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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 782 में से

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पृष्ठ 551

भाषा—दूसरे के रत्न को चुराने वाला हेमकार नाम के निम्न कोटि के
पक्षियों की योनि में जन्म लेता है; पत्तों वाला शाक चुराने पर मयूर और
सुगंधद्रव्यों को चुराने पर छुछुन्दर का जन्म मिलता है ॥ २१३ ॥
मूषको धान्यहारी स्याद्यानमुष्ट्रः कपिः फलम् ।
जलं प्लवः पयः काको गृहकारी ह्युपस्करम् ॥ २१४ ॥
मधु दंशः पलं गृध्रो गां गोधाग्निं बकस्तथा ।
श्वित्री वस्त्रं श्वा रसं तु चीरी लवणहारकः ॥ २१५ ॥
किंच, धान्यहारी आखुः, यानं हृत्त्वोष्ट्रः, फलं वानरः, जलं प्लवः,
शकटविलाख्यः पक्षी, पयः क्षीरं, काको ध्वाङ्क्षः, गृहोपस्करं मुसलादि हृत्वा
गृहकारी १चटकाख्यः कीटविशेषः, मधु हृत्वा दंशाख्यः कीटः, पलं मांसं तद्धृत्वा
गृध्राख्यः पक्षी, गां हृत्वा गोधाख्यः प्राणिविशेषः, अग्निं हृत्वा बकाख्यः पक्षी,
वस्त्रं हृत्वा श्वित्री, इक्ष्वादिरसं हृत्वा सारमेयः- लवणहारी चीर्याख्यः उच्चैःस्वरः
कीटः ॥ २१४–२१५ ॥
भाषा—धान्य चुराने वाला चूहा होता है और यान (सवारी) चुराने
वाला ऊँट तथा फल चुराने वाला बन्दर होता है। जल चुराने वाला
शकटविल पक्षी का, दूध चुराने वाला कौए का और मूसल आदि जैसे
गृहस्थी का उपकरण चुराने पर गृहकारी (चटक) पक्षी का जन्म मिलता
है। मधु चुराने वाला दंश (मच्छर), मांस चुराने वाले गृध्र, गाय चुराने
वाला गोह, अग्नि चुराने वाला बक पक्षी, वस्त्र चुराने वाला कुष्ठी, ईख
आदि का रस चुराने वाला कुत्ता और नमक चुराने वाला चीरी कीड़ा होकर
जन्म लेता है ॥ २१४-२१५ ॥
एवं प्रदर्शनार्थं किंचिदुक्त्वा प्रतिद्रव्यं २पृष्ठाकोटन्यायेन वक्तुमशक्तेरेकोपा-
घिना कर्मविपाकं दर्शयितुमाह—
प्रदर्शनार्थमेतत्तु मयोक्तं स्तेयकर्मणि ।
द्रव्यप्रकारा हि यथा तथैव प्राणिजातयः ॥ २१६ ॥
द्रव्यस्यापहियमाणस्य यादृशाः प्रकारास्तादृशा एव प्राणिजातयः
स्तेयकर्मण्यपहर्तारो भवन्ति । यथा कांस्यहारी हंस इति । अथवा
यत्फलसाधनं द्रव्यमपहरति तत्साधनविकलः-यथा पङ्गुतामश्वहारक इति ॥
शङ्खेन कचिद्विशेषो दर्शितः । 'ब्रह्महा कुष्ठी, तैजसापहारी मण्डली, देवब्राह्मणा-
क्रोशकः खलतिः, गरदाग्निदावुन्मत्तौ, गुरुं प्रतिहन्तापस्मारी, गोघ्नाश्चान्धः,
१. वरटाख्यः । २. पृष्टाकोटेन ।