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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 703, कुल 782 में से

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पृष्ठ 703

टिप्पणी (नोट्स) ६४७
चूड़ाकरण में प्रतिबन्धक तत्त्व संस्कारमयूख में बताया गया है :-
गर्भे मातुः कुमारस्य न कुर्याच्चौलकर्म तु ।
पञ्चमासादधः कुर्यादत ऊर्ध्वं न कारयेत् ॥
श्लो० १४ - 'उपनयनमित्यत्र ण्यन्तप्रयोगादुपनयनमन्यद्वारा अपि
कर्त्तव्यम्' यह शूलपाणि का मत है।
बृहस्पति ने विशेषता बतलाई है :-
द्वितीयजन्मनः पूर्वमारभेताक्षरान् सुधीः ।
मौञ्जीबन्धस्ततः पश्चाद्वेदारम्भो विधीयते ॥
इस प्रसङ्ग में गौतम का मत निम्नलिखित है :-
उपनयनं ब्राह्मणस्य अष्टमे नवमे पञ्चमे वा काम्यम् ।
राज्ञाम् - राजन् शब्द क्षत्रिय जाति का वाचक है।
श्लो० १५- महाव्याहृति के विषय में मनु का कथन है :-
ओङ्कारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ॥
त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥
गौतम तथा हरदत्त के अनुसार - भूः, भुवः, स्वः, पुरुषः तथा सत्यम्
ये पांच महाव्याहृतियां हैं। मूल में महाव्याहृति-पद प्रणव का भी उपलक्षण
है। अत एव मनु का वचन है :-
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा ।
स्रवत्यनोङ्कृतं सर्वं परस्ताच्च विशीर्यति ॥
श्लो० १६- कर्णस्थः = दक्षिण कर्ण पर स्थित। अत एव कहा गया
है:-पवित्रं दक्षिणे कर्णे कृत्वा विण्मूत्रमाचरेत् ॥ यह नियम भी एक-वस्त्र-
युक्त होने पर पालनीय है। अन्यथा निम्नलिखित यम-वचन के अनुसार
कार्य करना चाहिए :-
कृत्वा यज्ञोपवीतन्तु पृष्ठतः कण्ठलम्बितम् ॥
मुख-नियम भी सम्भव होने पर अनुसरणीय है। अन्यथा निम्न-निर्दिष्ट
यम-वचन का आदर करना चाहिए:-
छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः ।
यथासुखमुखः कुर्यात् प्राण-बाध-भयेषु च ॥
श्लो० १७- मृद्भिः-संख्या-नियम मनुस्मृति में बतलाया गया है :-
एका लिङ्गे गुदे तिस्रः तथैकत्र करे दश ।
उभयोः सप्त दातव्या मृदः शुद्धिमभीप्सता ॥