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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 782 में से

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पृष्ठ 701

टिप्पणी (नोट्स) ६५५
इसमें भी कुछ विशेषता आचारादर्श में बतलाई गई है:—
ऋतुकालाभिगमनं पुंसा कार्यं विशेषतः ।
सदैव पर्ववर्जं तु स्त्रीणामभिमतं हि तत् ॥
सीमन्त-काल के विषय में वीरमित्रोदय में बृहस्पति का वचन इस
प्रकार है:—
रोहिण्यैन्दवमादित्यपुष्यहस्तोत्तरात्रयम् ।
पौष्णं वैष्णवभं चैव सीमन्ते दश संस्कृताः ॥
जातकर्म-समय का निर्देश मनुस्मृति में इस तरह है:—
प्राङ्नाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते ।
मन्त्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिषाम् ॥
नाभिवर्धन का अर्थ है नाभिच्छेदन ।
श्लो० १२—नामकरण के विषय में मनु का कथन है:—
नामधेयं दशम्यान्तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ।
पुण्ये तिथौ मुहूर्त्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्विते ॥
इस प्रसङ्ग में विशेष बात वीरमित्रोदय में उद्धृत बृहस्पति के वचन में
मिलती है :—
दशाहे द्वादशाहे वा जन्मतोऽपि त्रयोदशे ।
षोडशैकोनविंशे वा द्वात्रिंशे वर्णतः क्रमात् ॥
गोभिल ने "जननाद्दशरात्रे व्युष्टे ( = व्यतीते) शतरात्रे संवत्सरे वा नाम-
धेयकरणम्" ऐसा कहा है ।
नाम-करण-स्वरूप के विषय में विष्णुपुराण में निम्नलिखित श्लोक हैं :—
शर्मवद् ब्राह्मणस्योक्तं वर्मेति क्षत्रसंयुतम् ।
गुप्तदासात्मकं नाम प्रशस्तं वैश्यशूद्रयोः ॥
स्त्री के नाम के स्वरूप के विषय में विशेष बात मनुस्मृति में है :—
स्त्रीणां सुखोद्यमक्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम् ।
मङ्गल्यं दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत् ॥
चतुर्थे मासि निष्क्रम:—"एतच्च छन्दोगव्यतिरिक्तपरम्" ऐसा शूलपाणि
का मत है । मनु का विशेष मत इस प्रकार है :—
'यद्वेष्टं मङ्गलं शुभे !' इसीलिए यम ने कहा है :—'ततस्तृतीये कर्तव्यं
मासि सूर्यस्य दर्शनम् ॥' गोभिल ने तो और भी विशेष बतलाया है :—