विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेशका उपसंहार १४७
एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम्।
ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः॥ ५६८॥
अखण्ड सत्तामात्रसे स्थित होना ही विदेह-कैवल्य है। इस प्रकार
ब्रह्म-भावको प्राप्त होकर यह यति फिर संसार-चक्रमें नहीं पड़ता।
सदात्मैकत्वविज्ञानदग्धाविद्यादिवर्ष्मणः ।
अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्व्रह्मणः कुत उद्भवः॥ ५६९॥
ब्रह्म और आत्माके एकत्व-ज्ञानरूप अग्निसे अविद्याजन्य शरीरादि
उपाधिके दग्ध हो जानेपर तो यह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप ही हो जाता है और
ब्रह्मका फिर जन्म कैसा?
मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः।
यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ ॥ ५७०॥
बन्धन और मोक्ष मायासे ही हुए हैं; वे वस्तुतः आत्मामें नहीं हैं; जैसे
क्रियाहीन रज्जुमें सर्प-प्रतीतिका होना न होना भ्रममात्र है, वास्तवमें नहीं।
आवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे।
नावृतिर्ब्रह्मणः काचिदन्याभावादनावृतम्।
यद्यस्त्यद्वैतहानिः स्याद्द्वैतं नो सहते श्रुतिः॥ ५७१॥
अज्ञानकी आवरणशक्तिके रहने और न रहनेसे ही क्रमशः बन्ध और
मोक्ष कहे जाते हैं और ब्रह्मका कोई आवरण हो नहीं सकता, क्योंकि उससे
अतिरिक्त और कोई वस्तु है नहीं; अतः वह अनावृत है। यदि ब्रह्मका भी आवरण
माना जाय तो अद्वैत सिद्ध नहीं हो सकता और द्वैत श्रुतिको मान्य नहीं है।
बन्धं च मोक्षं च मृषैव मूढा
बुद्धेर्गुणं वस्तुनि कल्पयन्ति।
दृगावृतिं मेघकृतां यथा रवौ
यतोऽद्वयासङ्गचिदेकमक्षरम् ॥ ५७२॥
बन्ध और मोक्ष दोनों बुद्धिके गुण हैं। जैसे मेघके द्वारा दृष्टिके ढँक
जानेपर सूर्यको ढँका हुआ कहा जाता है, उसी प्रकार मूढ़ पुरुष उनकी