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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 459

४४८ विनय-पत्रिका
शरणागतको अपनी शरणमें रख ले ? ॥१॥ धनी, गुणी और अच्छी सेवा करने-
वाले लोगोंको तो दूसरे स्वामी मिल जाते हैं; किन्तु निर्धन, गुणहीन और
आलसियोंका पालन करना नित्य नवीन श्रीरघुनाथजीको ही फबता आया है
॥२॥ मुँहसे क्या कहूँ ? चतुर स्वामीको मेरे हृदयकी बात ज्ञात है। तुलसी-
सरीखे मलिन मनवालेको तीनों काल और तीनों लोकमें केवल आपकीका
सहारा है ॥३॥
विशेष
१—'जाउँ कहाँ'—वास्तवमें जीवके लिए दूसरा अवलम्ब नहीं है। यजु-
र्वेदके पुरुषसूक्तमें भी कहा गया है—
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति ।
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
(३१।१८)
अर्थात् 'उस परम पुरुषका साक्षात्कार करके ही मृत्युको लाँघ सकते हो,
विश्राम पानेके लिए और कोई मार्ग या उपाय नहीं है'।
२—'रघुनायक नवीन को'—कुछ टीकाकारोंने 'नवीनको' का अर्थ 'नया
कौन है' किया है ।
[ २७५ ]
द्वार द्वार दीनता कह्यो, काढ़ि रद, परि पाहूँ ।
हैं दयालु दुनी दस दिसा, दुख-दोष-दलन-छम,
कियो न संभाषण काहूँ ॥१॥
तनु जन्यो कुटिल कीट ज्यों, तज्यो मातु पिता हूँ ।
काहे को रोष, दोष काहि धौं, मेरे ही अभाग
मोसों सकुचत छुइ सब छाँहूँ ॥२॥
दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन माँहूँ ।
तोसे पसु-पाँवर-पातकी परिहरे न सरन गये,
रघुबर ओर निबाहूँ ॥३॥