विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
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प्रतिक्षण इस परार्थ (अन्यके भोग्यरूप) देहके पोषणमें ही लगा रहता है,
वह [अपनी इस प्रवृत्तिसे] स्वयं अपना घात करता है।
शरीरपोषणार्थी सन् य आत्मानं दिदृक्षति।
ग्राहं दारुधिया धृत्वा नदीं तर्तुं स इच्छति॥८६॥
जो शरीरपोषणमें लगा रहकर आत्मतत्त्वको देखना चाहता है, वह
मानो काष्ठ-बुद्धिसे ग्राहको पकड़कर नदी पार करना चाहता है।
मोह एव महामृत्युर्मुमुक्षोर्वपुरादिषु।
मोहो विनिर्जितो येन स मुक्तिपदमर्हति॥८७॥
शरीरादिमें मोह रखना ही मुमुक्षुकी बड़ी भारी मौत है; जिसने मोहको
जीता है वही मुक्तिपदका अधिकारी है।
मोहं जहि महामृत्युं देहदारसुतादिषु।
यं जित्वा मुनयो यान्ति तद्विष्णोः परमं पदम्॥८८॥
देह, स्त्री और पुत्रादिमें मोहरूप महामृत्युको छोड़; जिसको जीतकर
मुनिजन भगवान्के उस परम पदको प्राप्त होते हैं।
स्थूल शरीर
त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंकुलम् ।
पूर्णं मूत्रपुरीषाभ्यां स्थूलं निन्द्यमिदं वपुः॥८९॥
त्वचा, मांस, रक्त, स्नायु (नस), मेद, मज्जा और अस्थियोंका समूह
तथा मल-मूत्रसे भरा हुआ यह स्थूल देह अति निन्दनीय है।
पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः पूर्वकर्मणा।
समुत्पन्नमिदं स्थूलं भोगायतनमात्मनः।
अवस्था जागरस्तस्य स्थूलार्थानुभवो यतः॥९०॥
पंचीकृत स्थूल भूतोंसे पूर्व-कर्मानुसार उत्पन्न हुआ यह शरीर
आत्माका स्थूल भोगायतन है; इसकी [ प्रतीतिकी ] अवस्था जाग्रत् है,
जिसमें कि स्थूल पदार्थोंका अनुभव होता है।