विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ विनय-पत्रिका
जयति भरत-सौमित्रि-सत्रुघ्न-सेवित, सुमुख,
सचिव-सेवक-सुखद, सर्वदाता।
अधम, आरत, दीन, पतित, पातक-पीन
सकृत नतमात्र कहि 'पाहि' पाता ॥६॥
जयति जय भुवन दसचारि जस जगमगत,
पुन्यमय, धन्य जय राम राजा।
चरित-सुरसरित कवि-मुख्य गिरि निःसरित,
पिवत, मज्जत मुदित सँत-समाजा ॥७॥
जयति वर्णाश्रमाचारपर नारि-नर,
सत्य - सम-दम-दया-दानसीला।
विगत दुख - दोष, संतोष सुख सर्वदा,
सुनत, गावत राम राजलीला ॥८॥
जयति वैराग्य-विज्ञान-वारांनिधे,
नमत नर्मद, पाप-ताप-हर्त्ता।
दास तुलसी चरन सरन संसय-हरन,
देहि अवलंब वैदेहि-भर्त्ता ॥९॥
शब्दार्थ—राजीवलोचन = कमलनेत्र । अनय = अनीति । निकर = समूह । खर =
तीक्ष्ण । कोक = चकवा । तामरस = कमल । दाम = माला । मनोभव = कामदेव । सारंग =
धनुष । सुनिषंग = सुन्दर तरकस । हेलया = लीलापूर्वक । कलधौत = सुवर्ण । को = कौन ।
भा = हुआ । पीन = मोटा, पुष्ट । पाता = उद्धार करनेवाले । कविमुख्य = मुख्य कवि यानी
आदिकवि महर्षि बाल्मीकि । दानसीला = दानी स्वभाववाले । वारांनिधे = समुद्र । नर्मद =
आनन्ददाता ।
भावार्थ—हे श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! आप राजराजेश्वरोंमें इन्द्र हैं,
आप कमलनेत्र हैं, आपका नाम 'राम' कलियुगके लिए कल्पवृक्ष है, आप साम्य
भाव रखनेवाले, अनीतिरूपी समुद्रको सोख जानेके लिए अगस्त्य हैं और दानव-
दल-रूपी सघनान्धकारका नाश करनेके लिए मध्याह्नकालीन सूर्य हैं ॥१॥ हे
मुनि, देवता और मनुष्योंके स्वामी दशरथ-लला ! आपकी जय हो ! आपने
अपनी विभूतिसे अवधवासियोंको ऐसा बना दिया कि देवता और मुनि भी