विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ विवेक-चूड़ामणि
कल्पना आत्मतत्त्वमें व्यर्थ ही करते हैं क्योंकि ब्रह्म तो सदैव अद्वितीय,
असंग, चैतन्यस्वरूप, एक और अविनाशी है।
अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि।
बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः ॥ ५७३॥
पदार्थका होना और न होना—ऐसा जो ज्ञान है वह बुद्धिका ही गुण
है; नित्य वस्तु आत्माका नहीं।
अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि।
निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरंजने।
अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत्कल्पना कुतः ॥ ५७४॥
इसलिये आत्मामें ये बन्ध और मोक्ष दोनों मायासे कल्पित हैं, वस्तुतः
नहीं हैं; क्योंकि आकाशके समान निरवयव, निष्क्रिय, शान्त, निर्मल,
निरंजन और अद्वितीय परमतत्त्वमें कल्पना कैसे हो सकती है?
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ५७५ ॥
अतः परमार्थ (वास्तविक बात) तो यही है कि न किसीका नाश
है, न उत्पत्ति है, न बन्धन है और न कोई साधक है तथा न मुमुक्षु (मुक्त
होनेकी इच्छावाला) है, न मुक्त है।
सकलनिगमचूडास्वान्तसिद्धान्तरूपं
परमिदमतिगुह्यं दर्शितं ते मयाद्य।
अपगतकलिदोषं कामनिर्मुक्तबुद्धिं
स्वसुतवदसकृत्त्वां भावयित्वा मुमुक्षुम् ॥ ५७६ ॥
हे वत्स! कलिके दोषोंसे रहित, कामनाशून्य तुझ मुमुक्षुको अपने
पुत्रके समान समझकर मैंने बारम्बार सकल शास्त्रोंका सार-शिरोमणि यह
अति गुह्य परम सिद्धान्त तेरे सामने प्रकट किया है।