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सर्वकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 153 में से

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पृष्ठ 92

आत्मनिष्ठाका विधान ९५
आवरण-शक्ति अपने-आप ही नष्ट हो जाती है। यदि मिथ्या दीखनेवाले
[ इन बुद्धि आदि] पदार्थोंमें द्रष्टा और दृश्य पदार्थोंके स्वरूपको पृथक्-
पृथक् करके, स्पष्ट बोधके कारण होनेवाला निःसन्देहपूर्वक बाधरहित
पूर्ण विवेक हो जाय तो फिर विक्षेप नहीं होता और वह विवेक मायाजनित
मोहबन्धनको भी काट डालता है; जिससे मुक्त हुए पुरुषको फिर [ जन्म-
मरणरूप ] संसारकी प्राप्ति नहीं होती।
परावरैकत्वविवेकवह्नि-
र्दहत्यविद्यागहनं ह्यशेषम्।
किं स्यात्पुनः संसरणस्य बीज-
मद्वैतभावं समुपेयुषोऽस्य ॥ ३४७ ॥
ब्रह्म और आत्माका एकत्वज्ञानरूप अग्नि अविद्यारूप समस्त
वनको भस्म कर देता है। [ अविद्याके सर्वथा नष्ट हो जानेपर ] जब
जीवको अद्वैत-भावकी प्राप्ति हो जाती है तब उसको पुनः संसार-
प्राप्तिका कारण ही क्या रह जाता है ?
आवरणस्य निवृत्ति-
र्भवति च सम्यक्पदार्थदर्शनतः।
मिथ्याज्ञानविनाश-
स्तद्द्विक्षेपजनितदुःखनिवृत्तिः ॥ ३४८ ॥
आत्मवस्तुका ठीक-ठीक साक्षात्कार हो जानेसे आवरणका नाश
हो जाता है तथा मिथ्याज्ञानका नाश और विक्षेप-जनित दुःखकी निवृत्ति
हो जाती है।