याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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६४८ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
एकत्र करे = वाम कर में । किन्तु यदि उपर्युक्त संख्या से शुद्धि नहीं हो
सके तो संख्याधिक्य का भी अवलम्बन करना ही चाहिए । यदि तु उक्त
संख्या से अल्प-संख्या के द्वारा भी शुद्धि हो जाय तब भी उपर्युक्त संख्या-
नियम को अदृष्टार्थ मानना चाहिए ।
शौच के विषय में आश्रम का नियम मनु ने बतलाया है :—
एतच्छौचं गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ।
त्रिगुणं स्याद्वनस्थानां यतीनान्तु चतुर्गुणम् ॥
यह नियम दिवा-शौच-विषयक है । रात्रि-शौच आदि के विषय में दक्ष
का कथन निम्नलिखित है :—
यच्चोदितं दिवाशौचमर्धं रात्रौ विधीयते ।
आतुरस्य तदर्धं स्यात् तदर्धन्तु पथि स्मृतम् ॥
आतुर पद अरयातुर का अभिधायक है । अत एव आपस्तम्ब का भी
कथन है:—
आर्तः कुर्याद् यथाबलम् ॥
स्त्री-शूद्र आदि के शौच में संख्या-नियम नहीं है । अत एव देवल का
वचन है:—
यावता मन्यते शुद्धिं शौचं कुर्वीत तावता ।
प्रमाणं द्रव्य-संख्या च न शिष्टैरुपदिश्यते ॥
श्लो० १८—अन्तर्जानु— देवल का मत इस विषय में यह है:—"शिखां
बद्ध्वा वसित्वा" इति । ब्राह्मेण—यह प्रधान पक्ष है । मनु ने पक्षान्तर भी
बतलाये हैं:—
ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्य-कालमुपस्पृशेत् ।
कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ॥
त्रैदशिक = दैव-तीर्थ ।
श्लो० २०—खानि = शिरःस्थित इन्द्रियों को । अत एव गौतम का
वचन है:—"खानि चोपस्पृशेत् शीर्षण्यानि ।" मनु ने कुछ विशेष बत-
लाया है :—
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विःप्रमृज्यात्ततो मुखम् ।
खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च ॥
आत्मानम् = हृदय को, क्यों कि श्रुति में हृदय को आत्मा का स्थान
बतलाया गया है :—
"हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः ।"