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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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पृष्ठ 460

विनय-पत्रिका ४४९
तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति बिना हूँ।
नाम की महिमा, सील नाथ को, मेरो भलो बिलोकि
अब तें सकुचाहूँ, सिहाहूँ ॥४॥
शब्दार्थ—काढ़ि = निकालकर। रद = दाँत। कुटिल कीट = दुष्ट कीड़ा, दुष्ट जन्तु।
पाँवर = नीच। पातकी = पापी।
भावार्थ—हे स्वामी ! मैंने दाँत निकालकर द्वार-द्वारपर अपनी दीनता
कही, और लोगोंके पैरोंपर भी गिरा। (यदि यह कहा जाय कि संसारमें कोई
मेरी दरिद्रता दूर करनेवाला नहीं है, तो यह बात भी नहीं है) संसारमें ऐसे-
ऐसे दयालु हैं जो दसो दिशाओंके दुःख और दोषोंका नाश करनेमें समर्थ हैं,
किन्तु किसीने मुझसे बाततक नहीं की ॥१॥ माता-पिताने मुझे अपने शरीरसे
इस प्रकार पैदा किया जैसे दुष्ट कीड़ा; अर्थात् मानो मैं दुष्ट कीड़ा था कि
माता-पिताने अपने शरीरसे पैदा करके मुझे छोड़ दिया—स्वर्ग सिधार गये।
(ऐसी दशामें) मैं किसलिए क्रोध करूँ, और किसे दोष दूँ ? यह सब मेरे
ही दुर्भाग्यसे हुआ। सब लोग मेरी छायातकको छूनेमें सकुचाते हैं ॥२॥ मुझे
दुःखित देखकर सन्तों ने कहा कि तू अपने मनमें सोच न कर। शरणमें
जानेपर श्रीरामजीने तेरे जैसे नीच और पापी पशुओंतकका अपनी ओरसे
निर्वाह किया है ॥३॥ प्रेम और विश्वास न रहनेपर भी यह तुलसीदास
आपका (दास) होकर सुखी हो गया। हे नाथ ! आपके नामकी महिमा
और शीलसे मेरा जो भला हुआ है, उसे देखकर मैं अभीसे संकुचित होता और
सिहाता हूँ ॥४॥
विशेष
१—‘तनु जन्यो······मातु-पिता हू’—इसका अर्थ करनेमें टीकाकारोंने
खूब अटकल लगायी है। किसीने ‘त्वचा तजत’ पाठ माना है, तो किसीने
‘तनु तज्यो’ पाठ मानकर यह अर्थ किया है कि जैसे साँप अपना केंचुल छोड़
देता है। किन्तु हमने नागरी-प्रचारिणी-सभा, काशीकी प्रतिके अनुसार ‘तनु
जन्यो’ पाठ शुद्ध माना है। वियोगी हरिजीने भी यही पाठ शुद्ध माना है; किन्तु
आपने यह अर्थ किया है—‘जैसे दुष्ट कीड़ा अर्थात् साँप अपने ही शरीरसे
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