विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिष्ठान-निरूपण
एतत्त्रितयं दृष्टं सम्यग्रज्जुस्वरूपविज्ञानात् ।
तस्माद्वस्तु सतत्त्वं ज्ञातव्यं बन्धमुक्तये विदुषा ॥ ३४९ ॥
[रज्जुमें भ्रमके कारण सर्पकी प्रतीति होती है और उस मिथ्या प्रतीतिसे
ही भय, कम्प आदि दुःखोंकी प्राप्ति होती है किन्तु दीपक आदिके द्वारा
जिस प्रकार] रज्जुके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान होते ही [ रज्जुका अज्ञान (आवरण),
अज्ञान-जन्य सर्प (मल) और सर्प-प्रतीतिसे होनेवाले भय, कम्प आदि
(विक्षेप)] ये तीनों एक साथ निवृत्त होते देखे जाते हैं, [ उसी प्रकार
आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर आत्माका अज्ञान, अज्ञान-जन्य प्रपंचकी प्रतीति
और उससे होनेवाले दुःखकी एक साथ ही निवृत्ति हो जाती है ] । इसलिये
संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये विद्वान्को तत्त्वसहित आत्मपदार्थका ज्ञान
प्राप्त करना चाहिये।
अयोऽग्नियोगादिव सत्समन्वयान्
मात्रादिरूपेण विजृम्भते धीः।
तत्कार्यमेतद्द्वितयं यतो मृषा
दृष्टं भ्रमस्वप्नमनोरथेषु ॥ ३५० ॥
अग्निके संयोगसे जैसे लोहा [कुदाल आदि नाना प्रकारके रूपोंको
धारण करता है] उसी प्रकार आत्माके संयोगसे बुद्धि [शब्द, स्पर्श, रूप,
रस और गन्ध आदि] नाना प्रकारके विषयोंमें प्रकाशित होती है। यह द्वैत-
प्रपंच उस बुद्धिका ही कार्य है, इसलिये मिथ्या है; क्योंकि भ्रम, स्वप्न
और मनोरथके समय इसकी प्रतीतिका मिथ्यात्व स्पष्ट देखा है।
ततो विकाराः प्रकृतेरहंमुखा
देहावसाना विषयाश्च सर्वे।
क्षणेऽन्यथाभावितया ह्यमीषा-
मसत्त्वमात्मा तु कदापि नान्यथा ॥ ३५१ ॥