर्युः नाविभक्ताः परस्परम् ॥
परन्तु यदि सर्वानुमत हो तो अविभक्त को भी साक्षित्व आदि का
अधिकार हो सकता है ।
श्लो० ५३—बृहस्पति ने चार प्रकार का प्रतिभू बतलाया है :—
दर्शने प्रत्यये दाने ऋणद्रव्यार्पणे तथा ।
चतुष्प्रकारः प्रतिभूः शास्त्रे दृष्टो मनीषिभिः ॥
प्राहैको दर्शयिष्यामि साधुरेषोऽपरोऽब्रवीत् ।
दाता तवैतद् द्रविणमर्पयिष्यपरोऽब्रवीत् ॥
आद्यौ तु वितथे दाप्यौ तत्कालावेदितं धनम् ।
उत्तरौ तु विसंवादे तौ विना तत्सुतौ पुनः ॥
सुता अपि—सुत शब्द के प्रयोग से मनु के वचन में प्रयुक्त 'दायाद'
(दान-प्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत्) शब्द से पुत्र-पौत्रादि-संग्रह-
विषयक भ्रम का निवारण हो जाता है । तात्पर्य यह है कि पुत्रमात्र
ही प्रातिभाव्य का समर्पण करे पौत्र आदि नहीं । अत एव कात्यायन का
मत है :—
प्रातिभाव्यागतं पौत्रैर्दातव्यं न तु तत् कचित् ।