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याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

याज्ञवल्क्य स्मृति (मिताक्षरा टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Yajnavalkya Smriti with Mitakshara Tika & Hindi Commentary

महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished782 पृष्ठ

पृष्ठ 521, कुल 782 में से

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पृष्ठ 521

प्रायश्चित्ताध्यायः ४६५
अपरान्तकोल्लोप्यमद्रकप्रकर्यौवेणकानि सरोबिन्दुसहितं चोत्तरमित्येतानि-
प्रकरणाख्यानि सप्त गीतकानि । 'च' शब्दादासारितवर्धनमानकादिमहागीतानि-
गृह्यन्ते । ऋग्गाथाद्याश्चतस्रो गीतिका इत्येतदपरान्तकादिगीतजातमध्यारोपिता-
त्मभावं मोक्षसाधनत्वान्मोक्षसंज्ञितं मन्तव्यम् । तदभ्यासस्यैकाग्रतापादनद्वारे-
णात्मैकतापत्तिकारणत्वात् ॥ ११३-११४ ॥
भाषा—( सामगान में भी मन न लगने पर ) अपरान्तक, उल्लोप्य,
मद्रक, प्रकरी, औवेणक तथा सरोविन्दु सहित उत्तर गीतों का, ऋग्गाथा,
पाणिका, दक्षविहिता और ब्रह्मगीतिका का गान करे । इनके अभ्यास से मोक्ष
का साधन (चित्त की एकाग्रता) की प्राप्ति बताई गयी है ॥ ११३-११४ ॥
वीणावादनतत्त्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः ।
तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ॥ ११५ ॥
किंच, भरतादिमुनिप्रतिपादितवीणावादनतत्त्ववेदी । श्रूयत इति श्रुतिः
द्वाविंशतिविधा सप्तस्वरेषु । तथा हि—षड्जमध्यमपञ्चमाः प्रत्येकं चतुःश्रुतयः
ऋषभधैवतौ प्रत्येकं त्रिश्रुती गान्धारनिषादौ प्रत्येकं द्विश्रुती इति । जातयस्तु
षड्जादयः सप्त शुद्धाः संकरजातयस्त्वेकादशेत्येवमष्टादशविधास्तासु विशारदः
प्रवीणः । ताल इति गीतपरिमाणं कथ्यते । तत्स्वरूपज्ञश्च तदनुविद्धब्रह्मोपासन-
तया तालादिभङ्गमयाच्चित्तवृत्तेरात्मैकाग्रतायाः सुकरत्वादप्रयासेनेव मुक्तिपथं
नियच्छति प्राप्नोति ॥ ११५ ॥
भाषा—( भरत आदि मुनियों द्वारा प्रतिपादित विधि से ) वीणा-
वादन का मर्मज्ञ, श्रुति ( जो सात स्वरों में बाइस प्रकार की होती है ),
तथा जाति ( षड्ज आदि सात शुद्ध और ग्यारह संकर जातियाँ कुल मिलाकर
अठारह ) में प्रवीण, और ताल का ज्ञान रखने वाला ( चित्त की एकाग्रता के
सुकर होने से ) अल्प प्रयत्न से ही मुक्ति का मार्ग प्राप्त कर लेता है ॥११५॥
चित्तविक्षेपाद्यन्तरायहत्तस्य गीतज्ञस्य फलान्तरमाह—
गीतज्ञो यदि योगेन ३ नाप्नोति परमं पदम् ।
रुद्रस्यानुचरो ४ भूत्वा तेनैव सह मोदते ॥ ११६ ॥
गीतज्ञो यदि कथंचिद्योगेन परमं पदं नाप्नोति तर्हि रुद्रस्य सचिवो भूत्वा
तेनैव सह मोदते क्रीडति ॥ ११६ ॥
भाषा—गीत जानने वाला यदि किसी प्रकार योग द्वारा परम पद नहीं
प्राप्त कर पाता तो रुद्र का अनुचर होकर उन्हीं के साथ क्रीडा करता है ॥११६॥
१. प्रयत्नेन । २. गीतप्रमाणं कल्प्यते । ३. गीतेन । ४. भूत्वा सह
तेनैव ।