याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 710, कुल 782 में से
संदर्भ में पढ़ें६५४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
श्लो० ५२—लक्षणाम्—बाह्य लक्षण के विषय में मनु का कथन है :—
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।
तनुरोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत्स्त्रियम् ॥
आभ्यन्तर लक्षणों का वर्णन आश्वलायन ने इस प्रकार किया है :—
दुर्विज्ञेयानि लक्षणान्यष्टौ पिण्डान् कृत्वा 'ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञे ऋते सत्य-
म्प्रतिष्ठितं यदिदं कुमार्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यतां यत्सत्यं तद् दृश्यताम्'
इति पिण्डानभिमन्त्र्य कुमारीं ब्रूयादेषामेकं गृहाणेति। क्षेत्राच्चेदुभयतः सस्याद्-
गृह्णीयात् अन्नवत्यस्याः प्रजा भविष्यति इति विद्यात्, गोष्ठात् पशुमती,
वेदि-पुरीषात् ब्रह्मवर्चस्विनी, अविदासिनो हृदात् सर्वसम्पन्ना, देवनात्
कितविनी, ईरिणादधन्या, श्मशानात् पतिघ्नी” ( आ० गृ० सू० १।५।४-६ )
उभयतः सस्य क्षेत्र आदि वाक्योक्त आठ स्थानों से मिट्टी लेकर आठ ही
पिण्ड बनाना चाहिए । उन पिण्डों को 'ऋतमग्रे प्रथमम्' आदि मन्त्र से
अभिमन्त्रित कर कन्या को यथेच्छ किसी पिण्ड का स्पर्श करने के लिए
कहना चाहिए । प्रत्येक पिण्ड के स्पर्श का फल उपर्युक्त समझना चाहिए ।
उभयतः सस्य क्षेत्र का अर्थ है जिस क्षेत्र में वर्ष में दो बार उपज होती है ।
वेदिपुरीषम् = अपकर्म में बनाई हुई वेदी । अविदासी हृद = सर्वदा जलयुक्त
हृद; देवन = जुआ खेलने का स्थान; द्विप्रव्राजिनी = अनेक पुरुष से सम्पर्क
करने वाली; ईरिण = जहाँ बीज में अङ्कुर न होता हो ऐसी नमकीन भूमि ।
यह परीक्षा कुल-परीक्षा के बाद करनी चाहिए । कुल-परीक्षा के विषय में
मनु का कथन है :—
महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम् ।
क्षयामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥
हीनक्रिय = जातकर्मादि संस्कारशून्य; निष्पुरुष = पुरुषहीन, स्त्रीमात्रा-
वशेष; निश्छन्दः = वेदाध्ययनशून्य; रोमश = दीर्घरोम-सम्पन्न; अर्शस =
'अर्श' रोगग्रस्त; क्षय = राजयक्ष्मा; आमयावि = मन्दाग्निरोग; अपस्मार = रोग
विशेष ( Epilepsy ); श्वित्र = श्वेत-कुष्ठ ।
स्वयं याज्ञवल्क्य भी इसका वर्णन आगे—"स्फीतादपि न सञ्चारि-रोग-
दोषसमन्वितात्" ( श्लो० ५४ ) में करेंगे ।
श्लो० ५३—अरोगिणीम्—यह मनूक्त दोषों का उपलक्षण है । मनुस्मृति
में निम्नलिखित प्रकार की कन्या त्याज्य मानी गई है :—