विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 24, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंदस इन्द्रियाँ २७
बाह्येन्द्रियैः स्थूलपदार्थसेवां
स्रक्चन्दनस्त्र्यादिविचित्ररूपाम् ।
करोति जीवः स्वयमेतदात्मना
तस्मात्प्रशस्तिर्वपुषोऽस्य जागरे ॥ ९१ ॥
इससे तादात्म्यको प्राप्त होकर ही जीव माला, चन्दन तथा स्त्री आदि
नाना प्रकारके स्थूल पदार्थोंको बाह्येन्द्रियोंसे सेवन करता है, इसलिये
जाग्रत्-अवस्थामें इस (स्थूल) देहकी प्रधानता है।
सर्वोऽपि बाह्यसंसारः पुरुषस्य यदाश्रयः।
विद्धि देहमिदं स्थूलं गृहवद्गृहमेधिनः ॥ ९२ ॥
जिसके आश्रयसे जीवको सम्पूर्ण बाह्य जगत् प्रतीत होता है, गृहस्थके
घरके तुल्य उसे ही स्थूल देह जानो।
स्थूलस्य सम्भवजरामरणानि धर्माः
स्थौल्यादयो बहुविधाः शिशुताद्यवस्थाः।
वर्णाश्रमादिनियमा बहुधा यमाः स्युः
पूजावमानबहुमानमुखा विशेषाः ॥ ९३ ॥
स्थूल देहके ही जन्म, जरा, मरण तथा स्थूलता आदि धर्म हैं;
बालकपन आदि नाना प्रकारकी अवस्थाएँ हैं; वर्णाश्रमादि अनेक
प्रकारके नियम और यम हैं; तथा इसीकी पूजा, मान, अपमान आदि
विशेषताएँ हैं।
दस इन्द्रियाँ
बुद्धीन्द्रियाणि श्रवणं त्वगक्षि
घ्राणं च जिह्वा विषयावबोधनात्।
वाक्पाणिपादं गुदमप्युपस्थः
कर्मेन्द्रियाणि प्रवणेन कर्मसु ॥ ९४ ॥
श्रवण, त्वचा, नेत्र, घ्राण और जिह्वा ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, क्योंकि