विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ७७
इसके लिए तो कविने देखि लिखा और यह देवी नहीं सूपर्णखा राक्षसी है,
यह जान लिया, इसके लिए उन्होंने 'लखि' शब्दका प्रयोग किया ।
८—'करुना'—भक्तवर बैजनाथजीने 'करुणा'के सम्बन्धमें लिखा है:—
सेवक दुखतें दुखित है, स्वामि विकल है जाइ।
दुःख निवारे सीघ्र ही, 'करुना' गुन सों आइ ॥
( ४४ )
जयति राज-राजेन्द्र राजीवलोचन, राम,
नाम कलि-कामतरु, साम साली।
अनय-अंभोधि-कुंभज, निसाचर-निकर-
तिमिर घनघोर खर किरनमाली ॥१॥
जयति मुनिदेव नरदेव दशरथके,
देव-मुनिवंद्य किय अवध-वासी।
लोकनायक-कोक-सोक-संकट-समन,
भानुकुल-कमल-कानन - विकासी ॥२॥
जयति सिंगार-सर तामरस-दामदुति-
देह, गुनगेह, विस्वोपकारी।
सकल सौभाग्य-सौंदर्य सुषमारूप,
मनोभव कोटि गर्वापहारी ॥३॥
जयति सुभग सारंग सुनिषंग सायक सक्ति,
चारु चर्मासि वर वर्मधारी।
धर्मधुरधीर, रघुवीर, भुज-बल अतुल,
हेलया दलित भूभार भारी ॥४॥
जयति कलधौत मनि-मुकुट, कुंडल, तिलक,
झलक भलिभाल, विधु-वदन-सोभा।
दिव्य भूषन, वसन पीत, उपवीत,
किय ध्यान कल्यान-भाजन न को भा ॥५॥