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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 458

विनय-पत्रिका ४४७
संसार-सागरसे पार हो गये । हे रामजी ! उनकी ओर अनुग्रहसे या क्रोधसे,
सच्चे भावसे या धोखेसे अथवा तिरछी निगाहोंसे ही आपने देख दिया था
(इसीसे वे तर गये थे) ॥२॥ इनमें जो चितवन आपको अच्छी लगे, उसी दृष्टिसे
आप मेरी ओर जल्दी देखिये (चाहे कृपा-दृष्टिसे, चाहे कोप-दृष्टिसे, चाहे प्रेम-
दृष्टिसे अथवा टेढ़ी-दृष्टिसे ही देखिये; किन्तु देखिये शीघ्र) । तुलसीदासको
अपनाइये, इसमें ढिलाई न कीजिये; क्योंकि अब जीवनकी अवधि बहुत ही
निकट है ॥३॥
विशेष
१—‘कृपा-कोप••••••हेरे’—भगवान्‌ने कृपा-दृष्टिसे राजा नृग, अहिल्या
आदिको देखा था; कोप-दृष्टिसे बालि, रावण आदिको देखा था; प्रेम-दृष्टिसे
शबरी, निषाद, सुग्रीव, विभीषण आदिको देखा था; धोखेकी दृष्टिसे यवन
आदिको तथा तिरछी निगाहोंसे पूतना आदिको देखा था; किन्तु सबके सब
मुक्त हो गये थे ।
[ २७४ ]
जाउँ कहाँ, ठौर है कहाँ देव ! दुखित-दीन को ?
को कृपालु स्वामी-सारिखो, राखै सरनागत
सब अंग बल-बिहीन को ॥१॥
गनिहि, गुनिहिं साहिब लहै, सेवा समीचीन को ।
अधन अगुन आलसिन को पालिबो
फबि आयो रघुनायक नवीन को ॥२॥
मुख कै कहा कहौं, बिदित है जी की प्रभु प्रवीन को ।
तिहू काल, तिहु लोक में एक टेक
रावरी तुलसी-से मन मलीन को ॥३॥
शब्दार्थ—गनिहि = धनीको । समीचीन = अच्छी । नवीन = नित्य नये । टेक = सहारा ।
भावार्थ—हे देव ! कहाँ जाऊँ ? मुझ दुःखित दीनके लिए कहाँ ठौर है ?
आपके समान कृपालु स्वामी कौन है, जो सब तरहसे बलहीन (साधनोंसे रहित)