याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary
महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
विष्णु-पुराण में सदाचार शब्द की व्युत्पत्ति निम्नलिखित रूप में की
गई है:—
साधवः क्षीणदोषाः स्युः सच्छब्दः साधुवाचकः ।
तेषामाचरणं यत्स्यात् सदाचारः स उच्यते ॥
स्त्री-शूद्र आदि के वेदाऽविरुद्ध आचार भी सदाचार हैं। अत एक
आपस्तम्ब का कथन है:—
स्त्रीभ्यश्चावरवर्णैभ्यो धर्मशेषान् प्रतीयात् इत्येके इत्येके ॥
प्रियमात्मनः—यदि श्रुतिद्वैध हो। अत एव मनु का कथन है:—
श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्यात् तत्र धर्मावुभौ स्मृतौ ।
उभावपि हि तौ धर्मो सम्यगुक्तौ मनीषिभिः ॥
गौतम का भी वचन है:—
तुल्यबल-विरोधे विकल्पः ॥
विकल्प होने पर आत्म-तुष्टि प्रमाण है। यही बात गर्ग के द्वारा भी
बतलाई गई है:—
विकल्पे स्वात्म-तुष्टिः-प्रमाणम् ॥
श्लो० ८—आत्मदर्शनम् — इस प्रसङ्ग में स्मृति-मुक्ताफलोक्त बृहस्पति-
वचन भी द्रष्टव्य है:—
भोगेष्वसक्तिः सततं तथैवात्मावलोकनम् ।
श्रेयः परं मनुष्याणाम् प्राह पञ्चशिखो मुनिः ॥
श्लो० ९—वीरमित्रोदय में यम का भी कथन है:—
एको द्वौ वा त्रयो वापि यद् ब्रूयुर्धर्मपाठकाः ।
स धर्म इति विज्ञेयो नेतरेषां सहस्रशः ॥
वहीं धर्म-पाठक का लक्षण भी दिया गया है:—
वेदविद्याव्रतस्नातः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ।
अनेकधर्म-शास्त्रज्ञः प्रोच्यते धर्मपाठकः ॥
अध्यात्मवित्तमः = कृतात्मसाक्षात्कारः—ऐसी व्याख्या शूलपाणि ने की है।
श्लो० ११—ऋतुकाल के विषय में बृहस्पति का वचन प्रयोगपारिजात
में लिखित है:—
निशाषोडशकं नारी संज्ञितर्तुमती तु सा ।
तावद्योग्या प्रभास्थाने विनाऽऽजाह्वहुतप्लवम् ॥