विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका ३३१
राग भैरवी
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मन पछितैहै अवसर बीते ।
दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु ही ते ॥१॥
सहसबाहु, दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते ।
हम-हम करि धन-धाम सँवारे, अन्त चले उठि रीते ॥२॥
सुत-बनितादि जानि स्वारथरत, न करु नेह सबही ते ।
अन्तहुँ तोहिं तजैंगे पामर ! तू न तजै अबही ते ॥३॥
अब नाथहिं अनुराग, जागु जड़, त्यागु दुरासा जी ते ।
बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ विषय-भोग बहु घी ते ॥४॥
शब्दार्थ—ही = हृदय, मन । धाम = घर । रीते = खाली हाथ । पामर = नीच ।
भावार्थ—रे मन ! अवसर बीत जानेपर तुझे पछताना पड़ेगा । दुर्लभ
मनुष्य-शरीर पाकर कर्म, वचन और हृदयसे भगवान्के चरणोंका भजन कर॥१॥
सहस्रबाहु और रावण आदि (महा तेजस्वी) राजा भी बलवान कालसे नहीं बचे,
जो 'हम-हम' करते हुए धन-धाम सँभालनेमें लगे रहे; पर अन्तमें खाली हाथ
(इस संसारसे) उठकर चले गये ॥२॥ पुत्र, स्त्री आदिको स्वार्थरत जानकर इन
सबसे स्नेह न कर । रे नीच ! ये सब तुझे अन्तमें छोड़ देंगे; इसलिए तू अभीसे
इन्हें क्यों नहीं छोड़ देता ? ॥३॥ रे मूर्ख ! अब जाग, सारी दुराशाओंको
हृदयसे छोड़ दे, और भगवान्से प्रेम कर । रे तुलसी ! भला कहीं कामरूपी
अग्नि विषय-भोगरूपी बहुत-सा घी डालनेसे बुझती है ? ॥४॥
विशेष
१—'अन्त चले'—इसपर कबीरदासके शब्दोंका भी रसास्वादन कर
लीजिये:—
जियरा जाहुगे हम जानी ॥
राज करंते राजा जैहैं रूप करंते रानी ।
चाँद भी जैहै सूरज भी जैहै, जैहै पवन औ पानी ॥