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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 782 में से

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पृष्ठ 550

४६४ याज्ञवल्क्यस्मृतिः
भाषा—( मनुष्य का जन्म पाने पर ) ब्राह्मण की हत्या करने वाले
राजयक्ष्मा का रोगी होते हैं; सुरा पीने वाले के दाँत स्वभावतः काले होते
हैं;, ( ब्राह्मण का ) सोना चुराने वाले के नख भद्दे होते हैं और गुरुपत्नी
का भोग करने वाला कोढ़ी होता है । इन ब्रह्महा आदि महापातकियों में
जिसके साथ कोई निवास करता है वह भी उसी के समान महापातकी
होता है ॥ २०९३ ॥
अन्नहर्त्ताऽऽमयावी स्यान्मूको वागपहारकः ॥ २१० ॥
धान्यमिश्रोऽतिरिक्ताङ्गः पिशुनः पूतिनासिकः ।
तैलहृत्तैलपायी स्यात्पूतिवक्त्रस्तु सूचकः ॥ २११ ॥
किंच, अन्नस्यापहर्त्ता आमयावी अजीर्णांन्नः । वागपहारकोऽननुज्ञाताध्यायी
पुस्तकापहारी च मूको वागिन्द्रियविकलो भवेत् । धान्यमिश्रोऽतिरिक्ताङ्गः
षडङ्गुल्यादिः पिशुनो विद्यमानपरदोषप्रख्यापनशीलः । पूतिनासिकः दुर्गन्ध-
नासिकः, तैलस्य हर्ता तैलपायी कीटविशेषो भवति । सूचकोऽसद्दोषसंकीर्तनो
दुर्गन्धवदनो जायते । एतच्च तिर्यक्त्वप्राप्त्युत्तरकालं मानुषशरीरप्राप्तौ द्रष्टव्यम्
( १२।६८ )—'यद्वा तद्वा परद्रव्यमपहृत्य बलान्नरः । अवश्यं याति तिर्यक्त्वं
जग्ध्वा चैवाहुतं हविः ॥' इति मनुस्मरणात् ॥ २१०-२११ ॥
भाषा—अन्न चुराने वाले को अजीर्ण का रोग होता है और वाणी
( अर्थात् पुस्तक ) चुराने वाला गूँगा होता है । धान्य में मिलावट करने
वाले का कोई अंग ( अंगुली आदि ) बड़ा होता है और पिशुन ( दूसरों
का दोष कहने वाले चुगलखोर ) की नाक दुर्गन्धयुक्त रहती है ॥२१०-२११॥
परस्य योषितं हृत्वा ब्रह्मस्वमपहृत्य च ।
अरण्ये निर्जले देशे भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ २१२ ॥
किंच, यः परदारानपहरति, ब्रह्मस्वं च सुवर्णव्यतिरिक्तमपहरति, असावरण्ये
निर्जले देशे ब्रह्मराक्षसो भूतविशेषो जायते ॥ २१२ ॥
भाषा—परायी स्त्री का और ब्राह्मण के धन का अपहरण करने वाला
वन में निर्जल स्थान पर ब्रह्मराक्षस होकर जन्म लेता है ॥ २१२ ॥
हीना जातौ प्रजायेत पररत्नापहारकः ।
पत्रशाकं शिखी हृत्वा गन्धांश्छुच्छुन्दरी शुभान् ॥२१३॥
किंच, हीनजातौ हेमकाराख्यायां पश्चिजातौ पररत्नाद्यपहारको जायते ।
तथा च मनुः (१२।६१)—'मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः । विवि-
धानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ॥' इति । पत्रात्मकं शाकं हृत्वा मयूरः ।
शुभानाम्गन्धानपहृत्य छुच्छुन्दरी राजदुहिताख्या मूषिका जायते ॥ २१३ ॥